अक्सर बड़े पदों पर आसीन, निजी व्यवसाय या अन्य कामों में व्यस्त महिलाओं से भी यह आशा की जाती है कि वे अपनी नौकरी के काम के साथ-साथ घर के कामों को भी शिद्दत के साथ निपटाएं। चाहे इसके लिए उन्हें अपने विकास से समझौता ही क्यों न करना पड़े। हमारे आसपास घर के कामों में पिसती, चूल्हा-चौकी के लिए ‘दिन-रात एक करती’ और ऐसा नहीं कर पाने पर तानों की बौछार झेलती, अपमानित होती और पिटती महिलाएं देखी जा सकती हैं। आश्चर्य यह है कि ज्यादातर महिलाएं इन चीजों को सहज भाव से लेती हैं। उनके अनुसार दोहरी, तिहरी जिम्मेदारियों को एक साथ निभाने में ही स्त्री होने की सफलता है। सामाजिक मानक ऐसी स्त्रियों को ही अपने खांचे के अनुकूल मानता है।
आर्थिक रूप से सक्षम और मानसिक रूप से खुद को मजबूत दिखाती, घर के अंधेरे में उत्पीड़ित और अपमानित होती स्त्रियां सभी जगह हैं। परिवार बनाने और बचाने से लेकर उसकी शांति और सुव्यवस्था के नाम पर अपनी योग्यता तथा डिग्रियों को दफ्न करती, अपनी पसंद-नापसंद को दरकिनार करती स्त्रियां किसी न किसी रूप में प्रत्येक घर में हैं। पिता की खराब आर्थिक स्थिति और भाई की शिक्षा के लिए पढ़ाई से वंचित की जाती बेटियां भी आम हैं। उच्च शिक्षित लड़कियों की शादी होते ही परंपरागत बहू, पत्नी, सेविका बन जाने की कामना अधिसंख्य भारतीय घरों में इतनी बड़ी है कि ऐसा न कर पाने वाली महिलाओं को लांछित और प्रताड़ित तो किया ही जाता है, कई बार हत्या तक कर दी जाती है। हाल में घटी कई निर्मम घटनाएं भारत में महिलाओं के खिलाफ होने वाली हिंसा की भयावह तस्वीर पेश करती हैं।
दरअसल, स्त्री कोई भी हो, पढ़ी-लिखी, सुयोग्य, ओहदेदार, डॉक्टर, इंजीनियर, मॉडल, कलाकार, सामान्य घरेलू या कोई अन्य, सभी से कमोबेश यही आशा की जाती है और उसका मूल्यांकन इसी रूप में किया जाता है कि वह वंशवृद्धि कर पाई या नहीं, पति और ससुराल वालों को कितना खुश कर पाई, घर की सजावट, दूसरों की खुशी के लिए किस हद तक समझौता करती है, साफ-सफाई, खाना बनाने आदि में कितनी माहिर है और सबसे बढ़कर यह कि कैसे वह एक आदर्श परंपरागत बहू बनकर खुद को, अपने काम और पसंद को दोयम बना देती है। समाज कहता है कि स्त्री होने के नाते उसकी पहली और अंतिम प्राथमिकता यही है। वास्तव में समाज तथा परिवार के वर्तमान स्वरूप में बने रहने का बीज स्त्री के इसी दोहन में छिपा है।
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस) और राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के अनुसार, 18-49 आयु वर्ग की लगभग 32 फीसद विवाहित महिलाओं ने अपने जीवनकाल में कभी न कभी पति या ससुराल पक्ष के लोगों द्वारा शारीरिक, यौन तथा भावनात्मक हिंसा को झेला है। 15-49 साल की महिलाओं में 31.9 फीसद ने मात्र 15 वर्ष की उम्र में शारीरिक हिंसा झेली है। ग्रामीण क्षेत्र में हर चौथी तथा शहरी क्षेत्रों में हर छठी महिला घरेलू हिंसा का शिकार होती है। स्वयं को अतिशय संस्कृतिनिष्ठ कहने वाले हमारे देश को दुनिया भर में अंतरंग साथी द्वारा की जाने वाली शारीरिक और यौन हिंसा के उच्च प्रसार वाले देशों में गिना जाता है।
गौरतलब है कि एनसीआरबी के आंकड़े सिर्फ दर्ज हुए मामले बताते हैं। एनएफएचएस बताता है कि घरेलू हिंसा के मामले में 86 फीसद महिलाओं ने कभी मदद मांगी ही नहीं। यानी असली हिंसा के मामले इन आंकड़ों से कई गुना ज्यादा हैं। ज्यादातर महिलाएं सामाजिक बदनामी, लोकलाज, भय, असुरक्षा के भाव, आर्थिक परनिर्भरता आदि के कारण पुलिस तक पहुंच ही नहीं पाती हैं।
