देश भर में लोगों का गांव से शहरों और शहरों से विदेश पलायन करने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। मुख्य रूप से रोजगार और शिक्षा जैसे कारणों से एक बार गांव-घर छूटता है, फिर लौटना ही नहीं हो पाता। कामकाजी आपाधापी एवं बदलती जीवनशैली पर्व-त्योहारों और सामाजिक-पारिवारिक आयोजनों में भी नियमित मेलजोल का अवसर नहीं देती। हाल ही में तमिलनाडु के शिवगंगा जिले के कराईकुडी में अपनी जड़ों से जुड़े रहने की एक घटना चर्चा में आई। यहां एक ही परिवार की पीढ़ियों ने गांव-घर लौटने का मन बनाया। दुनिया के अलग-अलग हिस्से में जा बसे इन लोगों ने व्यस्तता और जीवन की आपाधापी को भूल कर एक-दूजे से मिलने का मार्ग निकाला और अपने पैतृक आवास पर पहुंच गए। बिखरते रिश्तों के इस दौर में यह प्रयास पीढ़ियों को जोड़ने की एक प्रेरणादायी घटना है।

दरअसल, शिवगंगा जिले के कराईकुडी में एक एकड़ में फैले तीस कमरों वाले पैतृक घर की सौवीं वर्षगांठ के अवसर पर देश-विदेश में बसे परिवार के तीन सौ से अधिक सदस्य इकट्ठा हुए। इस आयोजन में दुबई, मलेशिया और कनाडा में बसे सगे-सबंधियों के कुल पैंसठ परिवारों ने भाग लिया। इससे पहले वर्ष 2016 में परिवार के कुछ सदस्य एक कार्यक्रम के लिए इस घर में आए थे।

इस परिवार के सदस्यों के लिए यह सुखद एहसास है कि उनका पैतृक घर एक बार फिर संबंधों को मजबूती देने का माध्यम बना। यह पैतृक घर केवल ईंट-पत्थर की संरचना नहीं, बल्कि परंपरा, संस्कृति और पारिवारिक एकता का प्रतीक बन गया। इसमें दोराय नहीं कि देश-विदेश में जा बसी एक परिवार की पीढ़ियों के बीच भौगोलिक दूरी ही मन के फासले का कारण भी बन जाती है।

संयुक्त परिवारों के टूटते रिश्ते और बिखरते मूल्य, क्या अपनी सबसे मजबूत सामाजिक इकाई को खो रहे हैं हम?

परिवार के सदस्यों का अलग-अलग देशों या शहरों में रहना कभी समय क्षेत्र का अंतर तो कभी बदलती सोच और सरोकारी भाव-बर्ताव के कारण नियमित रूप से संवाद करने में बाधा बन जाते हैं। एक साथ कोई आयोजन करना तो बिल्कुल असंभव-सा ही लगता है। समय के साथ प्राथमिकताएं भी बदलती हैं और कभी बहुत मान से बनाए गए घर पारिवारिक सदस्यों की बाट जोहते रह जाते हैं।

वर्तमान परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो भारतीय प्रवासी दुनिया का सबसे बड़ा प्रवासी समुदाय है। मई 2024 के आंकड़ों के अनुसार, देश के लगभग 3.54 करोड़ लोग प्रवासी समुदाय में शामिल हैं। कमोबेश हर प्रांत के गांव-कस्बे से लेकर शहरों तक के बाशिंदे दूसरे देशों में अपना ठिकाना बना चुके हैं। एक समय बाद पैतृक घरों को देखने-संभालने भी कोई नहीं आता। ऐसे में कराईकुडी का यह वाकया अपनों से जुड़े रहने के सार्थक प्रयास का उदाहरण है। विशेषकर बदलती पारिवारिक परिस्थितियों में यह कोई साधारण प्रसंग भर नहीं।

