आज के तकनीकी दौर में बदलती जीवनशैली के साथ कैंसर का खतरा भी लगातार बढ़ता जा रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक, दुनिया में हर साल एक करोड़ से ज्यादा लोगों की मौत कैंसर से होती है। गरीब और विकासशील देशों में यह आंकड़ा सबसे ज्यादा है। भारत ने पोलियो पर नियंत्रण पाने में कामयाबी हासिल की है, लेकिन ऐसी तमाम बीमारियां हैं जो देश के लिए किसी चुनौती से कम नहीं हैं। कैंसर भी इनमें एक है। भारत में कैंसर तेजी से पैर पसार रहा है। इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर (आईएआरसी) का अनुमान था कि वर्ष 2025 के अंत तक हर पांच में से एक पुरुष और छह महिलाओं में से एक महिला कैंसर से पीड़ित होगी।
यह अनुमान अब वास्तविक आंकड़ों में तब्दील होता दिखाई दे रहा है। एक अध्ययन रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में हर दो मिनट में तीन लोगों की मौत कैंसर से होती है। ऐसे में आने वाले वक्त में हर साल बीस लाख से ज्यादा मौतें कैंसर से होने का अनुमान है। केंद्र सरकार के आंकड़ों से पता चलता है कि वर्ष 2024 में देश भर में कैंसर के पंद्रह लाख से अधिक मामले सामने आए, जबकि वर्ष 2023 में यह आंकड़ा करीब 14 लाख 96 हजार था। इसी तरह वर्ष 2022 में 14 लाख 61 हजार से ज्यादा और 2021 में 14 लाख 26 हजार से अधिक कैंसर के मामले दर्ज किए गए। यानी हर वर्ष कैंसर के मरीजों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है।
आईएआरसी के आंकड़े बताते हैं कि भारत में कैंसर से पीड़ित पुरुषों में से 16.3 फीसदी की मौत मुंह के कैंसर से, 8 फीसदी की फेफड़े के कैंसर से और 6.8 फीसदी की पेट के कैंसर से होती है। पिछले कुछ वर्षों में पुरुषों में मुंह का कैंसर तेजी से बढ़ा है। यह तंबाकू सेवन से जुड़ा है, जबकि धूम्रपान से होने वाले कैंसर में कुछ कमी आई है। पिछले एक दशक में कैंसर से होने वाली मौतों में दोगुनी रफ्तार देखी गई है, जबकि केंद्र और राज्य सरकारें इस बीमारी को लेकर सक्रियता का दावा करती हैं। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के मुताबिक, सबसे ज्यादा आबादी वाले उत्तर प्रदेश में वर्ष 2024 में दो लाख से ज्यादा कैंसर के मामले सामने आए। इसके बाद महाराष्ट्र में करीब एक लाख सत्ताईस हजार मामले दर्ज हुए। पश्चिम बंगाल में करीब एक लाख अठारह हजार, बिहार में एक लाख पंद्रह हजार, तमिलनाडु में लगभग 98 हजार और कर्नाटक में करीब 95 हजार मामले सामने आए। अन्य राज्यों में भी स्थिति चिंता पैदा करने वाली है।
देश में कैंसर उन राज्यों में अधिक तेजी से बढ़ रहा है जो आर्थिक रूप से पिछड़े माने जाते हैं। बिहार में हर साल तकरीबन एक लाख मामले सामने आते हैं। वहां तंबाकू सेवन करने वाले और मुंह के कैंसर से पीड़ित मरीजों की संख्या अधिक है। महिलाओं में भी कैंसर के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। उत्तर प्रदेश, झारखंड, मध्य प्रदेश, दिल्ली, राजस्थान, कर्नाटक और केरल जैसे राज्यों में भी कैंसर का प्रसार बढ़ रहा है। वैश्विक स्तर पर वर्ष 2022 में लगभग दो करोड़ नए मामले सामने आए, जिनमें से 97 लाख लोगों की मृत्यु हो गई। अनुमान है कि वर्ष 2035 तक कैंसर से मृत्यु दर में 78 फीसदी और मरीजों की संख्या में 70 फीसदी की वृद्धि हो सकती है। भारत में हर साल 10 से 14 लाख नए मामले सामने आते हैं, जिनमें से 77 फीसदी से अधिक की मौत हो जाती है।
कैंसर से बढ़ती मौतों की प्रमुख वजह समय पर पहचान न होना
कैंसर से बढ़ती मौतों की प्रमुख वजह समय पर पहचान न होना, स्वास्थ्य के प्रति लापरवाही, जागरूकता का अभाव और समय पर इलाज न मिल पाना है। एक सर्वेक्षण में सामने आया है कि भारत में चिकित्सकों की कमी भी बड़ी वजह है। आंकड़ों के अनुसार, देश में दो हजार कैंसर मरीजों पर महज एक चिकित्सक है, जबकि अमेरिका में यह अनुपात सौ मरीजों पर एक चिकित्सक का है।
पिछले कुछ वर्षों में महिलाओं में कैंसर का प्रसार तेजी से बढ़ा है। इसके प्रमुख कारणों में बदलती जीवनशैली, वंशागत जटिलताएं और गुणसूत्रों में बदलाव शामिल हैं। ‘पैपिलोमा’ विषाणु से ग्रीवा और गर्भाशय कैंसर का खतरा बढ़ रहा है। एचआईवी संक्रमण और ‘हेलिकोबैक्टर’ जीवाणु से भी कैंसर की आशंका बढ़ती है। तनाव, शारीरिक गतिविधियों का अभाव और आधुनिक खानपान भी जिम्मेदार हैं। गरीब मजदूर-किसानों में कैंसर से मौत की दर अधिक है। खासकर बिहार, ओडिशा, पश्चिम बंगाल और झारखंड में खदानों, सीमेंट, पत्थर, ईंट-भट्टों और रासायनिक संयंत्रों में काम करने वाले मजदूरों में जोखिम अधिक है।
सरकार की ओर से जागरूकता अभियान चलाए गए हैं, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में उनका असर सीमित है। केवल आंकड़ों से जागरूकता संभव नहीं है। लोगों के मन से कैंसर का डर निकालना भी जरूरी है। एक सर्वेक्षण में पाया गया कि कैंसर की जानकारी मिलते ही व्यक्ति के मन में मौत का भय हावी हो जाता है, जिससे मानसिक और शारीरिक जटिलताएं बढ़ती हैं।
सरकारी तंत्र, गैरसरकारी संगठन और समाज को मिलकर कैंसर के खिलाफ सामूहिक प्रयास करने होंगे। डरने की बजाय डटकर मुकाबला करना होगा। नीति निर्माताओं को इस संकट को केंद्र में रखकर नई योजनाएं बनानी होंगी, तभी कैंसर की रोकथाम की दिशा में ठोस कदम उठाए जा सकेंगे।
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हड्डियों में दर्द होना आम समस्या है। कभी यह ज्यादा चलने-फिरने, चोट लगने, कैल्शियम की कमी या बढ़ती उम्र के कारण हो सकता है। आप जानते हैं कि अक्सर नजरअंदाज किया जाने वाला ये दर्द बोन कैंसर (Bone Cancer) या किसी दूसरे कैंसर का भी संकेत हो सकते हैं। विश्व कैंसर दिवस 2026 के मौके पर डॉक्टरों का कहना है कि अगर हड्डियों का दर्द लंबे समय तक बना रहे, लगातार बढ़ता जाए या फिर रात में ज्यादा परेशान करे तो आप इसे हल्के में नहीं लें। परेशानी की बात तब और ज्यादा है जब दवा का इस्तेमाल करने के बाद भी दर्द जस का तस बना रहे। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक
