देश में पानी को लेकर चिंता अब सिर्फ एक पर्यावरणीय मुद्दा नहीं रही, बल्कि यह आने वाले समय की सबसे बड़ी चुनौतियों में बदलती जा रही है। विश्व जल दिवस 2026 के मौके पर यह सवाल और भी गंभीर हो जाता है कि क्या हम समय रहते सचेत होंगे या आने वाली पीढ़ियों को पानी के लिए संघर्ष करना पड़ेगा। आज भी भारत के कई हिस्सों में पानी की कमी सिर्फ गर्मियों की समस्या नहीं, बल्कि सालभर की हकीकत बन चुकी है।
बुंदेलखंड जैसे इलाकों का अनुभव इस संकट की गंभीरता को और साफ करता है। कभी यह क्षेत्र सूखे, पलायन और बदहाली का प्रतीक माना जाता था। यहां पानी के अभाव में खेती चौपट हो जाती थी, लोग गांव छोड़ने को मजबूर हो जाते थे और जीवन का संतुलन बिगड़ जाता था। लेकिन इसी क्षेत्र में कुछ प्रयासों ने यह भी साबित किया कि अगर समाज मिलकर काम करे, तो हालात बदले जा सकते हैं।
पानी को लेकर अक्सर यह सोच बनाई जाती है कि यह सरकार की जिम्मेदारी है, लेकिन हकीकत इससे अलग है। पानी का संरक्षण एक सामूहिक जिम्मेदारी है। अगर समाज खुद जागरूक नहीं होगा, तो कोई भी योजना लंबे समय तक सफल नहीं हो सकती। यही कारण है कि आज जल संरक्षण को जन आंदोलन बनाने की जरूरत है।
भारत में दुनिया की 18 फीसदी आबादी रहती है, जबकि जल संसाधन मात्र 4 फीसदी है
भारत में जल संकट के आंकड़े भी कम चिंताजनक नहीं हैं। देश में दुनिया की लगभग 18 प्रतिशत आबादी रहती है, लेकिन हमारे पास केवल 4 प्रतिशत जल संसाधन हैं। यह असंतुलन अपने आप में एक चेतावनी है। भूजल का अत्यधिक दोहन, अनियमित वर्षा, बढ़ती आबादी और शहरीकरण ने स्थिति को और जटिल बना दिया है।
वैश्विक स्तर पर भी स्थिति चिंताजनक है। विश्व जल दिवस के संदर्भ में जारी आंकड़ों के मुताबिक, दुनिया भर में करोड़ों लोग आज भी स्वच्छ पेयजल से वंचित हैं। कई देशों में पानी को लेकर संघर्ष की स्थिति बन चुकी है और भविष्य में यह संघर्ष और बढ़ सकता है। विशेषज्ञ तो यहां तक कह रहे हैं कि आने वाले समय में युद्ध का कारण पानी भी हो सकता है।
इसी संदर्भ में बुंदेलखंड का एक मॉडल अक्सर चर्चा में आता है, जिसे जखनी मॉडल के नाम से जाना जाता है। इसका मूल विचार बेहद सरल है – “खेत पर मेड़ और मेड़ पर पेड़।” इस मॉडल में वर्षा के पानी को खेतों में ही रोकने पर जोर दिया जाता है, जिससे भूजल स्तर बढ़ता है और खेती को स्थिरता मिलती है।
इस मॉडल के लागू होने के बाद बुंदेलखंड के कई गांवों में बड़ा बदलाव देखने को मिला। जहां पहले कुएं और तालाब सूख जाते थे, वहां अब सालभर पानी उपलब्ध रहने लगा। खेती में सुधार हुआ, पैदावार बढ़ी और लोगों का पलायन भी कम हुआ। यह बदलाव इस बात का प्रमाण है कि छोटे-छोटे प्रयास भी बड़े परिणाम दे सकते हैं।
जल संरक्षण के लिए तकनीकी उपायों के साथ-साथ व्यवहार में बदलाव भी जरूरी है। उदाहरण के लिए, वर्षा जल संचयन एक बेहद प्रभावी तरीका है। अगर किसी घर की छत पर गिरने वाले पानी को सही तरीके से संग्रहित किया जाए, तो हजारों लीटर पानी बचाया जा सकता है। इसी तरह, रोजमर्रा के जीवन में भी छोटी-छोटी सावधानियां बहुत फर्क डाल सकती हैं, जैसे नल खुला न छोड़ना, जरूरत के अनुसार ही पानी का उपयोग करना और रिसाव को तुरंत ठीक करना।
खेती के क्षेत्र में भी पानी बचाने के कई उपाय हैं। ड्रिप सिंचाई और स्प्रिंकलर तकनीक का उपयोग पानी की खपत को काफी कम कर सकता है। इसके अलावा, पारंपरिक तरीकों को भी नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि हमारे पूर्वज जल संरक्षण के मामले में काफी समझदार थे।
जल संकट का एक बड़ा असर खाद्य सुरक्षा पर भी पड़ सकता है। कई रिपोर्ट्स में यह चेतावनी दी गई है कि अगर पानी की कमी इसी तरह बढ़ती रही, तो आने वाले दशकों में खाद्यान्न उत्पादन में भारी गिरावट आ सकती है। इसका सीधा असर आम लोगों की जिंदगी पर पड़ेगा। नदियों की स्थिति भी चिंता का विषय है। गंगा, यमुना और ब्रह्मपुत्र जैसी नदियां, जिन्हें जीवन रेखा माना जाता है, उनके जल स्तर में भी गिरावट देखी जा रही है। हिमालय के ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, जिससे भविष्य में पानी की उपलब्धता पर गंभीर असर पड़ सकता है।
शहरों में स्थिति और भी जटिल होती जा रही है। तेजी से बढ़ते शहरीकरण के कारण पानी की मांग लगातार बढ़ रही है, लेकिन आपूर्ति उसी अनुपात में नहीं बढ़ पा रही। कई बड़े शहर पहले से ही पानी की किल्लत झेल रहे हैं और आने वाले समय में यह समस्या और गहराने की आशंका है। जल संकट का सीधा संबंध स्वास्थ्य से भी है। दूषित पानी के कारण कई बीमारियां फैलती हैं, जो विशेष रूप से बच्चों और बुजुर्गों के लिए खतरनाक होती हैं। इसलिए स्वच्छ पानी की उपलब्धता सिर्फ सुविधा नहीं, बल्कि एक बुनियादी आवश्यकता है।
इस पूरे परिदृश्य में सबसे जरूरी बात यह है कि जल संरक्षण को केवल एक अभियान के रूप में नहीं, बल्कि जीवनशैली का हिस्सा बनाया जाए। जब तक हर व्यक्ति अपने स्तर पर जिम्मेदारी नहीं निभाएगा, तब तक बड़े बदलाव की उम्मीद करना मुश्किल है। विश्व जल दिवस 2026 हमें यही संदेश देता है कि अभी भी समय है। अगर हम आज जागरूक हो जाएं, तो आने वाली पीढ़ियों को पानी के लिए संघर्ष नहीं करना पड़ेगा। लेकिन अगर हमने लापरवाही बरती, तो स्थिति इतनी गंभीर हो सकती है कि उसे संभालना मुश्किल हो जाएगा।
अंततः, पानी सिर्फ एक संसाधन नहीं, बल्कि जीवन का आधार है। इसे बचाना हमारी जिम्मेदारी भी है और आवश्यकता भी। बूंद-बूंद की कीमत समझकर ही हम इस संकट से बाहर निकल सकते हैं और एक सुरक्षित भविष्य की ओर बढ़ सकते हैं।
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पानी जीवन के अस्तित्व के लिए अतिआवश्यक तत्वों में से एक है। देश में वॉटर लेवल लगातार कम होना चिंता का विषय बना हुआ है। भारत में भूजल का उपयोग दुनिया में सर्वाधिक होता है। अमेरिका और चीन जैसे देश भारत से बहुत कम भूजल का उपयोग करते हैं। भारत में प्रति व्यक्ति जल खपत भी बहुत ज्यादा है। देश की राजधानी दिल्ली में ही प्रति व्यक्ति प्रतिदिन जल की खपत 272 लीटर है। जल खपत की तुलना में जल संचयन कठिन होता जा रहा है। इससे जल को लेकर गंभीर संकट पैदा हो गया है। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक
लेखक पद्मश्री उमा शंकर पांडेय जल संरक्षण के क्षेत्र में सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता हैं, जो ‘खेत में मेड़, मेड़ पर पेड़’ अभियान के लिए जाने जाते हैं।
