खबरों में युद्ध है, खबरों का युद्ध है। हर खबर, हर बयान एक दूसरे को काटते-छांटते और एक दूसरे पर गिरते-पड़ते आते हैं। हर ‘बाइट’ एक दूसरे से ‘फाइट’ करती दिखती है। युद्ध एक है। व्याख्या अनंत हैं। कोई डर को बेचता है कि गैस खत्म है। गैस एजंसी वाले कहते हैं कि गैस की कमी नहीं। आप ‘डर की खरीद’ न करें।
और चैनल? जो कल तक हर जगह युद्ध खोजते फिरते थे, अब उसके ‘मुफ्त’ के दृश्य दिखाते और विशेषज्ञों से चर्चा कराते रहते हैं कि ये युद्ध कब बंद होगा। और ईरान से एकदम ‘फिल्मी शैली’ में जवाब आता है कि शुरू तुमने किया है, खत्म हम करेंगे। पक्ष-विपक्ष के बयान-वीर चैनलों पर गुत्थमगुत्था होते दिखते हैं। विपक्ष हर बात पर ‘कूटता’ है और सत्ता ‘कुटती’ रहती है।
इस सप्ताह की कुछ ‘चुनिंदा’ खबरों और बयानों के जरिए आप युद्ध को इस तरह से भी पढ़ सकते हैं- एक खबर : सौ दिन तक दुनिया जलेगी… दूसरी खबर है- चालीस दिन का तेल बचा है…। एक धिक्कार: मोदी ने समर्पण कर दिया… हमले की निंदा तक नहीं। एक प्रवक्ता कहिन, ‘भारत को कोई मजबूर नहीं कर सकता। विदेश नीति देशहित से तय होती है। दूसरी ओर एक विपक्षी प्रवक्ता ने कहा- वे युद्धोन्मादी के साथ खड़े हैं। दूसरा विपक्षी प्रवक्ता कहता है कि युद्ध दरवाजे पर खड़ा है। सत्ता प्रवक्ता का जवाब है कि दिल्ली ने खामेनेई की मौत पर शोक व्यक्त किया है।
अंकल सैम ‘ओवल हाउस’ में युद्ध जीतने के लिए प्रार्थना करते दिखते हैं
फिर एक विपक्षी नेता: देश गिरवी रख दिया है। इतने बड़े देश को अमेरिका की कालोनी बना दिया है। हम क्या उसकी कालोनी हैं कि हमें बताए कि हम किससे तेल खरीदें! सत्ता प्रवक्ता का जवाब, हमें कोई ‘डिक्टेट’ नहीं कर रहा। हम रूस से भी तेल खरीद रहे हैं। एक एंकर सवाल उछालता है कि क्या यह ‘धर्मयुद्ध’ हो रहा है। इस लाइन को कोई नहीं लपकता। फिर एक दिन अंकल सैम ‘ओवल हाउस’ में युद्ध जीतने के लिए प्रार्थना करते दिखते हैं। उनके सहयोगी इत्यादि उनको हाथ से छूकर प्रार्थना करते हैं कि इतनी शक्ति हमें देना दाता।
एक दिन एक खबर आती है कि खामेनेई का उत्तराधिकारी भी घायल हुआ है, लेकिन दो दिन बाद ही उत्तराधिकारी के हवाले से बयान आता है- खून का बदला खून… आखिर दम तक लड़ेंगे। लेकिन आप उस ‘मोगेंबो’ उर्फ ‘कैप्टन अमेरिका’ का क्या करें, जो एक दिन कहता है कि ईरान में कोई बचा ही नहीं और अगले दिन कहता है, आज रात सबसे बड़ा हमला करेंगे।
चैनलों में पल-पल मिसाइलें दागी जाती दिखती हैं। बम गिरते दिखते हैं बस्तियों में। समुद्र में आग लगती दिखती है। फिर कहानी ‘होर्मुज जलमार्ग’ पर आ टिकती है कि होर्मुज बंद कि होर्मुज खुला कि वो जहाज मारा कि ये जहाज छोड़ा… कि होर्मुज जलमार्ग में हम तय करेंगे कि कौन टैंकर आए…कौन न जाए। भारत के दो जहाज छोड़े…भारत की कूटनीतिक सफलता!
