ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर पूरे विश्व में एक ख़ामोशी सी थी, एक डर का साया था। कहीं बिजली, ऊर्जा की आड़ में ईरान परमाणु बम न बना रहा हो। इस समस्या का समाधान ऐसे हुआ कि 2015 में ईरान और विश्व की छह महाशक्तियों — अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, रूस और चीन ने एक समझौता किया, जिसको नाम दिया गया Joint Comprehensive Plan of Action या JCPOA जिसका सरल शब्दों में मतलब है कि ईरान अपना परमाणु कार्यक्रम सीमित करेगा, बदले में दुनिया उसके ऊपर लगे प्रतिबंध हटा देगी।

ईरान कहता था कि उसका कार्यक्रम सिर्फ बिजली और ऊर्जा के लिए है लेकिन परमाणु टेक्नोलॉजी का दोहरा उपयोग किया जा सकता है जो यूरेनियम शहरों को रोशन करता है, वही थोड़ा और बड़े स्तर पर परमाणु बम भी बना सकता है।

ईरान के परमाणु हथियार बनाने से क्या है दिक्कत?

विश्व की सबसे बड़ी चिंता यह थी कि अगर ईरान परमाणु हथियार बना लेता है तो मध्य पूर्व (मिडिल ईस्ट) में हथियारों की होड़ शुरू हो जाती, सऊदी अरब-ईरान प्रतिद्वंद्विता तेज हो जाती, इजरायल के साथ तनाव चरम पर पहुँच जाता और अमेरिका तक युद्ध की आँच पहुँचने की आशंका बढ़ जाती। JCPOA समझौते ने इसी परिस्थिति को बदला मगर उसके बाद आखिर क्या-क्या बदला?

ईरान ने अपने यूरेनियम के स्टॉक घटाए, हजारों सेंट्रीफ्यूज तोड़े, अंतरराष्ट्रीय निरीक्षकों को परमाणु संयत्रों का एक्सेस दिया। इतना तो हो गया, सरदर्दी कुछ हद तक गयी, बदले में ईरान पर लगे तेल निर्यात और बैंकिंग पाबंदियां हटाई गईं। ईरान की अधमरी अर्थव्यवस्था दोबारा सांस लेने लगी। तेल निर्यात बढ़ा, विदेश कंपनियां लौटने लगीं लेकिन 2018 में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एकतरफा तरीके से समझौते से अमेरिका को बाहर कर लिया। उनकी दलील थी कि यह समझौता कमजोर है, ईरान के मिसाइल कार्यक्रम और क्षेत्रीय प्रभाव को नहीं रोकता। फिर क्या था, जैसे ही ईरान पर दोबारा प्रतिबंध लगे, उसने भी अपनी चाल बदली। सावधानीपूर्वक बना हुआ संतुलन दरक सा गया।

विश्व की राजनीति पर JCPOA का प्रभाव

क्या होता अगर समझौता टिक जाता? हो सकता है कि मध्य पूर्व ज्यादा स्थिर होता; हो सकता है परमाणु वृद्धि का खतरा कम हो जाता, सैन्य हमलों की संभावना घटती, तेल बाजार में अस्थिरता कम हो जाती। तेल की कीमतें तो तनाव के छोटे से संकेत पर ही घबराई चिड़िया की तरह उड़ जाती हैं। यूरोपीय देश JCPOA की ज़रूरत तो समझ रहे थे, और समझौते के साथ खड़े रहे, मगर अमेरिका बाहर हो गया।

अमेरिका के इस कदम से ट्रांस-अटलांटिक संबंधों में भी दरार दिखी। रूस और चीन ने ईरान से अपने संबंध और मजबूत किए। ग्लोबल राजनीतिक समीकरण काफी बदल गये। गैर-पश्चिमी गुटों की ओर झुकाव बढ़ा। वैश्विक गणित की शतरंज की बिसात ही बदल गयी। और अब डोनाल्ड ट्रंप का दावा है कि अगर उन्होंने अमेरिका को इस अग्रीमेंट से बाहर नहीं निकला होता तो ईरान के पास परमाणु बम बहुत पहले आ गया होता। क्या लगता है आपको, उनका आकलन कितना सही है? चलिए उर्दू शायर कतील शिफ़ाई की इस शायरी पर इसे छोड़ते हैं:

खुला है झूठ का बाजार, आओ सच बोलें
न हो बला से ख़रीदार आओ सच बोलें

सुकूत छाया है इंसानियत की कद्रों पर
यही है मौक़ा-ए-इजहार आओ सच बोलें

US-Israel Iran War LIVE Updates