दुनिया इतनी बदल गई पिछले सप्ताह कि इस परिवर्तन को समझना मुश्किल है विशेषज्ञों के लिए भी। रही अपने घर की बात, तो हम भारतवासी अक्सर अंदरूनी समस्याओं में इतने उलझे रहते हैं कि कम ही बार नजरें उठा कर देखते हैं कि बाकी दुनिया में क्या हो रहा है। इस बार इतना बड़ा परिवर्तन हुआ है पश्चिमी एशिया में कि हम मजबूर हैं इसको गंभीरता से लेने के लिए। एक तो इसलिए कि जो हो रहा है, उसका सीधा असर हमारे शेयर बाजार पर दिखने लगा है अभी से और दूसरा इसलिए कि अगर ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच हो रहे युद्ध के कारण तेल की कीमतें बढ़ती हैं, तो अपने देश में महंगाई आसमान छूने लगेगी। इसकी चिंता क्यों न हो?
हमारी समस्या यह भी है कि हमको कभी न कभी तय करना पड़ेगा कि हम किसके साथ हैं। अयातुल्लाह खामेनेई के मारे जाने के कुछ दिन पहले भारत के प्रधानमंत्री इजरायल गए थे, जहां उन्होंने स्पष्ट किया कि हमारी दोस्ती इजरायल के साथ पक्की है और निजी तौर पर भी नेतन्याहू को वे अपना दोस्त मानते हैं। जब इजरायल और अमेरिका ने कुछ घंटों बाद ईरान पर हमला कर उसके ‘सुप्रीम लीडर’ और उनके कई साथियों को जान से मारा, तो लोग पूछने लगे कि क्या नरेंद्र मोदी जानते थे कि युद्ध होने वाला है! हालांकि इसके बारे में वही बता सकते हैं, लेकिन मैं उनमें से हूं जो नहीं मानती कि मोदी इतने बेखबर थे इजरायल जाने से पहले कि उनको किसी ने जानकारी नहीं दी कि युद्ध की आशंकाएं हैं।
विश्व के बदलते खेल में हमने सही टीम चुना है
मेरा मानना है कि भारत ने अपना पक्ष तय कर लिया है। इसलिए अपने प्रधानमंत्री ने दुख व्यक्त किया जब दुबई, अबू धाबी और सऊदी अरब पर ईरान ने जवाबी हमले किए, लेकिन उनकी तरफ से पहले हमने ईरान के लिए थोड़ी-सी भी सहानुभूति नहीं सुनी। इसलिए जिनको खयाल था कि भारत इस युद्ध में निष्पक्ष रहेगा, उनको दोबारा सोचना चाहिए। हम निष्पक्ष नहीं हैं। हमारा पक्ष है वह वाला, जिसका नेतृत्व अमेरिका और इजरायल कर रहे हैं। मेरी निजी राय है कि हमने सही टीम को चुना है विश्व के इस बदलते, खतरनाक खेल में।
दूसरी टीम की अगुआई कर रहा है हमारा पुराना दुश्मन चीन और उस टीम में जितने भी देश हैं, उनमें एक भी ऐसा नहीं मिलेगा आपको जिसमें असली लोकतंत्र हो। हमारी जगह हमेशा होनी चाहिए लोकतांत्रिक देशों की टीम में। दूसरी टीम में हमारे दुश्मन भी हैं और ऐसे भी देश हैं जिनसे हमारे लोकतांत्रिक सिद्धांत, हमारी विचारधारा और हमारी सभ्यता बिल्कुल अलग है।
हमारे देश में वामपंथी विचार के लोग हैं, जिनके लिए अमेरिका सबसे बड़ा शैतान रहा है दशकों से। ये लोग जानते हैं कि ईरान में मजहब की आड़ में अयातुल्लाह ने कितने जुल्म ढाए अपने ही लोगों पर, लेकिन इनको उनमें शैतानी कभी नहीं दिखती है। वामपंथियों के साथ खड़े हैं हमारे दूसरे समुदाय के नागरिक, जो इस्लामी मुल्कों का साथ देते हैं हर कठिनाई में, बावजूद इसके कि इस्लामी देश भारत का पक्ष कम ही लेते हैं दुनिया की सभाओं में। मैंने कभी सोचा था कि सिर्फ जिहादी सोच के मुसलिम इस्लाम के नाम पर पक्षपात करते हैं, लेकिन ऐसा नहीं है। कई अति समझदार, धर्मनिरपेक्ष मुसलिम भी अमेरिका के खिलाफ बोलने को तैयार हैं, लेकिन ईरान के खिलाफ नहीं।
पिछले सप्ताह जब लखनऊ और श्रीनगर में शिया मुसलमानों ने सड़कों पर उतर कर अयातुल्लाह खामेनेई की हत्या का मातम किया और अमेरिका मुर्दाबाद के नारे लगाए, तब एक नास्तिक दोस्त से बात हुई। उसकी शिकायत यह थी कि मैंने खामेनेई के मारे जाने की खुशी जताई सोशल मीडिया पर। मैंने ‘एक्स’ पर लिखा था कि यह खुशी की बात है दुनिया के लिए। मेरे दोस्त की राय अलग थी। उसने कहा, खामेनेई को इन्होंने मारा सिर्फ इसलिए कि वह उनकी बात नहीं मान रहा था। मैंने याद दिलाया कि इस कथित धर्मगुरु ने हमास और हिजबुल्लाह जैसी आतंकवादी लश्करें तैयार कर आतंक फैलाया। इस पर मेरे नास्तिक दोस्त ने कुछ नहीं कहा।
मेरी नजरों में सबसे बड़े जालिम वही हैं जो अपने बेसहारा और निहत्थे लोगों पर जुल्म ढाते हैं। ईरान में पिछले महीने से इतना जुल्म देखने को मिला है कि वहां की कहानियां सुननी मुश्किल हो गई हैं मेरे लिए। बच्चों पर गोलियां चलवाई गईं। महिलाओं के बलात्कार करवाए जेलों के अंदर, ताकि उनको जन्नत नसीब न हो और अस्पतालों में जाकर घायलों की हत्याएं कराईं। अमेरिका की तरफ से जुल्म जितने भी हुए हों, कम से कम ऐसा तो उन्होंने अपने लोगों के साथ कभी नहीं किया है।
मेरी राजनीतिक दृष्टि के दो बड़े खंबे हैं। पहला कि मैं हमेशा उनके साथ हूं जो लोकतंत्र के आधार पर अपने देश चलाते हैं और जिनके देशों में कानून प्रणाली का आधार मजबूत होता है। दूसरा यह कि मुझे सख्त नफरत है ऐसे राजनेताओं से जो धर्म-मजहब को अपनी राजनीति में घसीट कर उसकी शरण लेते हैं। ईरान में जबसे इस्लामी क्रांति आई थी सैंतालीस वर्ष पहले, तब से लोकतंत्र के आधार पर शासन नहीं चला है। खामेनेई अकेले नहीं थे, उनके नीचे जुल्म ढाने वाली कई संस्थाएं भी थीं, जिनकी अलग भूमिकाएं हैं। कुछ ऐसी हैं जो महिलाओं को जबरदस्ती हिजाब पहनाने का काम करती हैं, तो कुछ आम लोगों को जबरदस्ती काबू में रखने का काम करती हैं। जुल्म का यह पूरा ढांचा अभी तक कायम है। इसलिए विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान में तख्ता पलटना आसान नहीं होगा। हो सकता है यह लोग ठीक कह रहे हों।
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एक और युद्ध शुरू हो चुका है। इजरायल उकसाने वाला है और अमेरिका युद्ध का आगाज करने वाला है। इजरायल ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को यह विश्वास दिला दिया है कि ईरान के पास परमाणु हथियार हैं या लगभग विकसित करने के अंतिम चरण में है और वह अमेरिका को धमकी देने की योजना बना रहा है। हालांकि, वाल स्ट्रीट जर्नल ने रपट दी है कि गोपनीय जानकारी रखने वाले अमेरिकी अधिकारियों ने इन कथित संभावित धमकियों को निराधार बताकर सिरे से खारिज कर दिया है। फिर भी, ट्रंप ने इजरायल के साथ मिलकर ईरान के खिलाफ व्यापक पैमाने पर युद्ध शुरू कर दिया है। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक
