अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच युद्ध और होर्मुज जलमार्ग बंद होने का असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर दिखाई देने लगा है। जहां दुनिया के कई देशों की अर्थव्यवस्थाओं की विकास दर घटने के संकेत मिल रहे हैं, वहीं विभिन्न देशों में शेयर बाजार गिरते हुए दिखाई दे रहे हैं। ईरान के साथ युद्ध शुरू करने के बाद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इसे आक्रामक कदम के रूप में पेश किया था। अब इस युद्ध ने कुछ और ही रूप ले लिया है। यह सोचा नहीं गया था कि इससे वैश्विक सुरक्षा और अर्थव्यवस्था को ऐसा झटका लगेगा, जो पश्चिम एशिया में अन्य संघर्षों से कहीं अधिक गंभीर होगा। इस युद्ध ने यात्रा के तौर-तरीकों, ऊर्जा पर निर्भरता, जीवनयापन की लागत, व्यापार मार्गों और रणनीतिक साझेदारियों को बदल दिया है।

गौरतलब है कि अन्य कई क्षेत्रीय संघर्षों से आमतौर पर अछूते रहने वाले देशों को अमेरिकी सैन्य अड्डों के कारण भी ईरान की जवाबी कार्रवाई का सामना करना पड़ा है। ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच चल रहे सैन्य टकराव ने बेहद कम समय में ही अमेरिकी खजाने पर बोझ डालना शुरू कर दिया है। अब पेंटागन का रोजाना युद्ध खर्च औसतन दो अरब डालर तक पहुंच चुका है। हर दिन अमेरिकी सैन्य अभियान पर अरबों डालर खर्च हो रहे हैं। इस संघर्ष ने केवल अमेरिकी बजट पर ही प्रभाव नहीं डाला, बल्कि कई महंगे सैन्य उपकरणों का नुकसान भी हुआ है। अगर यह युद्ध लंबा चला, तो इसके प्रभाव और भी गंभीर हो सकते हैं। कच्चे तेल संकट के कारण मुद्रास्फीति और आर्थिक मंदी के जोखिम की आशंका है। इससे विकास रुक सकता है।

गौरतलब है कि ईरान और इजरायल-अमेरिका के युद्ध के बीच ईरान ने जहाजों की आवाजाही का सबसे अहम होर्मुज जलमार्ग को बंद कर दिया है। इस मार्ग से बीस फीसद से अधिक वैश्विक कच्चे तेल और तरल प्राकृतिक गैस (एलएनजी) की आपूर्ति होती है। ऐसे में इस जलमार्ग के बंद हो जाने से कच्चे तेल और गैस की वैश्विक आपूर्ति प्रभावित होने लगी है। चूंकि कच्चे तेल के लिहाज से भारत का करीब चालीस फीसद कच्चा तेल इसी रास्ते से होकर आता है। ऐसे में यह युद्ध भारत के लिए चिंता का कारण बन गया है। भारत कच्चे तेल की अपनी जरूरतों के लिए 85 फीसद से अधिक आयात पर निर्भर है। ऐसे में कच्चे तेल के दाम में बढ़ोतरी चिंता बढ़ा रही है। युद्ध लंबा चलने पर इसकी कीमत बेतहाशा बढ़ सकती है। इससे पेट्रोल, डीजल और अन्य पेट्रोलियम उत्पाद महंगे होने लगेंगे और वहीं भारत से निर्यात घटने और व्यापार घाटा बढ़ने की चुनौती बढ़ती दिखाई देगी। हालांकि विदेश मंत्री एस जयशंकर और ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची के बीच हुई उच्च-स्तरीय वार्ता के बाद ईरान ने भारतीय झंडे वाले तेल टैंकरों को होर्मुज जलमार्ग से सुरक्षित गुजरने की अनुमति दे दी है।

