सुनने में यह वाक्य बहुत साधारण लगता है कि मैं नहीं जानता, लेकिन मनुष्य की समूची बौद्धिक यात्रा कहीं न कहीं इसी स्वीकारोक्ति से शुरू होती है। ज्ञान का पहला कदम यह मान लेना है कि अभी सब कुछ ज्ञात नहीं है। जिज्ञासा वहीं पैदा होती है, जहां निश्चितता समाप्त होती है। प्रश्न वहीं जन्म लेता है, जहां मनुष्य अपने ज्ञान की सीमा को पहचानता है। जब मनुष्य ने पहली बार अपने आसपास की दुनिया को देखकर पूछा होगा कि यह सब क्यों है, जीवन क्या है, मृत्यु के बाद क्या है, सत्य क्या है और स्वयं मनुष्य कौन है, तब उसके पास इन प्रश्नों के उत्तर नहीं रहे होंगे। उसने अज्ञात को स्वीकार किया और उसकी खोज शुरू की।
भारतीय दार्शनिक परंपरा को देखें, तो यह विनम्रता उसके भीतर बहुत गहराई से दिखाई देती है। वेदों और उपनिषदों की मूल चेतना में यह स्वीकारोक्ति मौजूद है कि अंतिम सत्य को सहज रूप से पकड़ लेना संभव नहीं है। उपनिषदों का ‘नेति नेति’ यानी ‘यह नहीं, यह भी नहीं’, इसी बोध की ओर संकेत करता है। सत्य को किसी एक सीमित परिभाषा में बंद करने के बजाय उसके बारे में लगातार प्रश्न करते रहना इस परंपरा की विशेषता रही है। ऋग्वेद का नासदीय सूक्त तो इस दृष्टि से और भी महत्त्वपूर्ण है। सृष्टि की उत्पत्ति के प्रश्न पर वह जिस प्रकार विचार करता है, उसमें एक गहरी बौद्धिक विनम्रता दिखाई देती है।
सृष्टि के आरंभ में क्या था, कैसे था और उसे कौन जानता है, इन प्रश्नों के उत्तर में निश्चितता के बजाय संदेह और जिज्ञासा उपस्थित होती है। यहां तक कि अंत में यह संभावना भी रखी जाती है कि शायद वह भी न जानता हो, जो इस सृष्टि के सर्वोच्च रहस्य को जानने वाला माना जाता है। यही दर्शन की सुंदरता है। वह कहता है कि मैं खोज रहा हूं, इसलिए मैं जानना चाहता हूं। मैं जानना चाहता हूं, इसलिए मुझे यह स्वीकार करना होगा कि अभी मैं नहीं जानता। यूनानी दार्शनिक सुकरात की पूरी दार्शनिक पद्धति के केंद्र में भी यही स्वीकार दिखाई देता है।
मनुष्य को अपने अज्ञान का बोध होना चाहिए
सुकराती ज्ञान का सबसे महत्त्वपूर्ण बिंदु यह था कि मनुष्य को अपने अज्ञान का बोध होना चाहिए। अपने अज्ञान को स्वीकार करना उसके लिए कमजोरी नहीं, बल्कि ज्ञान की शुरुआत थी। जो व्यक्ति यह मानता है कि वह सब कुछ जानता है, उसके लिए प्रश्न करने की कोई आवश्यकता ही नहीं बचती। मगर जो यह स्वीकार करता है कि वह नहीं जानता, उसके भीतर खोज की संभावना बनी रहती है।
यही कारण है कि ‘मैं नहीं जानता’ दरअसल ज्ञान के प्रति एक नैतिक और बौद्धिक जिम्मेदारी भी है। यह मनुष्य को विनम्र बनाता है। यह उसे दूसरे की बात सुनने की क्षमता देता है। यह उसे अपने विचारों पर पुनर्विचार करने की स्वतंत्रता देता है। समस्या तब शुरू होती है, जब मनुष्य ‘मैं नहीं जानता’ से आगे बढ़कर ‘मैं ही जानता हूं’ की स्थिति में पहुंच जाता है। जब किसी व्यक्ति, समूह या परंपरा को यह विश्वास हो जाता है कि उसके पास अंतिम सत्य है, तब प्रश्न पूछने की जगह समाप्त होने लगती है। जहां प्रश्न समाप्त होते हैं, वहां दर्शन अपनी प्रकृति खोने लगता है।