सोशल मीडिया ने घरों के बीच बनाई दूरी, लोगों की बना दी अलग दुनिया

देखने में आ रहा है कि हम संयुक्त परिवार से एकल परिवार तक आ पहुंचे हैं। घर-परिवार के इस नए परिवेश में अब एकल परिजनों के बीच अलगाव ही नहीं, बल्कि आपराधिक आंकड़े बढ़ रहे हैं। सहिष्णु व्यवहार करीबी संबंधों से भी नदारद है। विरासत को सहेजने वाली भावी पीढ़ियों में विरासत को लेकर ही टकराव की स्थितियां बन रही हैं। पारिवारिक मुकदमों की संख्या लगातार बढ़ रही है। कभी साथ बैठकर समस्याएं सुलझाने वाले पारिवारिक ढांचे में अब आपसी विवादों के लाखों मामले अदालतों में लंबित हैं।

इनमें अधिकतर मुकदमे तलाक, भरण-पोषण, संपत्ति और संतान की अभिरक्षा से संबंधित होते हैं। यानी ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की बात करने वाले देश में भी लोग अपने ही परिवार के सदस्यों के साथ नहीं रह पा रहे हैं। वैश्विक स्तर पर सार्वभौमिक भाईचारे का संदेश देने वाला भारतीय समाज अब अपने घरों में पारिवारिक कलह और संपत्ति के मुकदमों में उलझा हुआ है, जो पुरानी मान्यताओं और आधुनिक वास्तविकताओं के बीच अंतर को दिखाता है।

देश में लोग विश्व को एक परिवार मानने वाले सिद्धांत का उल्लेख तो करते हैं, लेकिन अपने करीबी रिश्तेदारों के साथ भी एकजुट नहीं रह पा रहे हैं। ‘परिवार’ की मूल अवधारणा ही समाप्त होती जा रही है और एक व्यक्ति-एक परिवार की प्रवृत्ति बढ़ रही है। यह स्थिति बढ़ती पारिवारिक टूटन से अकेले छूटते बच्चों से लेकर प्रताड़ित होते बुजुर्गों और युवा जोड़ों के संबंधों में दरार के दुखद पहलुओं को सामने रखती है। ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि विदेश में जा बसे लोगों का यों पारिवारिक मेलजोल का मार्ग निकालना हमारी वास्तविक मान्यताओं की ओर लौटने के समान है।

समाज में पारिवारिक व्यवस्था का छिन्न-भिन्न होना पीड़ादायक तो है ही, एक-दूसरे से पूरी तरह कट जाना और भी दुखद है। बीते कुछ वर्षों में पश्चिमी देशों जैसी पारिवारिक व्यवस्था ने भारतीय समाज में भी जड़ें जमा ली हैं। समझना आवश्यक है कि पश्चिमी देशों के परिवारों में भावनात्मक जुड़ाव और आत्मीयता के बजाय व्यक्तिगत स्वतंत्रता और आत्मनिर्भरता के भाव को अधिक महत्त्व दिया जाता है। संबंधों के निर्वहन को लेकर वहां बहुत सीमित, स्पष्ट और व्यावहारिक सोच रही है।

वहीं, भारतीय समाज में परिवार की पीढ़ियों से गहरा लगाव हुआ करता था। शहरीकरण, पलायन और व्यक्तिगत सोच के कारण अब यह हाव-भाव बदला है। घरेलू संबंधों से जुड़ी संवेदनाओं का स्थान व्यक्तिगत सरोकारों ने ले लिया है। यह तथ्य विचारणीय है कि परिवार को वैश्विक समुदाय का लघु रूप कहा जाता है। एक ऐसी इकाई, जो स्नेह और सहभागिता की मानवीय समझ को आधार देती है और संवेदनाओं को पोषित करने वाला परिवेश बनाती है।

भारतीय संस्कृति में तो परिवार को आर्थिक, सामाजिक और मनोवैज्ञानिक परेशानियों के दौर में संबल के तौर पर देखा जाता है। घर-परिवार से मिलने वाला सुख-समर्पण का भाव ही हमें समाज और देश से जोड़ता है। यही राष्ट्र के प्रति दायित्वबोध का भाव भी जगाता है। पारिवारिक खुशहाली राष्ट्र निर्माण में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसलिए बदलती परिस्थितियों में भी तयशुदा प्रयासों के साथ लोगों को परिवार से जुड़ाव रखने के मार्ग तलाशने होंगे। जब जुड़ाव का मन बना लिया जाए, तो जुड़े रहना कठिन नहीं है।