हाल ही में अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच युद्धविराम को अनिश्चितकाल के लिए बढ़ा दिया गया। यह घोषणा अमेरिका की ओर से की गई, लेकिन ईरान ने होर्मुज जलमार्ग को अभी भी अवरुद्ध कर रखा है। एक तरफ अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से ईरान को बंद पड़े इस समुद्री मार्ग को न खोलने पर परिणाम भुगतने की चेतावनी दी जा रही है, दूसरी तरफ ईरान इसे कमाई के अवसर के रूप में देख रहा है। दरअसल, ईरान ने होर्मुज जलमार्ग में अपने लिए ‘एक सुरक्षित कॉरिडोर’ तैयार किया है, जो लार्क द्वीप के आसपास से होकर गुजरता है।
इस नई व्यवस्था के जरिए संघर्ष की स्थिति में भी ईरान कमाई के साधन बढ़ाने की कोशिशों में जुटा है। मीडिया रपटों के मुताबिक, अमेरिका की धमकियों से ईरान दबाव में आने के बजाय बेखौफ होकर अपनी रणनीति और कूटनीति के साथ सधे कदमों से काम कर रहा है। ईरान के एक सांसद के मुताबिक, होर्मुज जलमार्ग से गुजरने वाले तेल के चुनिंदा जहाजों पर ईरान की ओर से लगभग दो मिलियन डालर का शुल्क लगाया जा रहा है। हालांकि, जब से अमेरिका ने समुद्र में नाकेबंदी शुरू की है, तब से इस कार्य में ईरान के लिए चुनौतियां बढ़ गई हैं।
पिछले दिनों अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को चेतावनी देते हुए कहा था कि होर्मुज जलमार्ग को पूरी तरह नहीं खोला गया, तो उसके ऊर्जा संयंत्रों को नष्ट कर दिया जाएगा। मगर इससे दबाव में आने के बजाय ईरान ने पलटवार करते हुए कहा कि यदि अमेरिका की ओर से हमले की कार्रवाई की गई, तो कड़ा जवाब दिया जाएगा। इन बयानों से दुनिया की अर्थव्यवस्था पर असर पड़ा और शेयर बाजारों में भी भारी गिरावट देखी गई। ईरान की कूटनीति और रणनीति अब भी आक्रामक प्रतिक्रिया वाली है। वह अमेरिका की चेतावनियों और धमकियों का जवाब उसी अंदाज में दे रहा है। ऐसे में यह कहना बहुत मुश्किल है कि दोनों पक्षों के बीच युद्ध कब तक थमा रहेगा। इस युद्ध में ईरान में अब तक हताहतों की तादाद इजराइल से भले ज्यादा हो, लेकिन वह एक कदम भी पीछे हटने का संकेत नहीं दे रहा है, उल्टे इस संघर्ष में वह कमाई करने का मौका देख रहा है। यही वजह है कि ईरान बेहद सधी रणनीति से आगे बढ़ते हुए अपने ध्वस्त ढांचों को फिर से खड़ा करने और संघर्ष में धन की कमी को पूरा करने के लिए तेल को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहा है।
मौजूदा परिदृश्य में ईरान का रुख बिल्कुल साफ है कि अमेरिका और इजराइल के आगे वह झुकने वाला नहीं है। उसका इरादा उसके इस एलान में भी साफ नजर आता है कि युद्ध अमेरिका और इजराइल ने शुरू किया था, लेकिन खत्म ईरान की इच्छा से ही होगा, यानी उसने अमेरिका और इजराइल को स्पष्ट तौर पर यह संदेश दिया है कि उसे धमकियों से डराया नहीं जा सकता। ईरान सोची-समझी रणनीति के तहत अमेरिका समर्थित अरब देशों को निशाना बना रहा है। यहां तक कि दुबई पर भी हमले कर रहा है, जहां दुनिया के करीब दो सौ देशों के लोग रहते हैं। सवाल है कि दुबई पर हमला करके ईरान को क्या फायदा मिल रहा है या भविष्य में मिल सकता है? इसके लिए दुबई की ‘धनकुबेर’ वाली छवि को समझना होगा और यह भी जानना होगा कि दुबई पर ईरान के हमलों के पीछे की रणनीति या कूटनीति किस तरह की है?