दुनिया के इतिहास में ऐसी धार्मिक और वैचारिक व्यवस्थाएं रही हैं, जिन्होंने यह दावा किया कि अंतिम सत्य उनके पास पहले से मौजूद है। सत्य को पूर्ण रूप से प्रकट किया जा चुका है और अब मनुष्य का काम केवल उसे स्वीकार करना है। ऐसी व्यवस्था में असहमति केवल एक बौद्धिक मतभेद नहीं रह जाती। दर्शन प्रश्न करता है, कट्टरता उत्तर थोपती है। दर्शन कहता है कि सत्य की खोज जारी है, कट्टरता कहती है कि सत्य मिल चुका है। दर्शन दूसरे व्यक्ति को अपने साथ खोज में शामिल करता है, कट्टरता उससे अपने निष्कर्ष को स्वीकार करने की मांग करती है। इस निश्चितता का प्रभाव केवल विचारों तक सीमित नहीं रहता। जब कोई विचार अपनी ऐतिहासिक और दार्शनिक परिस्थितियों से अलग होकर कठोर नियम में बदल जाता है, तो दर्शन धीरे-धीरे कर्मकांड में बदल सकता है।
किसी विशेष समय, स्थान या ऐतिहासिक परिस्थिति में उत्पन्न हुई बात को शाश्वत और अनिवार्य मान लिया जाता है। फिर उस पर प्रश्न करना परंपरा का विरोध माना जाने लगता है। यहीं से एक और समस्या पैदा होती है। जब विचार अपने मूल अर्थ से कट जाता है और केवल उसकी बाहरी अभिव्यक्ति बचती है, तो कर्मकांड दर्शन की जगह ले लेता है। मनुष्य यह पूछना बंद कर देता है कि किसी आचरण का अर्थ क्या है और केवल यह पूछता है कि उसे कैसे करना है। ‘क्यों’ की जगह ‘कैसे’ ले लेता है। प्रश्न की जगह नियम आ जाता है।
किसी भी जीवित दर्शन की पहचान यही है कि वह अपने भीतर प्रश्न के लिए जगह बनाए रखता है। जो परंपरा अपने ही मूल प्रश्नों से डरने लगे, उसके भीतर जड़ता पैदा होना स्वाभाविक है। इसलिए ‘मैं नहीं जानता’ कहना केवल विनम्रता नहीं है। यह मनुष्य को हिंसा से भी दूर रख सकता है। जब यह पता हो कि मेरी समझ सीमित है, तो दूसरे की समझ को पूरी तरह गलत मानने से पहले रुकना होगा, सुनना होगा, प्रश्न उभरेगा और संभव है कि विचार बदल भी जाए।
शायद सभ्यता के लिए सबसे खतरनाक वाक्य ‘मैं जानता हूं’ नहीं, बल्कि ‘केवल मैं ही जानता हूं’ है। मनुष्य को खुद पर विश्वास रखना चाहिए। उसे अपनी परंपरा से प्रेम भी करना चाहिए, लेकिन प्रेम और निश्चितता एक ही चीज नहीं हैं। अपनी परंपरा को समझने का सबसे अच्छा तरीका शायद यह नहीं कि हम उसके हर उत्तर को अंतिम मान लें, बल्कि यह है कि हम उसके भीतर मौजूद प्रश्नों को फिर से सुनें। जब तक मनुष्य यह कह सकने की क्षमता रखता है कि ‘मैं नहीं जानता’, तब तक उसके भीतर जानने की संभावना जीवित रहती है। जिस दिन वह अपनी सीमित समझ को अंतिम सत्य मान लेता है, उसी दिन दर्शन का अंत शुरू हो जाता है।
