संवेदना कोई जन्मजात गुण नहीं, बल्कि वह संस्कार है जो आत्ममंथन की भूमि पर विकसित होता है। जहां चुगली, निंदा और दोषारोपण हावी होते हैं, वहां संवेदना के बीज अंकुरित नहीं हो पाते। दूसरों की पीड़ा को समझने की क्षमता हमें आलोचक नहीं, सहचर बनाती है। जब संवेदना व्यवहार का हिस्सा बन जाती है, तभी शब्द विष नहीं, विश्वास का माध्यम बनते हैं।

कई लोगों को सिर्फ इसमें ही आनंद आ जाता है कि वे चुगली कर के एक दूसरे को लड़वा देते हैं। उन्हें लगता है कि किसी के कान भर देना, आधी-अधूरी बातें पहुंचाना और रिश्तों में जहर घोलना एक तरह की जीत है। ऐसे लोग खुद को बहुत चतुर समझते हैं, मानो वे परदे के पीछे बैठकर सबको नचा रहे हों। मगर वे यह भूल जाते हैं कि यह तथाकथित आनंद बहुत क्षणिक होता है।

यह एक ऐसी आग है जो पहले दूसरों को जलाती है, पर अंत में उसी को अपनी चपेट में ले लेती है, जिसने उसे भड़काया होता है। चुगली की सबसे खतरनाक बात यह है कि यह खुलकर सामने नहीं आती। यह मुस्कान के पीछे छिपी रहती है, सहानुभूति का चोला ओढ़ लेती है और ‘मैं तो तुम्हारे भले के लिए बता रहा हूं’ जैसे मीठे शब्दों में लिपटी रहती है, लेकिन इसका असर बेहद गहरा होता है।

यह विश्वास की नींव को कमजोर करती है, रिश्तों में शक का बीज बोती है और लोगों को एक दूसरे के खिलाफ खड़ा कर देती है। जो लोग चुगली से आनंद लेते हैं, वे अक्सर यह नहीं सोचते कि जिन चिंगारियों से वे खेल रहे हैं, वही चिंगारियां एक दिन आग बनकर उन्हें भी जला सकती हैं।

इतिहास और समाज दोनों इस सच्चाई के गवाह हैं कि झूठ और चुगली पर खड़े रिश्ते ज्यादा दिन नहीं टिकते। आज जिसे आपने भड़काया है, वही कल सच्चाई जानकर आपसे मुंह मोड़ सकता है। आज जिस भ्रम का लाभ उठाया है, वही भ्रम टूटने पर शर्म और पछतावे में बदल जाता है।

सच चाहे जितना दबाया जाए, देर-सबेर सामने आता ही है और जब आता है, तो सबसे पहले उसी चेहरे से नकाब उतारता है, जिसने परदे के पीछे से डोरियां हिलाई थीं। धीरे-धीरे चुगली करने वाला व्यक्ति खुद भी अकेला पड़ने लगता है। लोग भले ही शुरुआत में उसकी बातों पर भरोसा कर लें, लेकिन उनके मन में एक डर हमेशा बना रहता है कि ‘जो मेरे सामने किसी की बुराई कर सकता है, वह मेरे पीछे मेरे बारे में क्या कहता होगा?’

यही संदेह रिश्तों में दूरी पैदा करता है। चुगली करने वाला अपने ही जाल में फंस जाता है, जहां न सच्चे रिश्ते बनते हैं और न ही आत्मिक शांति मिलती है।

इसी क्रम में हम एक और आदत को देख सकते हैं- कमियां निकालने की आदत। कमियां निकालने का हुनर तो हम सब बहुत अच्छे से जानते हैं। दूसरों की छोटी-सी गलती भी हमें पहाड़ जैसी दिखाई देती है। किसी के बोलने का ढंग, पहनावा, काम, सोच या निर्णय- हर चीज पर हमारी राय तैयार रहती है।

हमें लगता है कि सामने वाले को उसकी कमी बता देना हमारा अधिकार है, लेकिन इस प्रक्रिया में हम एक बेहद जरूरी काम भूल जाते हैं- अपने भीतर झांकना। कभी-कभी जरूरत होती है कि हम अपना चेहरा भी मन के दर्पण में देखें।

यह दर्पण कांच का नहीं होता। इसमें बाहरी रूप नहीं, बल्कि हमारी सोच, हमारा व्यवहार और हमारे इरादे दिखाई देते हैं। जब हम ईमानदारी से इस दर्पण में देखते हैं, तब समझ आता है कि जिन कमियों को हम दूसरों में खोजते फिरते हैं, उनमें से कई हमारे भीतर भी मौजूद हैं। फर्क बस इतना है कि अपनी कमियां हमें मजबूरी लगती हैं और दूसरों की कमियां अपराध।

हम दूसरों को सलाह देने में बहुत उदार होते हैं, लेकिन खुद पर वही सलाह लागू करने से कतराते हैं। हमें लगता है कि हम परिस्थितियों के शिकार हैं, इसलिए हमारी गलतियां जायज हैं, लेकिन दूसरों के लिए हमारे पास कोई रियायत नहीं होती। यही दोहरा मापदंड हमारे रिश्तों को खोखला करता है और हमारे व्यक्तित्व को भीतर से कमजोर बनाता है। जितनी जल्दी हम किसी की निंदा करने के लिए अग्रसर हो जाते हैं, काश उसी रफ्तार से हम आत्ममंथन करना भी सीख लें।

निंदा करना आसान है, क्योंकि इसमें मेहनत नहीं लगती। न सोचने की जरूरत, न खुद से सवाल करने की हिम्मत। आत्ममंथन इसके ठीक उलट है- इसमें ईमानदारी, धैर्य और साहस चाहिए। आत्ममंथन हमें यह सिखाता है कि हर व्यक्ति की अपनी परिस्थितियां होती हैं, अपने संघर्ष होते हैं, जिनका अंदाजा हमें बाहर से नहीं हो सकता। जब हम यह स्वीकार कर लेते हैं, तो हमारे शब्दों की धार अपने आप कुंद हो जाती है।

निंदा की जगह समझ और संवेदना जन्म लेने लगती है और यही संवेदना हमें इंसान बनाती है। बुराई और निंदा तो हर कोई कर लेता है। यहां तक कि झूठी-सच्ची स्तुति करना भी लोगों को आसान लगता है। आलोचना में एक सस्ता-सा साहस छिपा होता है- बिना जिम्मेदारी लिए, बिना किसी जोखिम के बस शब्द उछाल देना। सच्ची तारीफ हमें छोटा नहीं बनाती, बल्कि बड़ा बनाती है।

जो लोग खुले दिल से दूसरों की सराहना कर पाते हैं, वे रिश्तों में सकारात्मक ऊर्जा भर देते हैं। उनकी प्रशंसा सामने वाले को प्रेरित करती है, उसका आत्मविश्वास बढ़ता है और समाज में विश्वास का वातावरण बनाती है। सच्ची तारीफ चापलूसी नहीं होती। वह सिर्फ सच का सम्मान होती है। आखिर समाज तभी बेहतर बनता है, जब व्यक्ति बेहतर बनता है। और व्यक्ति तभी बेहतर बन सकता है जब वह निंदा, चुगली और अहंकार की राह छोड़कर आत्ममंथन, समझ और उदारता की राह चुने। वहां दिखने वाली सच्चाई न सिर्फ बेहतर इंसान बना सकती है, बल्कि रिश्तों को भी सच्चा, मजबूत और अर्थपूर्ण बना पाने में सक्षम होती है।

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