सरकारें जब विकास परियोजनाओं का खाका खींचती हैं, तो उसके पीछे देश को शिखर पर ले जाने की छटपटाहट होती है। मगर इस विकास यात्रा का एक स्याह और मार्मिक पहलू भी है। इन तमाम परियोजनाओं की बुनियाद ‘भूमि’ पर ही टिकी है। कृषि-प्रधान भारत में किसी किसान या आदिवासी के लिए जमीन महज मिट्टी या ‘गाटा संख्या’ नहीं, बल्कि उसकी अस्मिता, पुरखों की धरोहर और पीढ़ियों की आजीविका का अटूट सहारा है।

ऐसे में लोकतंत्र के सामने यक्ष प्रश्न है- विकास की रफ्तार और विस्थापन के दर्द में मानवीय संतुलन कैसे सधे? क्या राष्ट्र-निर्माण के यज्ञ में आहुति हमेशा सबसे कमजोर वर्ग ही देगा, या हम कोई ऐसा समावेशी रास्ता निकाल सकते हैं, जहां प्रगति की कीमत किसी की बेदखली न हो? किसानों को 1894 के औपनिवेशिक कानून से मुक्ति दिलाने के लिए 2013 में ‘भूमि अधिग्रहण अधिनियम’ लाया गया, जो एक जनवरी 2014 से लागू हुआ।

इसने ग्रामीण क्षेत्रों में बाजार मूल्य के आधार पर अधिक मुआवजे, ‘सामाजिक प्रभाव मूल्यांकन’ और पुनर्वास के साथ निजी परियोजनाओं में 80 फीसद तथा पीपीपी परियोजनाओं में 70 फीसद प्रभावित परिवारों की सहमति को अनिवार्य किया। इसने संविधान के अनुच्छेद 300-ए के तहत संपत्ति के अधिकार को भी महत्त्वपूर्ण सुरक्षा दी, लेकिन जमीनी हकीकत कई मामलों में इसके उलट दिखाई देती है।

मानवीय भावना का पक्ष

‘सार्वजनिक उद्देश्य’ और कानून में दिए गए आपातकालीन प्रावधानों के तहत कुछ परियोजनाओं में भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया अलग हो सकती है। रक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसी विशेष परिस्थितियों के साथ-साथ कानून में निर्धारित अपवादों के कारण सहमति और सामाजिक प्रभाव मूल्यांकन के सामान्य प्रावधान हर मामले में समान रूप से लागू नहीं होते। भूमि के समवर्ती सूची में होने के कारण केंद्र और राज्यों, दोनों के स्तर पर कानून और नियमों की भूमिका महत्त्वपूर्ण हो जाती है। विकास की इस तेज रफ्तार में 2013 के कानून की मानवीय भावना का प्रभावी क्रियान्वयन आज भी बड़ी चुनौती है।

देश में विकास का भूगोल भले ही अलग हो, लेकिन अपनी जड़ों से उखड़ने की त्रासदी हर दिशा में एक समान है। उत्तर भारत के मैदानी इलाकों और बिहार जैसे क्षेत्रों में लहलहाती बहुफसली कृषि भूमि एक्सप्रेसवे और अन्य बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए ली जा रही है, जिससे छोटी जोत वाले किसानों के सामने आजीविका का संकट खड़ा होता है। वहीं, राष्ट्र की बढ़ती ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए मध्य और पूर्वी भारत में कोयला तथा खनिजों का व्यापक खनन हुआ है, जिसने जंगलों और स्थानीय समुदायों पर गहरा प्रभाव डाला है। पश्चिमी भारत में ‘स्वच्छ ऊर्जा’ के नाम पर ‘मेगा सोलर पार्कों’ को लेकर पशुपालकों के पारंपरिक चरागाहों के उपयोग पर भी विवाद सामने आए हैं। दक्षिण में आइटी गलियारे के लिए भूमि परिवर्तन और पूर्वोत्तर में जलविद्युत परियोजनाओं तथा सीमांत सड़कों के विस्तार ने स्थानीय समुदायों के अधिकारों और पर्यावरण को लेकर बहस छेड़ दी है।

मुट्ठी की रेत

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2022-23 में देश के 45.8 फीसद कामगार कृषि तथा संबद्ध क्षेत्रों में लगे थे। वहीं, कृषि जनगणना 2015-16 के अनुसार, देश की लगभग 86 फीसद परिचालन भूमि जोत छोटे और सीमांत किसानों के पास थीं। इनकी उपजाऊ जमीन का अधिग्रहण केवल संपत्ति का सौदा नहीं, बल्कि पीढ़ियों की आजीविका को प्रभावित करने वाला फैसला है। वित्तीय साक्षरता के अभाव में नकद मुआवजा ‘मुट्ठी की रेत’ साबित हो सकता है और किसान कुछ वर्षों में फिर आर्थिक संकट में फंस सकता है। वहीं, भूमिहीन मजदूर और बटाईदार पुनर्वास की प्रक्रिया से अक्सर पर्याप्त रूप से नहीं जुड़ पाते। दूसरी ओर, कृषि भूमि पर कारपोरेट नियंत्रण का एक नया और परोक्ष स्वरूप भी दिखाई दे रहा है।