स्त्री के विरुद्ध हिंसा के तमाम मामले किसी खास वर्ग में सीमित न होकर शिक्षित-अशिक्षित, संपन्न-गरीब हर तबके में समान रूप से होते हैं। आश्चर्यजनक यह भी है कि स्त्री आर्थिक रूप से सक्षम हो या घरेलू, पढ़ी-लिखी हो या अनपढ़, कमोबेश सभी स्तर पर घरेलू हिंसा का शिकार बनती है और कई कारणों से इसे जीवन का हिस्सा मानकर चुप्पी ओढ़े रहती है। चूंकि अधिकांश स्त्रियां अपनी मां, दादी, चाची, बुआ आदि को इसी रूप में देखती बड़ी होती हैं, इसीलिए उनके लिए यह सब साधारण बात होती है। आर्थिक रूप से पराश्रित स्त्रियों को अक्सर यह भी सुनने को मिल जाता है कि खाना, कपड़ा, गहना, दुलार, सुरक्षा सब तो मिल ही रहा है, पति है, गुस्से में कभी-कभार पीट ही दिया तो क्या हो गया! घरेलू हिंसा के प्रति यह सामाजिक स्वीकार्यता ही इस अपराध को और बढ़ा रही है।
सवाल यह है कि क्या स्त्रियों के साथ होने वाली हिंसा बदस्तूर यों ही जारी रहेगी। तमाम कानूनों, नियमों और पहल के बावजूद इसमें कमी क्यों नहीं हो रही है? स्त्री की शिक्षा, उसका सशक्तीकरण आदि क्या इसे रोक पा रहे हैं? इस समस्या का निदान क्या है?
सच यह है कि कई सकारात्मक सामाजिक और व्यवस्थागत कोशिशों के बावजूद भारत के लगभग हर हिस्से में स्त्रियों के विरुद्ध होने वाली घरेलू हिंसा के मामले और बढ़े हैं। कानून और व्यवस्थाएं एक हद तक अपना काम कर रही हैं, लेकिन जरूरत उस सोच को जानने और समझने की है, जो घरेलू हिंसा का कारण है। हमारी व्यवस्था में स्त्री को बेचारगी से उबारने के लिए पता नहीं कितने नियम और कानून बने हैं। सामाजिक संस्थाएं लगातार स्त्रियों के उत्थान के लिए काम करने का दावा करती रही हैं। पर दुखद है कि अभी तक हम उस नासूर से ही अनजान हैं, जहां से यह दर्द निकलकर आता रहा है। वह नासूर है, पुरुष मानसिकता की श्रेष्ठतावादी सोच।
सदियों से पितृसत्तावादी समाज की जड़ों में यह बैठा है कि स्त्री, पुरुष से कमतर है, दोयम है, संपत्ति है आदि। हर स्तर पर हो रही स्त्री के खिलाफ हिंसा की असली वजह भी इसी सोच में समाई है। इसे रोकने के लिए इसी सोच के खिलाफ लड़ना और इसे मिटाना होगा। महिलाओं के कथित उत्थान में लगी व्यवस्थाओं को अपनी ऊर्जा इसी सोच को स्थायी तौर से मिटाने में लगानी होगी।
महत्त्वपूर्ण यह भी है कि जिसके साथ गलत हो रहा है, वह मजबूती से आवाज उठाए। सामाजिक बनावट, परंपरा, सोच, शर्म, भय आदि को परे झटककर स्त्री सबसे पहले अपने लिए, अपने साथ खड़ी हो जाए। उसे सबसे पहले अपने आप को मनुष्य समझना होगा, अपनी खुशियों की पहचान करनी होगी। स्वयं को वास्तविक संदर्भों में तरजीह देनी होगी। ‘जिसकी छत टपकती है, निर्माण की पहल भी उसे ही करनी होती है।’
यहां तो एक पक्ष चाहता ही है कि पितृसत्ता की भ्रामक श्रेष्ठता वाली व्यवस्था सदैव बनी रहे, क्योंकि उसका सुख उसी में है। स्त्री को हर स्तर पर इस जाल को न सिर्फ समझना होगा, बल्कि उसे काटने के लिए खड़ा भी होना पड़ेगा। पहचान, शिक्षा, सम्मान, कमाई, समय, पसंद, नापसंद जो भी उसका है, उसे हक के साथ लेना होगा। पहली बार में ही हिंसा की कुचेष्टा पर अंतिम रूप से लगाम लगाना अनिवार्य है। घर का होना और उसका हंसता-मुस्कुराता स्वरूप जरूरी है, पर यह सब उस घर की बेटी, बहू या अन्य स्त्री चरित्र की खुशियों की कीमत पर अस्वीकार्य है। कानून भी यही कहता है।
