कभी कहा जाता था कि सीखने-समझने के लिए इच्छाशक्ति का होना सबसे आवश्यक है। यह बात अब किसी बीते हुए समय की प्रतीत होती है। उस समय की, जब सही ज्ञान प्राप्त करने के लिए संघर्ष, धैर्य और निरंतर परिश्रम करना पड़ता था। सीखना तब एक साधना थी। अपनी प्रतिभा और संभावनाओं को सिद्ध करना पड़ता था। स्वयं को उस स्तर तक विकसित करना होता था कि किसी योग्य शिक्षक का सान्निध्य मिल सके, अच्छी पुस्तकें उपलब्ध हो सकें। यह सब अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि माना जाता था।
निरंतर प्रयत्नशील रहने पर ही ज्ञान के वे द्वार खुल पाते थे। शायद इसी कारण उस लंबी प्रक्रिया से होकर निकलने वाले लोगों के भीतर अध्ययन, श्रम, धैर्य और ठहराव स्वाभाविक रूप से विकसित हो जाते थे। इस धीमी साधना में तपे हुए लोगों में ऐसे अनेक विद्वान मिलते थे, जो केवल अपने विषय के विशेषज्ञ नहीं होते थे, बल्कि जीवन के अनेक आयामों पर भी उनकी गहरी पकड़ होती थी।
आज का समय इससे बिल्कुल अलग है। इच्छाशक्ति कमजोर हो, तब भी ज्ञान और जानकारी सहज उपलब्ध है। यहां हम किसी प्रतियोगी परीक्षा के लिए अर्जित ज्ञान की बात नहीं कर रहे, क्योंकि वह किसी एक विषय का विशेषज्ञ बना सकता है। हम उस ज्ञान की बात कर रहे हैं, जो जीवन का निर्माण करता है, व्यक्तित्व को आकार देता है। किसी एक विषय का बड़ा जानकार भी अगर एक बेहतर मनुष्य न बन सके, तो जीवन की वास्तविक परीक्षा में वह कहीं न कहीं अनुत्तीर्ण ही माना जाएगा।
आज हमारे पास ज्ञान और सूचनाओं की प्रचुरता है। बहुत-सी बातें हमें बिना मांगे ही परोस दी जाती हैं, चाहे उनकी आवश्यकता हो या नहीं। सोशल मीडिया के इस युग में सीखने वाले के पास पहले से कहीं अधिक विकल्प हैं। अब चुनाव हमारे हाथ में है कि हम किसे सुनेंगे, क्या समझेंगे, कितना समझेंगे और उस समझ का उपयोग किस प्रकार करेंगे।
जानकारियों को आत्मसात करने के लिए हमारे भीतर पहले से ही एक अद्भुत व्यवस्था मौजूद है। जैसे भोजन करते समय हम प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट और वसा सब कुछ एक साथ ग्रहण करते हैं, लेकिन हमारा शरीर उन्हें अलग-अलग प्रक्रियाओं से पचाकर अपनी आवश्यकता के अनुसार उपयोग करता है, वैसे ही हमारा मस्तिष्क भी सूचनाओं को ग्रहण करता है और अपने स्वभाव तथा प्रवृत्ति के अनुसार उनका उपयोग करने लगता है।
यही कारण है कि अच्छा पढ़ लेने, अच्छा सुन लेने या बहुत कुछ सीख लेने भर से यह सुनिश्चित नहीं हो जाता कि मनुष्य अच्छा ही करेगा। उससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण यह है कि वह सीख क्यों रहा है। उसका उद्देश्य उसके अध्ययन से कहीं अधिक निर्णायक हो जाता है।
कोई व्यक्ति ईश्वर का नाम ले सकता है, धर्मग्रंथ पढ़ सकता है और अच्छे विचारों की चर्चा कर सकता है, लेकिन यदि उसके भीतर लोभ, ईर्ष्या, क्रोध और अहंकार कायम हैं, तो वह अपने ज्ञान का उपयोग भी उन्हीं प्रवृत्तियों के अनुरूप करेगा। ज्ञान की वास्तविक सार्थकता तभी है, जब वह हमारे भीतर के स्वार्थ से आगे बढ़कर हमारे व्यवहार को बदल सके।
कुछ लोग किसी विचारधारा के लेखकों या प्रभावशाली वक्ताओं को केवल इसलिए सुनने लगते हैं कि उनसे जुड़े लोगों का साथ उन्हें आकर्षित करता है। कुछ अपने सामाजिक संबंधों का विस्तार करना चाहते हैं, तो कुछ अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए विशेष प्रकार की सामग्री चुनते हैं। कुछ लोगों का उद्देश्य केवल स्वयं को विद्वान सिद्ध करना होता है।
वे पढ़ते हैं, सुनते हैं, अच्छे विचारों को कंठस्थ कर लेते हैं और अवसर आने पर उन्हें प्रभावशाली ढंग से दोहरा देते हैं। इस प्रकार, बिना भीतर से स्वयं को बदले भी वे प्रशंसा और अच्छी छवि अर्जित कर लेते हैं। मगर शायद ही ऐसा कोई ज्ञान हो, जिसे जीवन में कभी परखने का अवसर न मिले।
परिस्थितियां बार-बार ऐसी बनती हैं, जब व्यक्ति को अपने अर्जित ज्ञान के पक्ष में खड़ा होना पड़ता है। वहीं यह स्पष्ट होता है कि ज्ञान केवल दिखावे का हिस्सा था या वास्तव में व्यक्तित्व का हिस्सा बन चुका है।
हम देखते हैं कि बहुत कम लोग अपने ज्ञान को व्यवहार में उतारने का साहस जुटा पाते हैं। अपने लिए, अपने परिवार और अपने परिचित समाज के प्रति वे विनम्र दिखाई दे सकते हैं, लेकिन उनके भीतर वास्तविक परिवर्तन नहीं आया है, तो वे व्यापक समाज के प्रति भी उसी ज्ञान का न्यायपूर्ण और संवेदनशील उपयोग नहीं कर पाते।
जिन तथ्यों और संदर्भों को वे कभी बड़े आत्मविश्वास के साथ दोहराते थे, जीवन की कठिन घड़ी में वही शब्द उनका साथ नहीं दे पाते। तब उनके भीतर का खोखलापन, बनावटीपन और असंवेदनशीलता स्वयं प्रकट हो जाती है।
इसलिए सीखने की सच्ची कसौटी यह नहीं कि हमने कितना पढ़ा, कितना सुना या कितनी बातें याद रखीं। कसौटी यह है कि उन बातों ने हमारे निर्णयों, संबंधों और आचरण को कितना बदला।
ज्ञान तब जीवित होता है, जब वह सुविधा के समय बोले गए विचारों से आगे बढ़कर कठिन समय में सही पक्ष चुनने का साहस देता है। जब वह हमें अधिक विनम्र, संवेदनशील और न्यायपूर्ण बनाता है।
आखिर ज्ञान का मूल्य उसके संग्रह में नहीं, उसके रूपांतरण में है। जो समझ हमारे व्यवहार में नहीं उतरती, वह केवल सूचना है। जो हमारे भीतर दृष्टि और चरित्र बनाती है, वही वास्तविक शिक्षा है। सीखना तभी पूरा होता है, जब हमारे शब्दों से अधिक हमारे कर्म और स्वभाव यह कहने लगें कि हमने सचमुच कुछ जाना है।
