भाषा किसी समाज की सिर्फ अभिव्यक्ति नहीं होती, वह उसके जीने के ढंग की दिशा भी तय करती है। जिस दौर में जीवन जितना व्यापक, श्रमसाध्य और प्रकृति से जुड़ा होता है, उस दौर की भाषा उतनी ही समृद्ध दिखती है। जब जीवन से अनुभव धीरे-धीरे बाहर होने लगते हैं, तो शब्द भी चुपचाप विदा लेने लगते हैं।
आज अनेक भाषाओं में जो शब्द सिमटते दिखाई दे रहे हैं, वह कोई सामान्य भाषाई परिवर्तन नहीं है, बल्कि हमारे सामाजिक जीवन के सिकुड़ने का संकेत है। हमारे आसपास ऐसे सैकड़ों शब्द हैं, जो कभी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा थे और आज नई पीढ़ी के लिए लगभग अपरिचित हो चुके हैं। चूल्हे को सुलगाने वाली फूंकनी, कुएं से पानी खींचने की ढेंकली, अनाज कूटने की ओखली, रात में रोशनी देने वाली लालटेन। ये सब केवल वस्तुएं नहीं थीं, बल्कि जीवन की लय थीं। इनके साथ जुड़े शब्द हमारी बोलचाल से इसलिए हटे कि वह जीवन ही बदल गया, जिससे ये शब्द पैदा हुए थे।
कृषि से जुड़े औजारों, मौसम के सूक्ष्म भेदों, लोक व्यवसायों और सामुदायिक जीवन से जुड़े सैकड़ों शब्द नई पीढ़ी के व्यवहार से बाहर हो चुके हैं। कई इलाकों में युवा अपने बुजुर्गों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले शब्दों का अर्थ तक नहीं जानते, क्योंकि वे जीवन स्थितियां अब मौजूद नहीं रहीं।
दुनिया में भाषा के साथ-साथ शब्दों और उनसे जुड़े अनुभवों का क्षरण अब अनुमान नहीं, बल्कि दर्ज किया गया सत्यापित तथ्य है। अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक संस्था यूनेस्को के अनुसार, आज विश्व में लगभग सात हजार भाषाएं बोली जाती हैं, जिनमें से करीब 40 फीसद संकटग्रस्त स्थिति में पहुंच चुकी हैं। भाषा वैज्ञानिक अध्ययनों में यह भी सामने आया है कि जिन समुदायों की भाषाएं कमजोर होती हैं, वहां पारंपरिक जीवन से जुड़ी शब्दावली औसतन 30 से 50 फीसद तक घट जाती है। संकट केवल भाषाओं के लुप्त होने का नहीं है, बल्कि अनुभव आधारित शब्द-संपदा के खत्म होने का है, जिसके साथ पीढ़ियों का संचित ज्ञान भी मिट रहा है।
पहले भाषा अनुभवों से बनती थी। खेत में काम करते हुए किसान जो देखता था, महसूस करता था, वही शब्दों में ढलता था। मौसम के हर रूप के लिए अलग शब्द होते थे। रिश्तों के हर भाव के लिए अलग संबोधन होते थे। श्रम की हर अवस्था के लिए अलग नाम होते थे। आज जीवन का बड़ा हिस्सा मशीनों और स्क्रीन के बीच सिमट गया है।
भारत में यह संकट और गहरा है, क्योंकि हमारी भाषाएं जीवन से पैदा हुई थीं, किताबों से नहीं। गांव, खेत, बाजार, नदी, मौसम और रिश्तों ने हमारी भाषा को गढ़ा था। आज की युवा पीढ़ी तकनीक में बेहद सक्षम है, सूचनाओं से घिरी हुई है, लेकिन अनुभवों के स्तर पर पहले से कहीं अधिक सीमित होती जा रही है। खेल मैदान की जगह मोबाइल ने ले ली है, बातचीत की जगह चैट ने, प्रकृति की जगह आभासी दुनिया ने। जब जीवन का दायरा इतना संकुचित होगा, तो भाषा का विस्तार कैसे बचा रहेगा?
