भारत आस्थाओं का देश है। यहां कांवड़ यात्रा भी निकलती है, अज़ान भी होती है, मंदिरों में जागरण भी होते हैं, गुरुद्वारों में कीर्तन भी और चर्चों में प्रार्थनाएं भी। इन सभी को संविधान ने धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार दिया है। लेकिन क्या धार्मिक स्वतंत्रता का मतलब यह भी है कि आम नागरिक की दिनचर्या, शिक्षा, स्वास्थ्य और आवाजाही प्रभावित हो?
यही सवाल आज कांवड़ यात्रा को लेकर उठ रहा है।
हर साल लाखों श्रद्धालु कांवड़ यात्रा में शामिल होते हैं। यह उनकी आस्था का विषय है और उसका सम्मान होना भी चाहिए। लेकिन दूसरी तरफ तस्वीर यह भी है कि कई शहरों में घंटों ट्रैफिक जाम लगता है, स्कूल बंद कर ऑनलाइन पढ़ाई करानी पड़ती है, मरीजों और एंबुलेंस तक को रास्ता बनाने में कठिनाई होती है। कई जगह डीजे, सड़क पर नाच-गाना, स्टंट और सोशल मीडिया के लिए प्रदर्शन जैसी तस्वीरें भी सामने आती हैं। तब मन में कई सवाल उठते हैं- क्या यही भक्ति है? यह कौन सा तरीका है अपने आराध्य को प्रसन्न करने का? क्या ऐसे व्यवहार को धर्मिक आस्था का हिस्सा माना जाना चाहिए?
इसी तरह सालों से सुबह-सुबह मस्जिदों के लाउडस्पीकर पर होने वाली अज़ान को लेकर भी बहस होती रही है। कुछ लोगों को इससे परेशानी होती है तो कई जगह मंदिरों के जागरण, धार्मिक जुलूसों और अन्य आयोजनों में भी तेज़ आवाज़ वाले लाउडस्पीकर लोगों की नींद, पढ़ाई और रोज़मर्रा की ज़िंदगी को प्रभावित करते हैं।
अगर हम सच में निष्पक्ष हैं तो हमें एक ही सिद्धांत अपनाना होगा- नियम सबके लिए समान होने चाहिए। किसी एक धर्म पर सवाल और दूसरे पर चुप्पी या एक के लिए छूट और दूसरे के लिए सख्ती- यह न्याय नहीं हो सकता।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25 सभी नागरिकों को अपने धर्म का पालन और प्रचार करने की स्वतंत्रता देता है। लेकिन यह अधिकार पूर्ण (Absolute) नहीं है। यह सार्वजनिक व्यवस्था (Public Order), नैतिकता (Morality) और स्वास्थ्य (Health) के अधीन है। यानी धार्मिक स्वतंत्रता के साथ नागरिक जिम्मेदारी भी जुड़ी हुई है।
इसी सोच को सर्वोच्च न्यायालय ने भी अपने 2005 के शोर प्रदूषण (Noise Pollution) फैसले में रेखांकित किया। सर्वोच्च अदालत ने स्पष्ट किया था कि लाउडस्पीकर किसी धर्म का अनिवार्य हिस्सा नहीं हैं और ध्वनि-प्रदूषण के नियम सभी पर समान रूप से लागू होंगे। अदालत ने यह भी कहा कि किसी भी धर्म या आयोजन को शोर संबंधी नियमों से छूट नहीं दी जा सकती और ध्वनि प्रदूषण नागरिकों के जीवन और स्वास्थ्य के अधिकार को प्रभावित करता है।
इसलिए बहस कांवड़ यात्रा बनाम अज़ान की नहीं है। बहस यह है कि क्या आस्था का प्रदर्शन इस तरह होना चाहिए जिससे बाकी नागरिकों को अनावश्यक परेशानी हो? क्या प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं है कि धार्मिक आयोजनों के लिए बेहतर ट्रैफिक प्लान, वैकल्पिक मार्ग और शोर नियंत्रण सुनिश्चित करे? और क्या श्रद्धालुओं की जिम्मेदारी नहीं है कि वे अपनी भक्ति को अनुशासन और संवेदनशीलता के साथ निभाएं?
सच्ची आस्था कभी दूसरों की परेशानी पर खड़ी नहीं होती। वह संयम सिखाती है, सेवा सिखाती है और सह-अस्तित्व का भाव सिखाती है। अगर हमारी भक्ति से किसी बच्चे की पढ़ाई में रुकावट हो, किसी मरीज की एंबुलेंस जाम में फंस जाए या किसी बुज़ुर्ग की नींद टूट जाए तो हमें कम से कम यह सवाल ज़रूर पूछना चाहिए कि कहीं हम आस्था और प्रदर्शन के बीच की रेखा तो नहीं भूल रहे।
धर्म सबका अपना है लेकिन सड़क, कानून और सार्वजनिक व्यवस्था सबकी है। इसलिए नियम भी सबके लिए समान होने चाहिए- चाहे कांवड़ यात्रा हो, अज़ान हो, मंदिर का जागरण हो या कोई अन्य धार्मिक आयोजन। यही संविधान की भावना है और यही एक सभ्य समाज की पहचान भी।