ईरान इस संघर्ष को ऐसे अवसर के रूप में देख रहा है, जो आगे चलकर उसकी अर्थव्यवस्था के लिए काफी फायदेमंद साबित हो सकता है। दुबई पर उसका हमला इसी दूरदृष्टि का परिणाम है। ईरान जानता है कि अमेरिकी दोस्त दुबई की धनकुबेर वाली छवि को खराब करने के लिए उस पर हमला करना जरूरी है। लोग घबराकर दुबई को छोड़ कर एक सुरक्षित जगह की तलाश करेंगे, जिसका असर उसकी अर्थव्यवस्था पर तो पड़ेगा ही, उसकी धनकुबेर वाली छवि भी खराब हो सकती है। ईरान के हमलों से वहां के कारोबार और पर्यटन पर गहरा असर पड़ेगा, जिससे उसकी आमदनी भी प्रभावित होगी। आंकड़ों के मुताबिक, पिछले साल दुबई में दो करोड़ से ज्यादा पर्यटक आए थे, जिससे उसकी बड़े पैमाने पर आमदनी हुई। ईरान के हमलों से दुबई जाने वाले लोगों की संख्या में कमी आएगी, जिसका अप्रत्यक्ष रूप से उसे फायदा होगा।
पश्चिम एशिया में जब से संघर्ष की शुरुआत हुई है, तब से तेल की कीमतों में भारी उछाल आया है। इसका फायदा उठाकर ईरान अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की कोशिश में जुटा है। दूसरी तरफ होर्मुज जलमार्ग के बाधित होने के कारण वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर असर पड़ा है। विश्लेषकों का मानना है कि युद्ध की वजह से ईरान को ढांचागत क्षति के साथ अतिरिक्त प्रतिबंधों का भी सामना करना पड़ सकता है, लेकिन तत्काल ऊर्जा की कीमतें उसके लिए एक आर्थिक हथियार के रूप में काम कर रही हैं। इस बीच, अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भारत सहित दुनिया के कई देशों से कह चुके हैं कि रूस से तेल ज्यादा से ज्यादा खरीदा जाना चाहिए, जिससे दुनिया में ऊर्जा का कोई गंभीर संकट न पैदा हो। इससे रूस को फायदा हो रहा है और इसके परिणामस्वरूप ईरान को अप्रत्यक्ष रूप से मदद मिल रही है। चूंकि रूस और चीन के साथ ईरान के संबंध बेहतर हैं, इसलिए उसे इन देशों से आर्थिक और कूटनीतिक सुरक्षा मिल रही है।
यह सच है कि ईरान की अर्थव्यवस्था तेल और प्राकृतिक गैस के निर्यात पर टिकी है, जो दुनिया के सबसे बड़े जीवाश्म ईंधन भंडारों में से एक है। दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा प्राकृतिक गैस भंडार और चौथा तेल भंडार ईरान के पास है। वह होर्मुज जलमार्ग को बाधित कर अमेरिका को यह संदेश देना चाहता है कि उसके मूलभूत ढांचों और संयंत्रों पर हमला करने से महज उसका ही नुकसान नहीं होगा, बल्कि दुनिया के तमाम देशों पर इसका प्रत्यक्ष असर पड़ेगा। ईरान का कहना है कि अमेरिका को अब यह समझ में आ रहा है कि प्रतिबंधों और हमलों से उसे वह सब हासिल नहीं हो पाया है, जिसके लिए उसने इजराइल के साथ मिलकर हमले किए थे।
ईरान दुनिया को यह संदेश देने में भी सफल होता दिखाई दे रहा है कि इजराइल और अमेरिका की ओर से उसके ऊपर किए गए हमले गैरजरूरी और उसकी संप्रभुता को खत्म करने की कोशिश हैं। यही वजह है कि नाटो देश इस युद्ध में अमेरिका का साथ देने को तैयार नहीं हुए। अब ईरान खुद को एक तरह से इस संघर्ष का विजेता मान रहा है, क्योंकि तेल और गैस की आपूर्ति को रोककर उसने वैश्विक संकट खड़ा कर दिया है और अमेरिका इसे सुलझाने में अब तक विफल रहा। जो भी हो, इस युद्ध से अभी तक अमेरिका और इजराइल को वह हासिल होता हुआ नजर नहीं आ रहा है, जिसके लिए युद्ध को एकमात्र विकल्प बताया गया था।
