जेपी…जयप्रकाश नारायण की संपूर्ण क्रांति ने सत्तर के दशक में देश की राजनीति का चरित्र बदल दिया था। कांग्रेस के एकल प्रभुत्व को नकार कर क्षेत्रीय क्षत्रपों का उदय हुआ। बिहार से ‘संपूर्ण क्रांति एक्सप्रेस’ ट्रेन चलती है, जो दिल्ली पहुंचती है। पर अब इस ‘संपूर्ण क्रांति’ का इंजन बदल गया है। इस इंजन के बदलने के पीछे भी एक जेपी (नड्डा) का ही एलान है। 2014 के बाद राज्यों के चुनाव में भाजपा की लगातार जीत के मद्देनजरभाजपा के तत्कालीन अध्यक्ष ने कहा था कि बहुत जल्द क्षेत्रीय दलों का अस्तित्व खत्म हो जाएगा। सत्तर के दशक की ‘संपूर्ण क्रांति’ के जरिए जनता नेकांग्रेस के अखिल भारतीय राजनीतिक प्रभुत्व को नकारा तो इक्कीसवीं सदी की ‘संपूर्ण क्रांति’ के बाद भाजपा के अखिल भारतीय प्रभुत्व को स्वीकार रहे हैं। क्षेत्रीय क्षत्रप जहां बचे हैं वे भी ‘संपूर्ण क्रांति’ के इंजन के डिब्बे में ही जुड़े हुए हैं, या जुड़ने के इच्छुक हैं। अब इंजन की मर्जी है कि वह कब तक इन डिब्बों को अपने साथ जोड़े रखना चाहता है। जेपी से जेपी तक की राजनीति के जरिए क्षेत्रीय क्षत्रपों के क्षय पर बेबाक बोल

भारत के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अगुआ रही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस आजाद देश में सत्ता की स्वत: दावेदार हुई। आजाद भारत के लोगों ने कांग्रेस पर भरोसा भी किया। सत्ता के स्वाभाविक चरित्र की तरह कांग्रेस अहंकारी हुई और कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक पर अपना अधिकार माना। देश के जर्रे-जर्रे का राजनीतिक फैसला दिल्ली से जारी होने लगा। इस विशालकाय देश के बहुत बड़े हिस्से को लगने लगा था कि उनके लिए दिल्ली दूर है। उनके अधिकारों के फैसले इतनी दूर से नहीं लिए जा सकते हैं।

कांग्रेस की राजनीतिक निरंकुशता के आरोप के बीच आया 1970 का दौर। उसी वक्त उदय होता है जयप्रकाश नारायण का। आपातकाल और केंद्र सरकार के निरंकुश रवैए के खिलाफ एक विचारधारा का निर्माण हुआ। जयप्रकाश नारायण मजबूत और तानाशाही केंद्रीय सत्ता को चुनौती देने के लिए कई छोटे, विपक्षी और क्षेत्रीय विचारधारा वाले गुटों (भारतीय लोकदल, कांग्रेस (ओ), जनसंघ, सोशलिस्ट पार्टी) को साथ लेकर आए। कांग्रेस की विशालकाय राजनीतिक शक्ति के सामने छोटे दलों ने एक साथ मिलकर मुट्ठी तानी। अलग-अलग राजनीतिक विचारधारा के लोग जनता पार्टी के छाते के नीचे एकजुट हुए।

कभी दलविहीन लोकतंत्र की वकालत करने वाले जयप्रकाश नारायण की विचारधारा ने क्षेत्रीय दलों की पौधशाला खोली। इस पौधशाला में लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार, मुलायम सिंह यादव जैसी कोपलें फूटीं, जिन्होंने क्षेत्रीय राजनीति में वटवृक्ष सरीखा विस्तार पाया। अब दिल्ली की सरकार को हजारों किलोमीटर दूर बैठा कोई नेता चुनौती दे सकता था। भारतीय राजनीति में गठबंधन सरकारों का दौर शुरू हुआ और दिल्ली की शक्ति को क्षेत्रीय अस्मिताओं ने प्रभावित करना शुरू कर दिया।

