अस्वीकरण
हम आजम खान के समर्थक नहीं हैं। न ही आजम खान की तरह सरकारी लाभ लेकर विश्वविद्यालय बनाने के आरोपों का समर्थन करते हैं। उस विश्वविद्यालय के बनने के तौर-तरीकों, अच्छाई-बुराई, कानूनी-गैरकानूनी तय करना अदालत का काम है, वह तय करे। हम इसके किसी राजनीतिक पहलू पर अपनी राय नहीं रख रहे हैं। हम इसे सिर्फ आज के शिक्षा के हालात से जोड़ कर देख रहे हैं। बुनियादी शिक्षा की हालत इस बात से भी तय होती है कि आपके ज्ञान व अनुसंधान के शीर्ष की क्या हालत है। जब हम चांद और मंगल पर बस्ती बसाने की बात कर रहे हैं तो हमारे देश के काबिल वैज्ञानिक इसरो में नहीं रहना चाह रहे हैं। परीक्षाओं को संचालित करने में राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी की इतनी नाकामियां साबित होने के बाद भी शिक्षा महकमा निश्चिंत बैठा रहा। वह समय बीता जब सत्ता का शुभंकर इसरो जैसा संस्थान होता था, अब सबकी पसंद बुलडोजर है। बेबाक बोल की बुलडोजरबद्ध प्रार्थना, जौहर यूनिवर्सिटी गिरनी ही चाहिए।
जी हां, जौहर यूनिवर्सिटी को गिराया जाना चाहिए। आज सभी जगह आवाज बुलंद हो रही है कि इसे न गिराया जाए, यहां तक कि ‘सरकारी एंकर’ भी कह रहे हैं कि इसे न गिराया जाए। मगर हम दृढ़ता के साथ कह रहे हैं कि इसे गिराया जाए। न सिर्फ इसे गिराया जाए, बल्कि इसके खंडहर को ऐतिहासिक धरोहर की तरह महफूज रखा जाए। धरोहर की स्मारिका में लिखा जाए कि ऐसा भी शासन आया था, जिसमें शिक्षा व्यवस्था की यह हालत थी। जौहर यूनिवर्सिटी तो प्रतीक है, अन्य विश्वविद्यालयों पर न जाने किस-किस तरह के बुलडोजर चल रहे हैं। आज जो हमारी शिक्षा व्यवस्था की हालत है, जिस तरह से शिक्षा-बजट कम हो रहा है, जिस तरह से विश्वविद्यालयों को निशाना बनाया जा रहा है, उन सबका संयुक्त प्रतीक जौहर का खंडहर होगा।
देश के सबसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय को पिछले दो दशकों से महज इसलिए निशाना बनाया जा रहा है, क्योंकि उसकी बुनियाद की पत्थर के साथ उसके नाम में उस राजनेता का नाम जुड़ा है जिन्हें कोसने के लिए शायद अच्छे-खासे बजट का इंतजाम किया गया होगा। हमारे पड़ोस के कई देशों के कई बड़े राजनेता तक इसका गुणगान करते नहीं थकते, इसलिए भी इसके प्रति गुस्सा जायज है। देश के सबसे बड़े कृत्रिम मेधा के मेले में गलगोटिया जैसे विश्वविद्यालय ने देश की शैक्षणिक साख का गला घोट कर आपकी शिक्षा नीति पर सवाल उठा दिए थे तो यह और भी जरूरी लगने लगा होगा कि पुरानी सत्ता के बनाए विश्वविद्यालयों पर बुलडोजर चलाना शिक्षा के क्षेत्र में सबसे ज्यादा जरूरी है।
जौहर विश्वविद्यालय को इसलिए भी गिराया जाना जरूरी है, ताकि सनद रहे, इस देश में कोई सामाजिक, पर्यावरण कार्यकर्ता जिसका नाम सोनम वांगचुक था वह बीस दिनों से ज्यादा जंतर मंतर पर भूखा-प्यासा बैठा रहा। अदालत तक ने कह दिया कि जिंदगी अनमोल है, लेकिन सरकार के कान पर जूं नहीं रेंगी। शिक्षा मंत्री बने रहे। शिक्षा मंत्री की नाकामी पर किसी को एक फीसद भी शक नहीं है। चाहे वह पेपर लीक की कड़ी हो, चाहे शिक्षा का गिरता स्तर हो, चाहे फेल करने वाले बढ़ रहे हों, चाहे हजारों स्कूल बंद हो रहे हों। शिक्षा मंत्री को सिर्फ इसलिए बने रहना चाहिए, क्योंकि एक वर्ग चाहता है कि उन्हें हटाया जाना चाहिए।
एक बात और साफ कर देना चाहते हैं। हम भी कहते हैं, शिक्षा मंत्री को हटाया जाना चाहिए। हम धर्मेंद्र प्रधान को न तो निजी तौर पर जानते हैं, न उनसे निजी मुलाकात है, न निजी सहानुभूति और न निजी गुस्सा। हम उन्हें निकालने की मांग का समर्थन कर रहे हैं, क्योंकि देश प्रतीकों पर चलता है। उनको हटाया जाना सरकार के उस संकल्प का जाहिर बनेगा कि हां, हम बदलाव चाहते हैं। हम मौजूदा स्थिति के मुताबिक देश को नहीं चलाना चाहते हैं। इसलिए हम चाहते हैं कि धर्मेंद्र प्रधान जाएं। इसलिए जाएं ताकि देश की युवा पीढ़ी, देश का शिक्षित वर्ग, देश के शिक्षक और विद्यार्थी इस बात को लेकर आश्वस्त हो सकें कि एक सरकार है, जिसे लगता है कि कोई भी नेता अपनी जिम्मेदारी से कैसे बच सकता है, अगर उसके अधिकार क्षेत्र में नाकामी ही नाकामी हो।
