होर्मुज जलमार्ग में ईरान द्वारा बिछाई बारूदी सुरंगों की खोज और उन्हें निष्क्रिय करने में अमेरिका क्या ‘कामिकाजे डाल्फिन’ का इस्तेमाल कर रहा है? हाल ही में अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ से जब यह पूछा गया, तो वे चुप लगा गए और सिर्फ इतना बोल सके कि ‘न तो हम इसकी पुष्टि करेंगे और न ही इससे इनकार करेंगे कि हमारे पास कामिकाजे डाल्फिन हैं।’ होर्मुज में ईरान भी ‘कामिकाजे डाल्फिन’ का इस्तेमाल कर सकता है। इस मामले में ईरान का सैन्य सहयोगी रूस उसके साथ खड़ा है।

दरअसल, ‘कामिकाजे’ द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान जापानी पायलट थे, जो अपने विमानों को मित्र देशों के युद्धपोतों से टकराकर आत्मघाती हमले करते थे। शीत युद्ध के दौरान, सोवियत नौसेना ने समुद्री जीवों से जुड़े कई कार्यक्रम शुरू किए थे, जिनमें काला सागर में डाल्फिन को प्रशिक्षण देना भी शामिल था। यह इकाई सेवस्तोपोल के पास ‘कजाच्या बुख्ता’ में स्थित थी और आज भी वहीं मौजूद है। मौजूदा दौर में चूंकि ईरान की मदद रूस अप्रत्यक्ष रूप से कर रहा है, इसलिए उस पर अमेरिकी एजंसियों को शक होना लाजिमी है।

डाल्फिन ही एकमात्र समुद्री जीव नहीं हैं, जिन्हें रूस ने प्रशिक्षण दिया हो। वर्ष 2019 में नार्वे के तट पर देखी गई एक बेलुगा ह्वेल के बारे में माना गया था कि उसे रूसी नौसेना ने प्रशिक्षण दिया था। मछुआरों का कहना था कि बेलुगा ह्वेल ने अजीब तरह की ‘हार्नेस’ पहन रखी थी, जिसमें शायद कैमरे लगे थे और वह उनकी नावों से बंधी पट्टियों और रस्सियों को खींच रही थी।

अमेरिकी नौसेना के पास भी बारूदी सुरंगों का पता लगाने में मदद के लिए डाल्फिन को प्रशिक्षित करने का एक कार्यक्रम दशकों पुराना है। मनुष्यों का आंतरिक बुद्धिमत्ता स्तर यानी आइक्यू 7.4 के साथ सबसे अधिक है, लेकिन बाटल-नेक डाल्फिन की आंतरिक बुद्धिमत्ता स्तर 5.3 है, जो अन्य सभी जीवों की तुलना में काफी अधिक है।

‘कैलिफोर्निया सी लायन’ भी कम नहीं है, जिसने बुद्धिमत्ता परीक्षण में इंसानों को पीछे छोड़ा है। कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, सांताक्रूज प्रयोगशाला के वैज्ञानिकों ने इस सील प्रजाति वाली मछली के परीक्षण के लिए कई परीक्षण-प्रारूप तैयार किए थे। आखिर डाल्फिन के साथ-साथ ‘कैलिफोर्निया सी लायन’ को भी नौसैनिक अभियानों और जल खुफियागिरी जैसे कार्यों के लिए चुना गया।

अमेरिका का ‘मरीन मैमल प्रोग्राम’ प्रशांत महासागर में अवस्थित ‘नेवल इन्फार्मेशन वारफेयर सेंटर’ का अहम हिस्सा है। वे शायद झूठ बोलते हैं कि इस महकमे की डाल्फिन ‘कामिकाजे डाल्फिन’ नहीं हैं, क्योंकि वे बारूदी सुरंगों को उड़ाने के लिए अपनी जान की कुर्बानी नहीं देती हैं। इसके बजाय उनका मुख्य काम बारूदी सुरंगों का पता लगाना है।

फौजी मकसद के लिए डाल्फिन का इस्तेमाल करने वाला अमेरिका अकेला देश नहीं है। रूस ने भी अपने बंदरगाहों की रखवाली के लिए इनका इस्तेमाल किया है। ईरान ने साल 2000 में रूस से डाल्फिन खरीदी थी। वे प्रशिक्षित डाल्फिन शायद बहुत बूढ़ी हो चुकी होंगी। इस बात का कोई संकेत नहीं है कि ईरान के पास कोई सक्रिय डाल्फिन कार्यक्रम है।

हालांकि ‘वाल स्ट्रीट जर्नल’ ने पिछले महीने एक खबर दी थी कि ईरान होर्मुज जलमार्ग को खोलने की अमेरिकी कोशिशों का मुकाबला करने के लिए बारूदी सुरंगें ले जाने वाली डाल्फिन के इस्तेमाल पर विचार कर रहा था।

अमेरिकी नौसेना का डाल्फिन कार्यक्रम 1959 से चल रहा है, जिसका मकसद ‘बाटल-नोज डाल्फिन’ और ‘कैलिफोर्निया सी लायन्स’ को पानी के नीचे की चीजों का पता लगाने और उन्हें वापस लाने का प्रशिक्षण देना है। ‘मरीन मैमल प्रोग्राम’ के वेबपेज के मुताबिक, ‘प्रशिक्षित डाल्फिन के पास सबसे उन्नत ‘सोनार’ होता है। पानी के नीचे चलने वाले ड्रोन इन जीवों का मुकाबला नहीं कर सकते’।

यह भी एक तथ्य है कि डाल्फिन और समुद्री शेरों, दोनों की कम रोशनी में देखने की क्षमता और पानी के भीतर दिशात्मक श्रवण शक्ति उत्कृष्ट होती है, जिससे वे अंधेरे या धुंधले पानी में भी पानी के नीचे के लक्ष्यों का पता लगा सकते हैं और उनका पीछा कर सकते हैं। डाल्फिन को पानी के नीचे बिछी उन खानों का पता लगाने और उनके स्थान को चिह्नित करने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है, जो सैन्य या नागरिक जहाजों पर सवार लोगों की सुरक्षा के लिए खतरा बन सकती हैं।

समुद्र में बारूदी सुरंगों का पता लगाने वाले अभियान के दौरान एक डाल्फिन आमतौर पर एक छोटी नाव में दो-तीन प्र्रशिक्षकों के साथ यात्रा करती है। कुछ मिलने पर ये जीव नाव के आगे वाले चप्पू को थपथपाते हैं और कुछ न मिलने पर पीछे वाले चप्पू को थपथपाते हैं। डाल्फिन खोजी गई खानों के पास ‘मार्कर बुआ’ छोड़ती हैं, ताकि मानव गोताखोर उन्हें ढूंढ़कर निष्क्रिय कर सकें, लेकिन डाल्फिन का उपयोग आमतौर पर होर्मुज जलमार्ग में मौजूद सक्रिय युद्ध जैसी स्थिति में नहीं किया जाता है।

इसके बजाय डाल्फिन का उपयोग लड़ाई समाप्त होने के बाद बारूदी सुरंगों का पता लगाने के लिए किया जा सकता है। इस संदर्भ में विशेष रूप से 2003 की उस घटना का उल्लेख किया जाता है, जब अमेरिका और उसके सहयोगी देशों द्वारा दक्षिणी इराक पर कब्जा करने के बाद इराकी बंदरगाह ‘उम कसर’ की ओर जाने वाली किसी भी बारूदी सुरंग का पता लगाने के लिए डाल्फिन को तैनात किया गया था।

सैन्य उद्देश्यों के लिए डाल्फिन को प्रशिक्षित करने का रूसी इतिहास जबरदस्त रहा है। 1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद यह इकाई यूक्रेन की सेना के अधीन चली गई। ‘सेवस्तोपोल कार्यक्रम’ को 2012 में यूक्रेनी नौसेना द्वारा फिर से शुरू किया गया था। यूक्रेन ने सेवस्तोपोल के पास एक एक्वेरियम में डाल्फिन को प्रशिक्षित किया था। यह कार्यक्रम सोवियत-युग की एक योजना से प्रेरित था, जो 1990 के दशक में उपेक्षा का शिकार हो गया था।

सेवस्तोपोल नौसैनिक अड्डा रूसी सेना के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि यह क्रीमिया के दक्षिणी छोर पर स्थित है, जिस पर मास्को ने 2014 में कब्जा कर लिया था। यूक्रेन ने इन जीवों को वापस करने की मांग की, लेकिन उसे सफलता नहीं मिली। दो साल बाद रूसी नौसेना ने पांच और डाल्फिन खरीदने की योजना की घोषणा की। यह स्पष्ट नहीं है कि आज सेवस्तोपोल में मौजूद मानी जाने वाली डाल्फिन वही हैं या नहीं। वर्ष 2018 की उपग्रह तस्वीरों से पता चला कि रूस ने सीरियाई युद्ध के दौरान सीरिया के टार्टस में अपने नौसैनिक अड्डे पर भी डाल्फिन का इस्तेमाल किया था।

इस मसले पर सबसे अफसोसनाक है कि महाशक्तियों ने अपनी युद्ध महत्त्वाकांक्षा के लिए मछलियों को भी नहीं बख्शा। इसे रोकने के लिए दुनिया के देश आगे क्यों नहीं आते? हालांकि पशु कल्याण संगठनों ने हमेशा सैन्य उद्देश्यों के लिए जानवरों के उपयोग पर चिंता जताई है, लेकिन यह विरोध आमतौर पर युद्ध के समय अन्य चिंता के कारण दब जाता है। अक्सर इन जीवों के सैन्य उपयोग से संबंधित जानकारी गोपनीय होती है, जिसके कारण सार्वजनिक विरोध का दायरा सीमित हो जाता है।