इस युद्ध से सीधे तौर पर जुड़े अमेरिका, इजरायल और ईरान सहित युद्ध से प्रभावित पश्चिम एशियाई और यूरोपीय देश भी भारत के लिए निर्यात के प्रमुख बाजार हैं। ऐसे में निर्यातकों की चिंताएं बढ़ गई हैं। पश्चिम एशिया जाने वाला माल भारत के घरेलू बंदरगाहों पर जमा होने लगा है। जहाजों की सुरक्षा को देखते नए निर्यात आदेश नहीं लिए जा हैं। ऐसी स्थिति में खासतौर से पश्चिम एशिया के देशों में निर्यात घटने की आशंका है। भारत ने इस वित्तीय वर्ष 2025- 26 में अप्रैल से दिसंबर की अवधि में पश्चिम एशिया के 13 देशों को करीब 50 अरब डालर मूल्य की वस्तुओं का निर्यात किया, जो भारत के कुल निर्यात का करीब 15 फीसद है। विभिन्न देशों में भारत से खाद्य उत्पाद, इंजीनियरिंग सामान, बासमती चावल, चाय, मशीनरी, दवाएं, रत्न-आभूषण, प्लास्टिक और रबड़ जैसे क्षेत्रों में निर्यात प्रभावित होते हुए दिखाई दे रहे हैं। इस परिप्रेक्ष्य में हाल ही में वैश्विक रेटिंग एजंसी फिच की इकाई बीएमआइ ने एक रपट में कहा कि पश्चिम एशिया में जारी युद्ध से कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि, माल ढुलाई महंगी होने और आपूर्ति शृंखला टूटने जैसे चिंताजनक हालात से भारत के निर्यात और निवेश पर असर पड़ेगा। रपट में यह भी कहा गया है कि यदि कच्चे तेल की कीमतों में दस फीसद की वृद्धि होती है, तो भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में लगभग 0.3 से 0.6 फीसद की कमी आ सकती है और इससे निर्यात मोर्चे पर भारत की चुनौतियां बढ़ जाएंगी।

सरकार और निर्यातकों की चिंताएं लगातार बढ़ रही हैं। इस बीच सरकार नागरिकों, निर्यातकों और अन्य प्रभावित वर्गों की मुश्किलों को कम करने के मद्देनजर रणनीतिक रूप से कदम उठा रही है। आवश्यक वस्तु अधिनियम लागू करने का भी फैसला किया गया है। इस अधिनियम के लागू होने के बाद देश की सभी रिफाइनरियों और पेट्रो केमिकल इकाइयों को अपने अन्य उत्पादों की तुलना में एलपीजी आपूर्ति को प्राथमिकता देनी होगी। मगर सरकारी तंत्र को सतर्क रहना होगा, ताकि गैस की जमाखोरी और कालाबाजारी न होने पाए। सरकार ने युद्ध से निर्मित हालात से भारतीय निर्यात पर पड़ने वाले प्रभाव पर सरकारी मंत्रालयों, निर्यातकों और जहाज कंपनियों के प्रतिनिधियों की विशेष बैठक में विचार मंथन के बाद बहुमंत्रालयी सहायता डेस्क सहित निर्यातकों को हरसंभव सहयोग दिया जाना सुनिश्चित किया है।

इसमें दो मत नहीं कि भारत को द्विपक्षीय और मुक्त व्यापार समझौतों (एफटीए) का पूरा लाभ लेते हुए निर्यात को हरसंभव तरीके से बढ़ाने की रणनीति के साथ आगे बढ़ना होगा। निर्यात बढ़ाने के लिए भारत के व्यापार समझौते अहम भूमिका निभा सकते हैं। हाल के महीनों में जिन देशों के साथ समझौते किए गए हैं, उन्हें क्रियान्वयन की डगर पर तेजी से आगे बढ़ाना होगा। मगर ईरान और इजरायल-अमेरिका युद्ध के बीच भारत से निर्यात बढ़ाना कोई सरल काम नहीं है। ऐसे में निर्यात बढ़ाने के लिए चिह्नित किए गए करीब दो सौ देशों में निर्यात की नई रणनीति के साथ आगे बढ़ना होगा। वहीं निर्यातकों की दिक्कतों को कम करना होगा। ये दिक्कतें केवल शुल्क वृद्धि तक सीमित नहीं हैं, वरन निर्यात पर लगाए गए डंपिंग-रोधी शुल्क भी अड़चन हैं। अब घरेलू ढांचागत सुधारों के प्रति नए सिरे से प्रतिबद्धता आवश्यक होगी। इसके लिए देश में नियमों और नियामक संस्थाओं के कामकाज में मूलभूत बदलाव की जरूरत है। कर सुधारों को और गहराई देने के साथ जीएसटी प्रणाली को प्रभावी बनाना जरूरी है।

उम्मीद करें कि सरकार ईरान और इजरायल-अमेरिका के युद्ध की वजह से निर्यात चुनौतियों से निपटने और निर्यात बढ़ाने के मद्देनजर विभिन्न देशों के साथ भारत के व्यापार समझौतों के अधिकतम लाभ के लिए गुणवत्तापूर्ण उत्पादन और नए सुधारों की राह पर आगे बढ़ेगी। दूसरी ओर संकट के इस दौर में आवश्यक वस्तु अधिनियम को कारगर तरीके से लागू करना होगा, तभी देश में जमाखोरी और कालाबाजारी रोकी जा सकेगी जिससे आम लोगों को राहत मिले। नागरिकों को आश्वस्त करना होगा फिलहाल गैस और अन्य जरूरी वस्तुओं की कोई कमी नहीं है और कच्चे तेल और गैस की नई आपूर्ति प्राप्त करने के लिए भी अधिकतम प्रयास किए जा रहे हैं।