कुछ बातें हैं जिनको स्पष्ट शब्दों में ही कहा जा सकता है। इसलिए आगे बढ़ने से पहले मैं कहना चाहती हूं कि ईरान की इस्लामी सरकार के मैं खिलाफ रही हूं शुरू से। तब से जब अयातुल्ला खामेनेई तेहरान वापस आए थे 1979 में और उनके आने से उस क्रांति की शुरुआत हुई थी, जिसका अंजाम था ईरान पर कट्टरपंथी इस्लामी निजाम का थोपा जाना। इस इस्लामी इंकलाब का विरोध मैंने इस आधार पर किया है कि एक तो मैं मानती हूं कि साधु-संतों को धर्म-मजहब के दायरे से निकलना नहीं चाहिए। जब भी इस दायरे से निकल कर ये लोग राजनीति और शासन में दखल देते हैं, अंजाम हमेशा खराब होता है, खासतौर से महिलाओं को लेकर। ईरान में तशद्दुत शाह के समय भी था, लेकिन कम से कम हर औरत को काली चादरों में लपेट कर अदृश्य नहीं किया गया था।
उनको इजाजत थी अपना जीवन अपनी मर्जी से जीने की। पढ़-लिख कर अपने पैरों पर खड़े होने की, अपनी मर्जी से शादी करने की, अपनी मर्जी की नौकरी करने की, अपनी मर्जी के कपड़े पहनने की। ये सारी चीजें बंद हो गई थीं ईरान की महिलाओं के लिए, जबसे अयातुल्ला का राज कायम हुआ था। पिछले 40 वर्षों में महिलाओं को इतना भी हक नहीं था कि उनके साथ अगर कोई अन्याय हो, तो उसके लिए वह किसी न्यायालय में जाकर इंसाफ की गुहार लगा सकें। जिन शेरनियों ने आवाज उठाई अन्याय के खिलाफ, उनको जेलों में डाल दिया जाता था और जेलों में अत्याचार बर्बरता से किया जाता था।
ईरान कभी इतना अमीर देश था कि खाड़ी के सबसे अग्रणी देशों में उसकी गिनती थी। आज भी उसकी जगह वहां होती, अगर इस देश के इस्लामी शासकों ने सारा धन जिहादी आतंकवाद को दुनिया में फैलाने पर न लुटाया होता। इन शासकों की नजरों में पश्चिमी देश उनके सबसे बड़े दुश्मन हैं, जिनमें अमेरिका और इजराइल सबसे ऊपर है। उनके साथ लड़ने के लिए ईरान ने हमास और हिजबुल्ला जैसी सेनाएं तैयार की हैं। ये ऐसी सेनाएं हैं, जिन्होंने लेबनान और सीरिया जैसे प्रगतिशील एवं संपन्न देशों को बर्बाद कर दिया है। कहने का मतलब मेरा यह है कि अमेरिका और इजराइल का ईरान पर युद्ध जायज है और शायद दुनिया के भले के लिए अनिवार्य भी।
समस्या दुनिया की यह है कि अमेरिका के राष्ट्रपति अपनी सेना की शक्ति पर कुछ ज्यादा ही भरोसा करने लगे हैं, वेनेजुएला में निकोलस मादुरो को हटाने के बाद। सो सोचा उन्होंने यही था कि अयातुल्ला अली खामेनेई को मारने के बाद ईरान में लोकतंत्र अपने आप आ जाएगा। इतिहास के बारे में कम जानते हैं डोनाल्ड ट्रंप और अपने सलाहकारों को उन्होंने चुना है उनकी वफादारी को आधार बना कर न कि उनकी काबिलियत पर। ऊपर से उन्होंने पूरा भरोसा किया इजरायल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू पर जो अभी तक निकले नहीं हैं गाजा के दलदल से, लेकिन तैयार हो गए हैं उस देश को खत्म करने के लिए जिसके शासक खुल कर कहते आए हैं कि इजरायल का नामो-निशान जब तक दुनिया से मिटेगा नहीं, वे शांत नहीं बैठेंगे। ट्रंप भी अब इस नए युद्ध के दलदल में फंसे दिखते हैं। तो आगे क्या होगा? भारत को क्या करना चाहिए?