स्वतंत्रता सेनानी और भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू आज इस दुनिया में नहीं हैं। लेकिन चीन के साथ जंग में देश की पराजय में उनकी जिम्मेदारी की हिस्सेदारी बढ़ती जा रही है। आज उनका नाम लेकर उन्हें कोसा जा रहा है, संसद के लिए चुने गए लोग उनके खिलाफ असंसदीय बातें बोल रहे हैं। इंदिरा गांधी अब नहीं हैं, लेकिन 1984 के दंगों के लिए आज तक उन्हें कठघरे में रखा गया है। आज उनके खिलाफ जिस तरह की बातें की जा रही हैं, कल को इतिहास की किताबें भी हमारे इस वर्तमान को लेकर शर्मिंदा होंगी।
राजीव गांधी पर आज तक भ्रष्टाचार का कोई आरोप साबित नहीं हुआ। फिर भी उन्हें देश में ‘मिस्टर टेन परसेंट’ कह कर पुकारा जाता है। हम उनकी बात तो कर ही नहीं रहे जो थोड़े समय के लिए आए, लेकिन वे भी अपनी जिम्मेदारियों से नहीं बच सके हैं। अब आप एक जिम्मेदारीमुक्त युग लाना चाहते हैं तो स्वागत है।
जौहर विश्वविद्यालय का गिरना काव्यात्मक न्याय का प्रतीक होगा। बहुत ज्यादा पैसे खर्च कर बनाए गए विश्वविद्यालय की कक्षाएं, प्रयोगशालाएं, पुस्तकालय भी अवैध हो सकते हैं, अगर उसके साथ कोई खास नाम जुड़ा हो। बुलडोजर के जरिए सबसे बड़ा संदेश जाएगा कि एक चीज जो सत्ता प्रतिष्ठान के मुताबिक गलत थी, उसे नेस्तनाबूद कर दिया गया। इसलिए जौहर विश्वविद्यालय का गिरना हम जरूरी मान रहे हैं। हम चाहते हैं कि जो बुलडोजर उधर की ओर चले हैं, वे किसी दबाव में नहीं आएं। जौहर यूनिवर्सिटी की ईंट से ईंट गिरा कर ही बाहर निकलें।
2022 के चुनाव के बाद संदेश मिल चुका है कि बुलडोजर आपका सबसे बड़ा संदेशवाहक है। बुलडोजर की सार्थकता यह है कि विपक्ष वाली सरकार के राज्य में कमल से ज्यादा बुलडोजर का निशान याद दिलाया जाता है कि हमारी सरकार बनाओ और हर समस्या को ध्वस्त करने के लिए बुलडोजर बुलाओ। वह पुराने समय की बातें हैं जब शिक्षा संस्थानों में प्रतीक के रूप में वाग्देवी, कलम, दवात होते थे। जौहर यूनिवर्सिटी के धराशायी होने के बाद शिक्षा संस्थानों के प्रवेश द्वार पर बुलडोजर स्थापित होना चाहिए।
अब हमारी बुलडोजरबद्ध प्रार्थना है कि सरकार जल्द से जल्द जौहर विश्वविद्यालय को गिराए और धर्मेंद्र प्रधान को न हटाए। सोनम वांगचुक के साथ जो होना होगा हो जाए, उनके साथ भूख हड़ताल कर रहे युवाओं का शरीर कंकाल में बदले तो बदले। देश की अदालतें जो कहती हैं, कहती रहें, देश का प्रबुद्ध वर्ग जो कहता है, कहता रहे, आपको उस पर न तो कान देना है, न ध्यान देना है। बस धर्मेंद्र प्रधान अपने पद पर बने रहने चाहिए। रक्षा मंत्री का वाक्य ही आपके कर्तव्य-पथ का ध्येय होना चाहिए कि इस सरकार में इस्तीफे नहीं होते हैं।
सरकार को अपने फैसले पर बने रहने का पूरा हक है। सरकार, धर्मेंद्र प्रधान को अपना मान-सम्मान बनाए हुए है तो उसकी ठोस वजह होगी। धर्मेंद्र प्रधान ने वैसे नतीजे दिए होंगे, जो सरकार को चाहिए, भले ही वे शिक्षा व किसी अन्य क्षेत्र में हों। आज से पहले इतना भाईचारा भी तो किसी सरकार में नहीं दिखा था। पेट्रोल व एथेनॉल पर सड़क-परिवहन मंत्री ने जो मसीहाई रूप दिखाया है, वह सारी सत्ताओं के लिए संदेश है कि काम के नतीजे वहां नहीं खोजिए, जहां मंत्री जी की कुर्सी है।
अभी तो हमारी सबसे बड़ी शिकायत जंतर मंतर पर बैठे लोगों से है। आपने कैसे मान लिया कि धर्मेंद्र प्रधान नाकाबिल मंत्री हैं? आपने कैसे मान लिया कि उन्होंने अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाई? आपने कैसे मान लिया कि उनकी जिम्मेदारी शिक्षा-व्यवस्था में सुधार है? आप लोग जंतर मंतर का दुरुपयोग ऐसे व्यक्ति को परेशान करने में कर रहे हैं, जो सरकार से मिली हर जिम्मेदारी को अच्छी तरह से निभा रहे हैं। क्या आपको जंतर मंतर से उत्तर प्रदेश नहीं दिख रहा है? क्या आपको सत्ता का निशान बुलडोजर नहीं दिख रहा है? अब कृपया जंतर मंतर और वेधशाला का इतिहास मत बताइएगा, क्योंकि इतिहास बदला जा रहा है।