कुछ राज्यों में ‘भूमि बैंक’ और दीर्घकालिक लीज जैसे माडल के जरिए औद्योगिक तथा निवेश परियोजनाओं के लिए बड़े भूखंड उपलब्ध कराए जा रहे हैं। साथ ही, ‘कान्ट्रैक्ट फार्मिंग’ या अनुबंध खेती के जरिए उत्पादन से लेकर बाजार तक कारपोरेट भागीदारी बढ़ी है। ऐसे माडलों में पारदर्शिता, स्थानीय समुदायों की भागीदारी और भूमि-उपयोग के सामाजिक प्रभाव को लेकर सवाल उठते रहे हैं। विकास की आड़ में बढ़ती यह प्रवृत्ति उस भविष्य की आशंका पैदा करती है, जहां स्वतंत्र अन्नदाता अपनी ही जमीन पर आर्थिक रूप से निर्भर मजदूर बनने को मजबूर हो सकता है।

अधिकारों की पहचान

आबादी में लगभग 8.6 फीसद होने के बावजूद, ऐतिहासिक अध्ययनों में विकास परियोजनाओं से विस्थापित होने वालों में आदिवासियों की हिस्सेदारी कई क्षेत्रों और अवधि में असंगत रूप से अधिक पाई गई है। उनके लिए ‘जल-जंगल-जमीन’ महज आर्थिक संसाधन नहीं, बल्कि उनकी आत्मा और सांस्कृतिक पहचान है। वनाधिकार कानून ग्राम सभाओं को वनाधिकारों की पहचान और संरक्षण में महत्त्वपूर्ण भूमिका देता है। इसके बावजूद कोयला खदानों, बड़े बांधों और अन्य परियोजनाओं के दौरान वनाधिकारों तथा ग्राम सभा की प्रक्रियाओं के पालन को लेकर विवाद सामने आते रहे हैं।

इसका असर पर्यावरण पर भी पड़ता है। 2019-20 से 2023-24 के बीच 95,724.99 हेक्टेयर वन भूमि को विभिन्न गैर-वानिकी उपयोगों के लिए परिवर्तित कर देने को मंजूरी दी गई। कागजों पर किए गए ‘प्रतिपूरक वनीकरण’ की प्रक्रिया सदियों पुराने जंगलों के जटिल पारिस्थितिकी तंत्र की तत्काल भरपाई नहीं कर सकती।

कंक्रीट के विस्तार से प्राकृतिक जल निकासी और स्थानीय पारिस्थितिकी पर भी दबाव बढ़ता है। ‘प्रतिपूरक वनीकरण के बावजूद प्राचीन जंगलों के जटिल पारिस्थितिकी तंत्र को रातों-रात पुनर्जीवित नहीं किया जा सकता। यही कारण है कि आज महाराष्ट्र के ‘थर्ड मुंबई’ मेगा-सिटी से लेकर कर्नाटक के बिदादी तक, किसान भूमि अधिग्रहण और प्रस्तावित विकास माडल के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं।

इन सुलगते आंदोलनों के बीच सर्वोच्च न्यायालय ने भूमि अधिग्रहण में मुआवजे के प्रश्न पर महत्त्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया है कि मुआवजा महज एक यांत्रिक या सूत्रबद्ध प्रक्रिया नहीं हो सकता, बल्कि उसे समानता, न्याय और परिस्थितियों के अनुरूप निर्धारित किया जाना चाहिए। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया है कि संविधान के अनुच्छेद 300-ए के तहत संपत्ति के अधिकार को संवैधानिक संरक्षण प्राप्त है और राज्य इसे मनमाने तरीके से नहीं छीन सकता।

संतुलन की नींव

इस दूरगामी संकट का हल विकास का पहिया रोकना नहीं, बल्कि प्रक्रिया को न्यायसंगत और मानवीय बनाना है। जबरन अधिग्रहण के बजाय पारदर्शी साझेदारी माडल (‘लैंड पूलिंग’) अपनाया जाए, जहां किसान मालिकाना हक न खोए और उसे नियमित आय मिले। माटी छूटने के बाद विस्थापित युवा अकुशल मजदूर न बनें, इसके लिए उन्हें युद्धस्तर पर कौशल विकास का तकनीकी प्रशिक्षण दिया जाए। सबसे अहम, खाद्य सुरक्षा की कीमत पर उपजाऊ खेतों में कंक्रीट बोने के बजाय सरकार बुनियादी ढांचे के लिए बंजर और कम उपजाऊ भूमि को प्राथमिकता दे।

विकास और मानवाधिकार एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। सच्ची प्रगति वह है, जो एक्सप्रेसवे की तेज रफ्तार के साथ-साथ कतार में खड़े आखिरी इंसान का भी हाथ थामकर चले। देश को आर्थिक उड़ान के लिए कारखानों की जितनी जरूरत है, उतनी ही दरकार अन्नदाता के चेहरे पर सुकून की भी है। चमकते बुनियादी ढांचे और लहलहाते खेतों के बीच का मानवीय संतुलन ही एक नए, न्यायपूर्ण और सशक्त भारत की मजबूत नींव रखेगा।