कांग्रेस के नेताओं ने ऊंची आवाज में कहा है कि भारत को ईरान का साथ देना चाहिए। उनकी आवाज को और बुलंद कर रहे हैं अपने देश के ‘लिबरल’ और ‘वामपंथी’। मुखर लेखिका और कार्यकर्ता अरुंधति राय ने पिछले सप्ताह दिल्ली की एक सभा में कहा कि वह शर्मिंदा हैं सरकार की ‘कायरता’ को देख कर, उसकी ‘निर्बलता’ को देख कर। उनकी इस बात का सोशल मीडिया पर हजारों लोगों ने समर्थन जताया है, जिनमें अधिकतर वामपंथी और जिहादी सोच के लोग हैं। इनकी नजरों में हमेशा अमेरिका और पश्चिमी यूरोप के देश गलत होते हैं। ईरान और अफगानिस्तान जैसे देशों में इनको कभी बर्बरता, इस्लामी कट्टरता और धार्मिक शासकों की गलतियां नहीं दिखती हैं।
मेरी अपनी राय है कि भारत को कभी उन देशों के गठबंधन में नहीं होना चाहिए, जिनमें हैं चीन, रूस और उत्तर कोरिया। हमको साथ देना चाहिए हमेशा उन लोकतांत्रिक देशों का जिनमें कम से कम बोलने की तो आजादी होती है। नरेंद्र मोदी ने स्पष्ट किया है कई बार कि भारत युद्ध को किसी भी समस्या का समाधान नहीं मानता है, लेकिन वह निष्पक्ष नहीं है, शांति के पक्ष में है। इसमें गलत क्या है?
हम क्यों ईरान का साथ दें इस समय? क्यों आंसू बहाएं अयातुल्ला खामेनेई के जाने पर, जब उन्होंने अपने ही लोगों के साथ इतना जुल्म ढाया है कि अनुमान लगाया जाता है कि पिछले महीने जब ईरान के आम लोगों ने सरकार के खिलाफ प्रदर्शन किए, तो अयातुल्ला ने निहत्थे लोगों पर गोली चलाने का आदेश दिया। अनुमान है कि बीस हजार से तीस हजार लोग मारे गए थे इस आदेश के बाद।
माना कि डोनाल्ड ट्रंप ऐसे राजनेता हैं जो कई काम बिना सोचे समझे करते हैं, लेकिन कम से कम उनके देश में उनके खिलाफ रोज बोलने वाले हजारों लोग हैं, जिनको गलियों या सड़कों पर नहीं मारा जाता है। कम से कम अमेरिका में लोकतंत्र की जड़ें इतनी मजबूत हैं कि अनुमान लगाया जा रहा है कि नवंबर में जो चुनाव होने वाले हैं कांग्रेस और सीनेट के लिए, उसमें डोनाल्ड ट्रंप बुरी तरह पिटने वाले हैं। कुछ और नहीं, तो इसलिए कि ट्रंप जीते थे इस वादे पर कि महंगाई को खत्म कर देंगे। इस युद्ध के बाद तेल की कीमत इतनी बढ़ जाएगी कि उनके जीतने के आसार कम होते जा रहे हैं।
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अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान के खिलाफ 28 फरवरी को बिना सोचे-समझे शुरू किए गए युद्ध के नतीजे दुनिया भर में बहुत दूर तक जाने वाले हैं। ‘आपरेशन एपिक फ्यूरी’ के दो हफ्तों में ईरान तबाह हो गया लगता है, लेकिन हारा नहीं है। युद्ध के पहले ही दिन अयातुल्ला खामेनेई सहित उसके शीर्ष नेतृत्व की पहली पंक्ति खत्म हो गई थी। उसके बाद ईरान ने तेजी से कदम उठाते हुए एक नया नेता चुना और एक नया सैन्य नेतृत्व स्थापित किया है। उधर अमेरिका-इजरायल गठबंधन ने घोषणा की कि वे उन्हें भी खत्म कर देंगे। तेहरान, सनंदाज, इस्फहान और ईरान के अन्य प्रमुख शहरों पर बमबारी की गई है और अब तक लगभग 1300 ईरानी मारे गए और 10,000 से अधिक घायल हुए हैं। एक अमेरिकी टामहाक मिसाइल एक स्कूल पर गिरी, जिसमें 168 बच्चे और 14 शिक्षक मारे गए। उन्होंने कौन-सा अपराध किया था? पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक
