हमारे चतुर्दिक भय का एक घना आवरण निर्मित है। ऐसा आवरण, जो हमारे जीवन की अनिवार्यता बन चुका है। हम ‘होमो सेपियंस’ यानी मानव प्रजाति के प्राणधारी, एक भ्रूण के रूप में अपनी मां के गर्भ में आने से लेकर इस दुनिया को अलविदा कहने तक की यात्रा में हर क्षण भय के साए में ही जीते हैं। जन्म के बाद मनुष्य आजीवन भय में ही जीता है।
बचपन में माता-पिता बच्चे पर निरंतर ‘यह करो… वह करो… यह मत करो… वह मत करो’ के चाबुक चलाते रहते हैं। निर्देशों की रंचमात्र भी अवहेलना करने पर वे बच्चे को डांट-फटकार, तिरस्कार और पिटाई तक की सजा दिया करते हैं। परिणामस्वरूप बच्चा अपने बचपन को स्वच्छंद होकर नहीं जी पाता। बहुत सारे काम वह अपनी अनिच्छा के बावजूद सिर्फ मां-बाप की नाराजगी और सजा के भय के कारण करता है। यहां तक कि बहुत सारे कार्य, जो उसे स्वाभावतः करने चाहिए, उन्हें भी वह भयवश करने का आदी हो जाता है।
भय में जीने की बचपन में पनपी यह प्रवृत्ति आदमी को जीवनपर्यंत अपने पाश में ग्रसित किए रहती है। बच्चा विद्यालय जाता है, तो पढ़ाई वह आमतौर पर शिक्षक के भय के कारण करता है। उसके भविष्य की दिशा माता-पिता निर्धारित करते हैं और बच्चा उसे स्वीकार कर लेता है। हो सकता है कि बच्चा चित्रकार बनना चाहता हो और माता-पिता उसे डॉक्टर बनाने पर तुले हों। हो सकता है कि बच्चे की रुचि संगीत में हो, लेकिन उसके मां-बाप उसे प्रशासनिक अधिकारी बनाने की महत्त्वाकांक्षा पाले बैठे हों। चूंकि बच्चा अपनी आवश्यकताओं के लिए पूरी तरह अपने माता-पिता पर निर्भर होता है, इसलिए उस निर्भरता के भय के कारण वह माता-पिता द्वारा निर्धारित दिशा में चल पड़ता है।
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आदमी को दया, करुणा, ममता और सहिष्णुता जैसे मानवीय गुणों से संपृक्त करने में भी भय की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। बच्चा यदि खेल-खेल में या गलती से भी एक चींटी या किसी कीड़े को मार दे, तो अभिभावक उसे तुरंत ‘पाप लगने’ का भय दिखाता है। झूठ बोलोगे, तो पाप लग जाएगा… चोरी करोगे, तो पाप लग जाएगा… बड़ों की बात नहीं मानोगे, तो पाप लग जाएगा। यह पाप लगने का भय आदमी की बाल्यावस्था में इतना घनीभूत रहता है कि उसके अचेतन में सदा-सर्वदा के लिए अंकित हो जाता है। फिर आदमी आजीवन पाप के भय से संचालित होता रहता है।
दुनिया का चाहे कोई भी धर्म हो, सभी का अस्तित्व भय के आधार पर ही टिका है। हर धर्म के फैलाव का कारक उसे न मानने से होने वाली हानि या सजा का भय ही है। स्वर्ग, नरक, मोक्ष, मुक्ति आदि की धारणाएं भय के ही औजार हैं। आदमी अगर किसी विषम स्थिति में फंस जाता है या उसे किसी अनिष्ट की आशंका होती है, तो वह तत्काल अपने आराध्य की शरण में भागता है। आराध्य के पास उसके जाने का कारण उसके प्रति भक्ति या प्रेम कितना होता है, यह कहना कठिन है, लेकिन उस अनिष्ट की आशंका जरूर होती है, जिससे वह बचना चाहता है। अनिष्ट या मरणोपरांत नरक का भय न हो, तो उपासना गृहों में ताले पड़ जाएं। ऐसे भी लोग होते हैं, जो आदमी के अचेतन में बैठे भय को उद्वेलित करके अपना उल्लू सीधा करते हैं।
भय का एक सार्थक पक्ष यह है कि अगर भय न रहे, तो आदमी निष्क्रिय हो जाए। यहां तक कि जो कार्य उससे स्वाभाविक प्रक्रिया में अपेक्षित हैं, उनके लिए भी वह भय का कारक ढूंढ़ने लगता है। अधिकतर कर्मचारी नौकरी में अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन अपना कर्तव्य मानकर नहीं, बल्कि अपने उच्चाधिकारियों के भय या नौकरी पर आंच आने के डर से करते हैं। इसी प्रकार आदमी तमाम सामाजिक रिवाजों तथा मान्यताओं को न चाहते हुए भी सिर्फ लोकलाज और अपयश के भय के कारण ढोता है। यहां तक कि आदमी अपने पारिवारिक जीवन में भी बहुत सारे कार्य और समझौते भयवश, यानी गृहकलह से बचने के लिए करता है। कमजोर लोग बाहुबलियों से मिले अपमान और ज्यादती को उनकी ताकत के भय के कारण चुपचाप सहन कर लेते हैं। पुलिस विभाग का तो सारा दारोमदार ही उनके डंडे के भय की बदौलत है।
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आदमी की आपराधिक प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने में भी भय की बहुत बड़ी भूमिका है। देखने में आता है कि सामान्य नियमों का पालन भी आदमी एक जागरूक नागरिक के तौर पर कम, बल्कि कानून के डर के कारण ज्यादा करता है। उदाहरण के लिए, मोटरसाइकिल चलाते समय हेलमेट पहनने, कार में सीट बेल्ट बांधने और वाहन को निर्धारित गति से चलाने के नियम आदमी की सुरक्षा को ध्यान में रखकर बनाए गए हैं। लेकिन ज्यादातर लोग इन नियमों का पालन अपनी सुरक्षा की सोच से नहीं, बल्कि यातायात पुलिस द्वारा पकड़े जाने और चालान के भय से करते हैं। अगर टीटीई द्वारा पकड़े जाने का डर न हो, तो बहुत सारे लोग ट्रेन में बिना टिकट यात्रा करने लगें। अगर न्यायालय और जेल का भय न हो, तो समाज में अराजकता फैल जाए।
सच यह है कि भय ही वह हथियार है, जिसकी बदौलत शासक वर्ग शासन करता है। भय की स्थापना के लिए शासक वर्ग विविध प्रकार के कानून बनाता है और उन कानूनों के उल्लंघन के लिए सजाएं निर्धारित करता है। अपने बनाए कानूनों के अनुपालन के लिए वह नई-नई व्यवस्थाएं और नए-नए उपकरण निर्मित करता है। सीसीटीवी कैमरे, मोबाइल निगरानी और नार्को टेस्ट आदि भय के नवीनतम उपादान हैं।
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तात्पर्य यह कि समाज को सजाने-संवारने और सुरक्षित बनाए रखने के लिए भय को अनिवार्य मान लिया गया है। अगर भय न हो, तो समाज में अनैतिक और आपराधिक मानसिकता वाले लोगों पर कोई अंकुश ही नहीं होगा।
