दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को राउज़ एवेन्यू कोर्ट से कथित शराब घोटाले मामले में बड़ी राहत मिली है। इस राहत ने उनकी दिल्ली की राजनीति में संभावित वापसी के दरवाजे एक बार फिर मजबूती से खोल दिए हैं। बात यहां सिर्फ एक मामले में राहत मिलने की नहीं है, बल्कि इसे एक बड़ी वैचारिक जीत के रूप में भी देखा जा रहा है। आम आदमी पार्टी इस मुश्किल समय में इसे अपने लिए वापसी की संजीवनी मान रही है।

आम आदमी पार्टी के लिए यह राहत इसलिए भी अहम है क्योंकि उनके नेता ने सही समय पर भावनात्मक संदेश देने की कोशिश की। शुक्रवार को अदालत से राहत मिलने के बाद जब केजरीवाल मीडिया के सामने आए, तो वे भावुक हो गए। पहली नजर में इसे खुशी के आंसू कहा जा सकता है, लेकिन राजनीतिक नजरिए से देखें तो यह सहानुभूति हासिल करने की रणनीति भी हो सकती है। ऐसे भावनात्मक क्षण जनता के दिल को प्रभावित कर सकते हैं और आम आदमी पार्टी की “कट्टर ईमानदारी” वाली छवि को फिर से मजबूत करने में मदद कर सकते हैं।

राहत मिलने के बाद की प्रेस कॉन्फ्रेंस में केजरीवाल ने अपनी आगे की रणनीति के संकेत भी दिए। उन्होंने कहा, “मोदी जी मुझे अब तभी रोक पाएंगे, अगर मेरा कत्ल करवा दें।” यह बयान बताता है कि वे खुद को एक राजनीतिक प्रताड़ना के शिकार के रूप में पेश कर रहे हैं। इसे कुछ राजनीतिक विश्लेषक ‘विक्टिम नैरेटिव’ या ‘मोदी रणनीति’ के रूप में देखते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी समय-समय पर यह कहते रहे हैं कि पूरा विपक्ष उन्हें निशाना बनाता है, जिससे यह संदेश जाता है कि वे अकेले हर ताकत से लड़ रहे हैं। अब कुछ ऐसा ही नैरेटिव अरविंद केजरीवाल भी गढ़ते नजर आ रहे हैं।

माना जा रहा है कि केजरीवाल की संभावित वापसी इसलिए भी संभव दिख रही है क्योंकि उनकी मूल विचारधारा ‘साफ-सुथरी राजनीति’ और ‘कट्टर ईमानदारी’ को फिर से पुनर्जीवित करने की कोशिश की जा रही है। जब वे राजनीति में आए थे, तब उन्होंने खुद को भ्रष्टाचार के खिलाफ एक सख्त चेहरा बताया था। दिल्ली की जनता ने उन्हें प्रचंड जनादेश भी दिया। लेकिन जैसे ही कथित शराब घोटाले का मामला सामने आया, उनकी इसी ईमानदारी वाली छवि को सबसे बड़ा झटका लगा। बीजेपी ने पिछले विधानसभा चुनाव में इसे बड़ा मुद्दा बनाया और लंबे समय बाद राजधानी में सरकार बनाई।

अब अदालत से राहत मिलने के बाद आम आदमी पार्टी एक बार फिर यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि उनका नेतृत्व ईमानदार है और आरोप राजनीतिक हैं। इससे केजरीवाल की विश्वसनीयता को दोबारा स्थापित करने का प्रयास किया जा रहा है।

हालांकि, केजरीवाल की वापसी की संभावना बढ़ी है, लेकिन यह मान लेना कि इसका सीधा नुकसान सिर्फ बीजेपी को होगा, सही नहीं होगा। जिन राज्यों में आने वाले महीनों में चुनाव होने हैं जैसे हिमाचल प्रदेश, गुजरात और गोवा,वहां आम आदमी पार्टी का सीधा मुकाबला कई जगह कांग्रेस से है। इन राज्यों में अब तक मुख्य लड़ाई भाजपा बनाम कांग्रेस रही है, लेकिन आम आदमी पार्टी खुद को कांग्रेस के विकल्प के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रही है।

गुजरात इसका बड़ा उदाहरण है। पिछले विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी ने लगभग 13 प्रतिशत वोट हासिल किए थे। इसका सीधा असर कांग्रेस की सीटों और वोट शेयर पर पड़ा। गोवा में भी आम आदमी पार्टी अपनी उपस्थिति मजबूत करने की कोशिश में है।

दरअसल, आम आदमी पार्टी का एक राजनीतिक पैटर्न साफ नजर आता है। राजनीति में आने के बाद से वह कई राज्यों में बीजेपी से ज्यादा कांग्रेस का विकल्प बनती दिखी है। दिल्ली का उदाहरण देखें तो 2013 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का वोट शेयर 24.7 प्रतिशत था, जबकि पहली बार चुनाव लड़ रही आम आदमी पार्टी ने लगभग 29.7 प्रतिशत वोट हासिल किए और 28 सीटें जीत लीं। 2015 के चुनाव में आम आदमी पार्टी का वोट शेयर बढ़कर 54.5 प्रतिशत हो गया, जबकि कांग्रेस सिमटकर 9.7 प्रतिशत पर आ गई। इससे यह धारणा बनी कि कांग्रेस का बड़ा वोट आधार आम आदमी पार्टी की ओर शिफ्ट हुआ।

ऐसे में अगर केजरीवाल मजबूत वापसी करते हैं और आम आदमी पार्टी राष्ट्रीय स्तर पर विस्तार करती है, तो चुनौती बीजेपी से ज्यादा कांग्रेस के सामने खड़ी हो सकती है। इसका असर विपक्षी गठबंधन, खासकर इंडिया गठबंधन, की राजनीति पर भी पड़ सकता है। ऐसे में पहले से ही कई मतभेदों का सामना कर रहे विपक्ष को बदलते राजनीतिक समीकरणों के लिए तैयार रहना होगा।