सत्तर के बाद भारतीय राजनीति में ऐसा ही मोड़ 2014 में आया। केंद्र में भाजपा की सरकार बनी और भारत को एक और जेपी मिला। ये थे जगत प्रकाश… जेपी नड्डा। केंद्र के बाद भाजपा का विधानसभा चुनाव जीतने का दौर शुरू हुआ। भाजपा की लहर में डूबने से बचने के लिए जब क्षेत्रीय दल भाजपा से ही समझौता कर रहे थे, तब नए जेपी ने कहा कि भारत में बहुत जल्द क्षेत्रीय दल खत्म हो जाएंगे। यह बयान बहुत साधारण तरीके से देकर उस पर चुप्पी साध ली गई थी। लेकिन इस पर अति आक्रामक तरीके से काम शुरू कर दिया गया था।

इस बार छाता था हिंदुत्व का। क्षेत्रीय विविधता की काट खोजने के लिए बनी प्रयोगशाला ने हिंदुत्व का उत्पाद निकाला। कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी का मुहावरा पुराना हुआ और हिंदुत्व की राजनीति का नया भूगोल गंगोत्री से लेकर गंगासागर तक है। गंगा के उद्गम से समुद्र में उसके मिलन तक की पट्टी पर क्षेत्रीय क्षत्रपों का क्षय हो चुका है। जो बचे हैं, उनका सहारा भी नए जेपी वाली पार्टी ही है। अब उसकी मर्जी कि वह अपने हिंदुत्व की राजनीति में कितना क्षेत्रीय रहने देगी।

जम्मू-कश्मीर में पीडीपी, पंजाब में शिरोमणि अकाली दल, महाराष्ट्र में शिवसेना, बिहार में जद (यू), उत्तर प्रदेश में बसपा, हरियाणा में जजपा, आंध्र प्रदेश में वाईएसआर, उत्तर प्रदेश में रालोद, कर्नाटक में जनता दल (सेक्युलर) – इन सबको लगा था कि हिंदुत्व के छाते की छांव पा लेने के बाद उनका क्षेत्र बचा रह सकता है। लेकिन नए जेपी की पार्टी का हिंदुत्व राजनीति का ऐसा ‘सुपर फूड’ है कि उसके बाद राजनीतिक विचारधारा के शरीर को किसी अन्य खुराक की जरूरत ही महसूस नहीं होती।

दो पारी के चुनावों ने कलिंग, अंग और बंग के क्षेत्रीय क्षत्रपों को धराशायी कर दिया है। कभी बसपा अध्यक्ष मायावती को देश की भावी प्रधानमंत्री के रूप में देखा जाता था। मुलायम सिंह यादव की भी ऐसी ही छवि बनाई गई थी। पिछले लोकसभा चुनाव के पहले नीतीश कुमार को विपक्ष का राष्ट्रीय चेहरा बनाने की कवायद शुरू हुई थी।

नीतीश कुमार ने बहुत हद तक हिंदुत्व की राजनीति को रोका था। लेकिन अपना क्षेत्रीय अस्तित्व बचाने के लिए वे हिंदुत्व की राजनीति के साथ आए और विलीन हो गए। ममता बनर्जी ने बहुत मजबूती से अपनी पहचान बनाई थी और गाहे-बगाहे उन्हें भी देश के प्रधानमंत्री के लिए योग्य चेहरों में माना जाता रहा। नवीन पटनायक ने अपने हिस्से का राजनीतिक इतिहास लिखा।