इसी दौर में कृत्रिम बुद्धिमत्ता, यानी एआइ को लेकर बड़ी उम्मीदें खड़ी की जा रही हैं। कहा जा रहा है कि मशीनें भाषाओं को संरक्षित करेंगी, नए शब्द बनाएंगी, साहित्य रचेंगी। तकनीकी रूप से यह सब संभव भी है, लेकिन मूल प्रश्न यह है कि मशीन आखिर सीखेगी क्या? एआइ वही ग्रहण करता है, जो मनुष्य उसे देता है। अगर मनुष्य का अनुभव संसार ही सूखा होगा, तो मशीन को केवल सूखे शब्द मिलेंगे। मशीन बारिश का आंकड़ा समझ सकती है, लेकिन वह पहली बारिश से उपजी खुशी नहीं जान सकती। वह रोटी बनाने की विधि बता सकती है, लेकिन भूखे पेट की संतुष्टि नहीं समझ सकती। अनुभव के बिना शब्द केवल सूचना बन जाते हैं, संवेदना नहीं। और संवेदना के बिना भाषा जीवित नहीं रह सकती। अगर इंसान जीना कम कर देगा, तो मशीन से जीवन पैदा नहीं हो सकता।
हिंदी कथा साहित्य के महान स्तंभ मुंशी प्रेमचंद की रचनाएं आज भी इसलिए जीवित हैं कि वे अनुभव से उपजी हैं। भाषा और अनुभव के रिश्ते को फणीश्वरनाथ रेणु ने अपनी कहानी मारे गए गुलफाम में जिस सहजता से पकड़ा है, वह आज के समय में और भी अर्थपूर्ण हो उठता है। आज जब वही जीवन शैली कमजोर पड़ रही है, तो वह शब्दावली भी हमारी जुबान से उतरती जा रही है। अगर वह जीवन नहीं रहेगा, तो भविष्य में ऐसी भाषा केवल किताबों में मिलेगी, रोजमर्रा की बातचीत में नहीं।
शब्दों का घटना केवल भाषाई संकट नहीं, मानसिक और सांस्कृतिक संकट भी है। जब प्रकृति से जुड़े शब्द मिटते हैं, तो प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता भी घटती है। जब सामूहिक जीवन के शब्द खत्म होते हैं, तो अकेलापन बढ़ता है। आज शहरों में लोग हजारों संपर्कों के बीच रहते हुए भी भीतर से अकेले हैं। बातें कम हैं, संदेश ज्यादा हैं। संवाद कम है, सूचना ज्यादा है।
मसलन, एक छोटा-सा अभ्यास किया जा सकता है। बिना तैयारी के अपने बारे में या अपने परिवार के बारे में दो मिनट लगातार बोला जाए। शुरू में शब्द सहज आते हैं। नाम, पेशा, शहर, कुछ सामान्य बातें, लेकिन कुछ ही क्षणों में शब्द अटकने लगते हैं। महसूस होता है कि अनुभव तो बहुत हैं, पर उन्हें व्यक्त करने के लिए शब्द कम पड़ रहे हैं। जब जीवन को देखने, समझने और बताने के शब्द कम होते जाते हैं, तो हमारी अभिव्यक्ति भी सीमित हो जाती है।
हमारी कहावतें और मुहावरे भी जीवन के अनुभवों से निकले थे। ‘नाच न जाने आंगन टेढ़ा’ में मनुष्य की आत्म-भ्रम की आदत छिपी थी। ‘घर की मुर्गी दाल बराबर’ रिश्तों में उपेक्षा की मनोवृत्ति को एक ही सांस में खोल देता था। ये वाक्य किसी विद्वान की मेज पर नहीं गढ़े गए थे, बल्कि खेतों की मिट्टी, घरों की चौखट और समाज की उठापटक से जन्मे थे।
इस संकट से निकलने का रास्ता तकनीक से लड़ना नहीं है, बल्कि जीवन को फिर से गहराई देना है। बच्चों को केवल स्क्रीन नहीं, मिट्टी भी देनी होगी। उन्हें पेड़, नदी, खेत, बाजार और रिश्तों का अनुभव भी देना होगा। शिक्षा में केवल पाठ्यक्रम नहीं, जीवन की विविधता भी शामिल करनी होगी। स्थानीय बोलियों और लोक संस्कृति को सम्मान देना होगा, ताकि शब्द सांस लेते रहें।