उधर, खबर-दर-खबर कि दुबई बर्बाद, अबू धाबी बर्बाद…कि भारत की चिंता कि खाड़ी देशों में फंसे नब्बे लाख भारतीयों को वापस कैसे लाएं! सत्ता कलपती है कि ऐसा गैरजिम्मेदार विपक्ष कभी नहीं देखा। विपक्ष कहता है कि इतना ‘कंप्रोमाइज्ड बंदा’ कभी न देखा। घायल ईरान की बहादुरी के भी क्या कहने कि बंदा इजराइल से लेकर खाड़ी के सभी अमेरिकी समर्थक देशों पर ‘ड्रोन’ मार रहा है। ‘मिसाइलें’ दाग रहा है और वे बिलबिला रहे हैं।
युद्ध विशेषज्ञ चकित हैं कि ईरान के पास इतने हथियार कहां से आ गए। एक विशेषज्ञ कह रहा है कि अमेरिका फंस गया है…‘भई गति सांप छछुंदर केरी..!’ अब न खाते बन रहा है न उगलते बन रहा है…। उधर अपना विपक्ष पहले लोकसभाध्यक्ष के खिलाफ ‘अविश्वास प्रस्ताव’ लाता है, लेकिन प्रस्ताव पर चर्चा करने की जगह विपक्ष पहले ‘स्थानापन्न स्पीकर’ के मुद्दे पर सवाल उठाता रहता है। फिर युद्ध और तेल संकट पर चर्चा करने लगता है।
विपक्ष के नेता उवाच- दर्द अभी शुरू हुआ है… यह तो शुरुआत है। रेस्तरां बंद, ये बंद, वो बंद! कारण गिनाते हुए अचानक एक मंत्री और ‘एपस्टीन फाइल’ का जिक्र कर देते हैं कि तुरंत लोकसभाध्यक्ष का ‘हस्तक्षेप’ आता है कि आप प्रस्ताव से बाहर न बोलें।
किसी विषय पर बोलना है, तो पहले नोटिस दें। इसके बाद वही शोर वही हाय हाय। एक मंत्री जवाब देते हैं कि हमारे पास पर्याप्त तेल भंडार है, गैस भी है। डरने की जरूरत नहीं।
नाराज विपक्ष संसद के बाहर अपनी ‘संसद’ लगाने लगता है। संसद के मकर द्वार की ‘सीढ़ियों पर धूप में’ चाय-बिस्किट नोश फरमाए जाते हैं, लेकिन बैनर-पोस्टर फरमाते हैं- ‘सरेंडर सरेंडर… सिलेंडर सरेंडर..!’ फिर आता है सत्ता पक्ष के एक नेता का इस सबको लेकर एक जवाब- वे चाहते हैं प्रधानमंत्री सुबह ट्रंप को कोसें, दोपहर में ‘पुतिन’ को और शाम को ‘शी जिनपिंग’ को। उन्हें तभी ठंडक पड़ेगी… वे सफल हो जाएंगे… ट्रंप क्या बोलेंगे… क्या यह प्रधानमंत्री तय करेंगे?
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राज्यसभा सांसद व वरिष्ठ कांग्रेस नेता अभिषेक मनु सिंघवी का आरोप है कि सत्तारूढ़ दल के पैसों के ‘प्रयोग’ से चुनावी मैदान समतल नहीं रहा है। उन्होंने कहा कि 1991 के बाद से गांधी परिवार का कोई सदस्य सत्ता में नहीं रहा। वे संसद में जनता द्वारा चुन कर आए। कांग्रेस छोड़ कर जाने और पार्टी पर गंभीर आरोप लगाने वाले नेताओं को लेकर उन्होंने कहा कि हमारे पास सत्ता का प्रलोभन देने के लिए कुछ भी नहीं है। उन्होंने कहा कि आज अगर भाजपा ठान ले कि किसी प्रदेश से चार-पांच लोग अपनी तरफ करने हैं तो उसे कोई रोक नहीं सकता है। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक
