मन न भटकने पर ही हरेक मंजिल टिकी होती है। कार्य क्षेत्र का समय रहते सही चयन ही उज्ज्वल मुकाम के दरवाजे की ओर ले जाता है। विख्यात चीनी विचारक चिन निंग इसे यों समझाते हैं- ‘चयन का सफल मार्ग वही होता है, जो स्वयं के लिए अपनी समझ से बनाया जाता है, न कि दूसरों की देखा-देखी या उनके सपनों के पीछे भागने से।’
लेकिन कार्य क्षेत्र के चयन से ही सफलता नहीं मिल जाती। हर मैदान पर जीत के लिए एकाग्र होना बहुत जरूरी है। आज की पीढ़ी के लिए तो एकाग्रता कायम रखना और कठिन हो गया है, क्योंकि पल-पल ध्यान भटकाने के लिए फेसबुक, इंस्टाग्राम, वाट्सएप जैसे सोशल मीडिया के कई लोकप्रिय जरिए उनकी मुट्ठी में हैं।
पहले के जमाने में ऐसा नहीं था, न ही इतना संघर्ष था, क्योंकि इस कदर प्रतिस्पर्धा भी नहीं थी। आज की पीढ़ी पढ़ाई और प्रशिक्षण के बीच ही मोबाइल में अटक जाती है। मन न भटके, शायद इसीलिए स्कूली पढ़ाई के अलावा कोचिंग कक्षाओं का चलन बढ़ा है। बच्चे खुद से पढ़ाई करने के अभ्यास से दूर हो रहे हैं।
हाल ही में भारतीय प्रशासनिक सेवा परीक्षा में उत्तीर्ण ज्यादातर छात्र-छात्राओं का कहना है कि उन्होंने कोचिंग का रास्ता न अपना कर अपने स्तर पर एकाग्र होकर पढ़ाई की थी।
अब तो टीवी चैनलों की धुआंधार प्रस्तुतियां और मोबाइल, रील, ओटीटी, यूट्यूब वगैरह साधनों की भरमार के चलते स्क्रीन पर नजरें गड़ाए रखने की अवधि पर रोक लगाना मुमकिन नहीं रह गया है, लेकिन जब प्रतिस्पर्धा कम थी, तब भी दूरदर्शन के दौर में विद्यार्थियों वाले घर-परिवारों में परीक्षाओं से एक-दो हफ्ते पहले टीवी देखने पर पूरी तरह रोक लगा दी जाती थी।
यानी परीक्षाओं से एक महीना पहले से टीवी बंद हो जाता था। इस दौरान बच्चे तो बच्चे, परिवार का कोई सदस्य टीवी नहीं देखता था। मकसद था कि पढ़ाई के दौरान बच्चों की एकाग्रता कम न हो। आखिरी परीक्षा के बाद अभिभावक सिनेमाघर में बच्चों को फिल्म दिखा कर बेशक मनोरंजन का कोटा पूरा करा देते थे।
जीवन में एक परीक्षा के बाद दूसरी, फिर तीसरी और चौथी के बाद भी परीक्षाओं का दौर जारी रहता है। दूसरे शब्दों में, आज अच्छे अंक प्राप्त करने के बावजूद कल से फिर जुटना और सीखना होता है। अब तो बारहवीं के बाद ही राष्ट्रीय स्तर के कालेजों में दाखिले के लिए विश्वविद्यालयों में प्रवेश परीक्षा की तैयारी शुरू हो जाती है।
अध्यापक, चिकित्सक, वकील, खिलाड़ी समेत सभी गैर कारोबारियों और कारोबारियों को भी निरंतर अध्ययन और अभ्यास करते रहना पड़ता है। न करने वाले अपने क्षेत्र में पीछे छूटते जाते हैं। इसलिए हर रोज एकाग्रता को बनाए रखना है। पहले से ज्यादा बेहतर बनने के लिए।
सफल लोग हिदायत देते हैं कि जो भी काम करें, उसे अपना सौ फीसद से ज्यादा दें। अपनी एकाग्रता या ध्यान न तोड़ें, खूब मेहनत करें, बुरे से बुरे और कठिन से कठिन हालात में भी जुटे रहें। परिवार की गरीबी या नजदीकियों की बीमारी जैसी परिस्थितियों में भी अपनी एकाग्रता कायम रखना ही सफलता की चाबी है। तय है कि भटक कर या लक्ष्य बदल-बदल कर मंजिल पर नहीं पहुंचा जा सकता।
हमेशा किसी खास या बड़े काम की तलाश करते रहने से लोग असंतुष्ट ही रहने लगते हैं। मिसाल के तौर पर, घुड़दौड़ प्रतियोगिता जीतने वाले घोड़े को तो यह भी नहीं मालूम होता है कि जीत क्या है। वह तो अपने मालिक द्वारा दी गयी तकलीफ के कारण दौड़ता है। इसलिए अगर हमारे जीवन में तकलीफ आती है, तो हमें जान लेना चाहिए कि हमारा मालिक हमें जिताना चाहता है।
किसी भी मैदान या कार्य क्षेत्र में अनगिनत अस्वीकार्यताएं सुनना चाहिए, लेकिन खुद पर भरोसे से भटकने की नौबत नहीं आए। मंजिल हासिल करने की जिद ही सुनहरे भविष्य की नींव है। एक जाने-माने अभिनेता ने अपने साक्षात्कार में जाहिर किया था कि गैर फिल्मी परिवार से होने की वजह से उसके लिए फिल्मों में आना नामुमकिन था, लेकिन फिल्में उसकी मंजिल थीं। उसने थियेटर की दुनिया में हाथ- पैर मारे, हीरो के लिए चाय लाने से लेकर शूटिंग स्थल पर कुर्सियां जमाने तक पापड़ बेले।
शूटिंग स्थलों पर मौजूद लोगों के मोबाइल से फिल्म वालों के नंबर चुराता। फिर उनके दफ्तरों में चक्कर लगाता। वह अपनी धुन में झक मार कर जुटा रहा। एक रोज फिल्म वालों का बुलावा आया। नए चेहरे की तलाश में, उसका चयन हो गया। यह उसे उसके जुनून के पीछे भागने से ही मुमकिन हुआ।
विख्यात परामर्शदाता और लेखक जीन कालिंस ने लगातार पंद्रह सालों तक उच्च मुनाफा कमाने वाले ग्यारह उद्योगों का शोध अध्ययन किया और जाना कि सभी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी में विनम्रता और मजबूत इच्छाशक्ति की बराबर खासियत थी। विनम्रता से समझौता कतई नहीं किया जा सकता, क्योंकि अगर हम विनम्र नहीं हैं, तो सबसे पहले सुनना बंद कर देंगे। सुनेंगे नहीं, तो सीखना बंद हो जाएगा।
सीखना और करना कभी छोड़ना नहीं चाहिए। स्वयं को बेहतर बनाने में जुटे रहेंगे, तो हमारे काम खुद-ब-खुद बढ़िया होते जाएंगे। कभी दाएं-बाएं या पीछे मुड़ कर नहीं देखना चाहिए। काबिल बनने के लिए सदा प्रयत्नशील रहना लाजिमी है। एक फिल्म का लोकप्रिय संवाद भी है, ‘कामयाब होने के लिए नहीं, काबिल बनने के लिए पढ़ो। कामयाबी झक मार के पीछे भागेगी !’ यह तय है कि खेद जताने और उदास विचार की ऊर्जा दरअसल भटकाव बढ़ाने के अलावा और कुछ नहीं हासिल करातीं।