लोजपा के रामविलास पासवान को मौसम वैज्ञानिक कहा जाता था, तो आज उनके पुत्र ने अस्तित्व बचाने के लिए ‘विज्ञान’ को छोड़ ‘हनुमान’ बनना चुना। शरद पवार, नीतीश कुमार के साथ राज्यसभा की शपथ लेने के लिए मजबूर हुए। याद करें चौधरी चरण सिंह का जलवा, जो केंद्रीकरण, नौकरशाही और बड़े उद्योगपतियों के प्रभाव में आने का आरोप लगाकर नेहरूवादी ढांचे के खिलाफ खड़े हुए थे।

उन्होंने मध्यवर्ती कृषक जातियों को जो राजनीतिक शक्ति दी थी, उसी विरासत के तहत भाजपा सरकार को अपने कृषि कानून वापस लेने पड़े थे। लेकिन आज उनके पोते जयंत चौधरी राजग सरकार के सहयोगी हैं। अब मध्यवर्ती किसान के पास भी हिंदुत्व की पहचान है। हरियाणा के ‘लाल’ भगवा के आगे विलुप्तप्राय राजनीतिक प्रजाति के दायरे में हैं।

भारत के वृहत्तर भूगोल ने ही क्षेत्रीय राजनीति की जरूरत को पैदा किया था। पहाड़ की आबादी और मैदान की आबादी दोनों की जरूरतें अलग होंगी। आदिवासी इलाके चाहते थे कि मुख्यधारा के अतिक्रमण से उनकी रक्षा हो। इन्हीं आकांक्षाओं ने कई नए राज्य बनाए। झारखंड में शिबू सोरेन जैसे नेता ने दिल्ली तक अपनी दखल बनाई।

लेकिन पहाड़, समुद्र से लेकर जंगल तक को हिंदुत्व की पहचान के दायरे में लाया गया। हेमंत सोरेन ने पिछली बार भले ही आदिवासी अस्मिता के आधार पर अपनी सरकार बनाई हो, लेकिन अब हिंदुत्व की पहचान के आगे उनका टिका रहना भी मुश्किल दिख रहा है। भाषाई और क्षेत्रीय पहचान की अतिवाद वाली द्रमुक सत्ता से दूर जा चुकी है। वहां एक ऐसे नेता का उदय हुआ है, जिसने चुनाव में समावेशी रुख रखा।

क्षेत्रों ने जिस दिल्ली को कभी दूर कहकर खारिज किया था, आज उन्हें ही दिल्ली में समा लिया गया है। दिल्ली के मुख्यालय से क्षेत्रीय पहचान खान-पान और परिधान तक सीमित हो गई है। जब बात बिहार की थी, तो लिट्टी-चोखा और गमछा को ही उसका पर्याय मान लिया गया। बंगाल का समय आते ही भाजपा मुख्यालय में झाल-मूड़ी की दुकान सज गई, मछली राष्ट्रीय भोजन सरीखी हो गई। हिंदुत्व की राजनीति ने दिल्ली में ऐसा ‘बड़ा बाजार’ खोल दिया है, जहां एक छत के नीचे रसम से लेकर पायसम तक है।

कभी एक जेपी के जरिए भारत के क्षेत्रों ने कांग्रेस के एकल प्रभुत्व को नकारा, तो आज दूसरे जेपी ने दिल्ली की सत्ता को वह इंजन बना दिया, जिसके पीछे सभी क्षेत्रीय दलों के डिब्बे एक-एक कर जुड़ने लगे। अस्तित्व बचाने के क्षेत्रीय दलों के भय और समझौतों ने उनका और क्षय कर दिया है।

फिलहाल क्षेत्रीय दलों के खिलाफ भाजपा के जेपी की ‘संपूर्ण क्रांति’ सफल हुई है। क्षेत्रीय क्षत्रपों के क्षय के साथ ‘एक देश, एक पार्टी’ का रुझान बढ़ता नजर आ रहा है। भविष्य में मौजूदा सत्ता के सामने जो भी शक्ति खड़ी होगी, निश्चय ही उसका चरित्र राष्ट्रीय होगा।