ईरान पर अमेरिका और इजरायल के साझा हमले के बाद युद्ध का एक महीना पूरा हो गया है। विश्लेषक और राजनीतिक पंडितों का मानना है कि इस युद्ध से विश्व को केवल नुकसान हुआ है। आर्थिक तौर पर यह बात बिल्कुल सही है। कच्चे तेल के दाम इतने बढ़ गए हैं कि भारत जैसे देश की अर्थव्यवस्था पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। प्रधानमंत्री ने पिछले सप्ताह सावधान किया है देश को कि निकट भविष्य में तकलीफ की घड़ी आने वाली है।

अधिकतर विशेषज्ञ मानते हैं कि किसी और के देश में जाकर नेतृत्व को बदलने की कोशिश नहीं होनी चाहिए, लेकिन ऐसा कहने से पहले उन्होंने क्यों नहीं सोचा कि ईरान में जब से इस्लामी क्रांति आई है, उसने अपनी विचारधारा को दुनिया भर के मुसलमानों पर थोपने का लगातार प्रयास किया है।

अयातुल्ला खामेनेई के आने के कुछ महीने बाद जिहादी सोच के छात्रों ने तेहरान में अमेरिकी दूतावास पर हमला करके वहां के पचास से ज्यादा अधिकारियों को बंधक बनाया। ये लोग बंधक रहे थे 400 दिनों से ज्यादा। इसके बाद ईरान की आतंकवादी संस्था हिजबुल्लाह ने बेरुत में 241 अमेरिकी मरीनों को जान से मारा। जिहादी सोच से प्रेरित लोगों ने कई और आतंकवादी घटनाओं को अंजाम दिया।

अयातुल्ला खामेनेई ने 1989 में सलमान रुश्दी को जान से मरवाने के लिए फतवा दिया कि उनका फर्ज है इस लेखक को मारने का। क्या यह दखल नहीं था दूसरे देशों की अंदरूनी राजनीति में?

क्या अपने देश में जिहादी सोच को फैलते नहीं देखा है? क्या अपने देश में पिछले 40 साल में हुई आतंकी घटनाओं के पीछे जिहादी इस्लाम का हिंसक असर नहीं देखा है?

जब से युद्ध शुरू हुआ है, डोनाल्ड ट्रंप की उल्टी-सीधी बातों को सुनकर मुझे तकलीफ जरूर हुई है और कई बार ऐसा लगा है कि दुनिया के सबसे ताकतवर राजनेता को इस तरह की बातें नहीं करनी चाहिए। हर दूसरे दिन अपना मन बदलते दिखे हैं अमेरिका के राष्ट्रपति। हर दूसरे दिन कोई नया तमाशा करते हैं, जिनको देख कर साबित हुआ है कि उनको विश्व के सबसे ताकतवर ओहदे पर बैठने का कोई अधिकार नहीं होना चाहिए।

ट्रंप ने दुनिया में अस्थिरता फैलाई है और अपने देश की छवि को इतनी हानि पहुंचाई है, जिसको ठीक करने में दशक लग सकते हैं। अमेरिका के सबसे करीबी दोस्त भी इन दिनों कह रहे हैं कि इस देश पर अब भरोसा करना मुश्किल है।

यह सब ठीक है, लेकिन क्या यह भी नहीं हमको सोचना चाहिए कि जिहादी इस्लाम के खिलाफ जो लड़ाई लड़ी जा रही है, वह आवश्यक है?

हमारे देश में इस्लाम को बदलते मेरी उम्र के लोगों ने अपनी आंखों से देखा है। मेरे बचपन में उत्तर भारत में शायद ही कोई मुसलिम लड़की हिजाब में दिखाई देती थी। कुछ मुट्ठी भर महिलाएं थीं, जो अक्सर किसी मौलवी से प्रभावित होकर हिजाब पहना करती थीं, लेकिन ज्यादातर बिना हिजाब के घूमा करती थीं।

स्कूलों में बच्चियों को हिजाब में बिल्कुल नहीं देखा जाता था। कश्मीर में, जहां मुसलमानों की बहुलता है, वहां भी नहीं। न ही मुसलिम मर्दों पर वह खास इस्लामी दाढ़ी दिखती थी, जो आज देश भर में मुसलिम मर्दों की पहचान बन गई है।

आप अगर सोच रहे हैं कि ये छोटी चीजें हैं, तो आप गलत सोच रहे हैं। ये छोटे परिवर्तन तब आते हैं, जब कट्टरपंथी इस्लाम किसी जगह अपने कदम रखता है।

मैंने पहली बार इसको देखा था कोयंबतूर में वर्ष 1998 में जब लालकृष्ण आडवाणी की एक आमसभा में बम फटा था मंच के पास। आडवाणी का विमान देर से पहुंचा था कोयंबतूर, इसलिए वे मंच पर नहीं थे, इसीलिए बच गए। इस जिहादी हमले में कोई बारह-तेरह बम फटे थे शहर की कई जगहों पर, जिनमें 58 लोगों ने अपनी जान गंवाई थी और 200 से ज्Þयादा लोग घायल हुए थे।

इस हमले के बाद मैं कोयंबतूर गई थी जानकारी लेने, तो उस जगह गई, जहां आडवाणी की आम सभा हुई थी। वहां पहुंची तो अजीब माहौल दिखा। तमिल औरतें, जो अक्सर साड़ी पहनती हैं, सलवार-कुर्ता पहने दिखीं और दुपट्टों से उन्होंने अपने सिर ढके हुए थे।

जब मैंने उनसे बात करने की कोशिश की, तो उन्होंने कहा कि वे मौलवी साहब की इजाजत लिए बिना किसी से नहीं बात करती हैं। मौलवी साहब ने इजाजत देने से इनकार किया और मेरे साथ बात करने के लिए खुद भी तैयार नहीं थे।

इसके बाद मैंने जिहादी इस्लाम को उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और कश्मीर में फैलते देखा और धीरे-धीरे इस कट्टरपंथी सोच का बुरा असर आतंकवादी घटनाओं में दिखने लगा है। यह सब हुआ है ईरान में इस्लामी क्रांति आने के बाद, इसलिए जो युद्ध शुरू किया है अमेरिका और इजरायल ने ईरान में, उसको समर्थन मिल रहा है कई मुसलिम देशों से।

युद्ध शुरू होने के बाद कई ईरानी तेहरान छोड़ कर तुर्की में पहुंचे हैं और उनसे जब पत्रकार पूछते हैं कि क्या इस युद्ध को वे ठीक मानते हैं, तो कैमरे के सामने मुंह छिपा कर कई लोग कहते हैं कि अगर तेहरान में इस युद्ध के कारण इस्लामी सरकार को हटाया जाता है, तो उनको अच्छा लगेगा। इसलिए कि इस्लामी शासन के रहते हुए न उनको कभी आजाद माहौल में जाने का अधिकार मिलेगा, न ही ईरान में लोकतंत्र आने की संभावना रहेगी।

इस युद्ध को समर्थन अगर मिल रहा है ईरान के आम लोगों से, तो वह भी इसलिए कि ईरान के लोग दिल से चाहते हैं कि अयातुल्ला को हटाकर लोकतंत्र को लाया जाए। भारत को एक लोकतांत्रिक देश होने के नाते उनके साथ खड़ा होना चाहिए जो लोकतंत्र लाना चाहते हैं।