एक चैनल पर अर्थशास्त्री जेफरी : यह युद्ध तुरंत रुकना चाहिए। यह सारी दुनिया के लिए खतरनाक है। ट्रंप ‘अस्थिर चित्त’ आदमी हैं। जैसी बातें वे बोलते हैं, ऐसी बातें कोई अमेरिकी राष्ट्रपति आज तक नहीं बोला। दुनिया युद्ध का ‘तमाशा’ देख रही है। एक अन्य चैनल की चर्चा का विषय: इस युद्ध के केंद्र में ‘धार्मिक पदावली’ है। वीडियो में एक महिला बाइबिल पढ़ती हुई, उसका गुणगान करती हुई दिखती कि बाइबिल का ‘शेर’ गरज रहा है। साथ में ‘टाम हाक’ मिसाइल का इस्तेमाल करने का आह्वान करती हुई कहती है कि फरिश्ते आसमान से उतर रहे हैं।
एक चैनल : ईरान भी धर्मिक प्रतीकों का जम कर उपयोग कर रहा है। यह युद्ध यहूदी धर्म बरक्स इस्लाम धर्म के बीच भी है। कैथोलिक पोप- ‘शांति शांति’… यह बमबारी बंद हो। समझौता हो। शांति स्थापित हो। मगर शांति कहीं नजर नहीं आ रही। एक चैनल बताता है कि ‘अंकल सैम’ की लोकप्रियता कम होती जा रही है। अमेरिका के कई शहरों में ‘नो किंग’ के पोस्टर के साथ बड़े-बड़े प्रदर्शन हुए हैं। एक प्रदर्शन में हालीवुड के सितारे ‘राबर्ट डी नीरो’ भी दिखते हैं। कहा गया कि अंकल सैम खर्ग द्वीप पर अमेरिकी सैनिक उतारेंगे। द्वीप को ध्वस्त करेंगे। ईरान का जवाब- ‘वेलकम टू हेल’, यानी आइए जहन्नुम में, स्वागत है।
विशेषज्ञों ने अमेरिका को बताया चालाक
विशेषज्ञ एक सुर में कहते हैं कि क्या अमेरिका अपने सैनिकों को मरने के लिए भेजेगा… कि अमेरिका ने ईरान की ‘युद्ध क्षमता’ को कम करके आंका… कि अब वह अपनी ही चाल में फंस गया है और किसी तरह निकल भागना चाहता है। मगर ईरान निकलने देगा तब न! वह कह रहा है कि युद्ध अमेरिका ने शुरू किया, लेकिन खत्म हम करेंगे… कि जब तक अमेरिका माफी नहीं मांगता, नुकसान की भरपाई नहीं करता, तब तक लड़ेंगे।
युद्ध विशेषज्ञ डगलस मैकग्रेगर इस युद्ध की ‘कीमत’ बताते हैं कि जिस रास्ते युद्ध जा रहा है, उससे मंदी आ सकती है और यह अमेरिका को भी चोट पहुंचाएगा। फिर चैनलों पर खुसर-पुसर कि बातचीत शुरू है… कि नहीं है… कि पाक बात कर रहा है… कि ईरान के अनुसार पाक कहीं नहीं है। पाकिस्तान का नाम आते ही अपना विपक्ष सत्ता पक्ष पर ताना मारने लगता है कि पाकिस्तान के मुकाबले विश्व गुरु कहां हैं… जबकि विदेश मंत्री संसद में दो टूक कह चुके हैं कि हम ‘दलाल राष्ट्र’ नहीं हैं।
फिर एक दिन गृहमंत्री का संसद में बयान कि नक्सलवाद खत्म। कोई 123 जिलों में माओवादियों का राज था अब कुछ जिलों में बचा है। वह भी खत्म होना है और अब ‘अर्बन नक्सलों’ की नकेल कसी जानी है… आश्चर्य कि इस बार नक्सलवाद के पक्ष में बहुत चीख-पुकार नहीं मची।
तेल रुका, तो सभी चैनल ‘होर्मुज-होर्मुज’ करने लगे। होर्मुज न खुला तो दुनिया बर्बाद… इसलिए होर्मुज खोला जाए। कभी एक-दो तेल टैंकर बमुश्किल होर्मुज से भारत के लिए निकलते, तो चैनल कहने लगते कि दो आ रहे हैं, दो आने वाले हैं, लेकिन चर्चा में यह डर रहता कि अगर होर्मुज न खुला, तो फिर क्या होगा!
उधर, विपक्ष चैनलों पर इस डर को बढ़ाने में हर समय व्यस्त कि रसोई गैस के लिए लोगों की कतार लगी हैं। रेस्तरां बंद हैं। कोविड वाली पूर्णबंदी की स्थिति है कि रुपया गिर रहा है ‘अर्थव्यवस्था मृत’… प्रलय आने वाला है। चैनलों में डर बेचने वाले, डर बेचते रहते है… आश्वस्त करने वाले आश्वासन देते रहते हैं कि न तेल की कमी है, न गैस की… लेकिन डर बेचने वाले डर बेचते रहते हैं। फिर एक दिन सरकार ‘वाणिज्यिक रसोई गैस’ की कीमतें बढ़ा देती है। सत्ता प्रवक्ता कहते हैं कि डरो नहीं, लेकिन डराने वाले कहते हैं कि डरते रहो, डराते रहो।
सबसे अधिक बोलने वाले व्यक्ति हैं ‘अंकल सैम’। हर दिन, हर पल अंकल सैम ही बोलते हैं। एक दिन कहते हैं, हम युद्ध जीत चुके हैं… फिर कहते हैं, मैं चाहूं तो दो सेकंड में युद्ध बंद कर दूं। एक दिन कहते हैं कि ईरान को बर्बाद कर चुका हूं, फिर कहते हैं कि जो बचा है, उसे भी बर्बाद कर दूंगा… ईरान को पाषाण युग में पहुंचा दूंगा। फिर एक दिन वादा करते हैं कि होर्मुज हम खोलेंगे, फिर कह देते हैं जिनके टैंकर अटके हैं, वे खुद खुलवाएं। अंकल सैम की किसी बात का भरोसा नहीं। ऐसे ही एक दिन अंकल सैम कह दिए कि जल्द ही अमेरिका ईरान युद्ध को छोड़ देगा, इसे देख एक चैनल ने लाइन लगाई: ट्रंप ‘रण छोड़… रण छोड़…!’
अंत में, बंगाल के मालदा में ‘एसआइआर’ की निगरानी करने वाले ‘न्यायिक अधिकारियों’ को बड़ी भीड़ द्वारा नौ घंटे तक बिना ‘खाना पानी’ बंद रखना और कहने पर भी पुलिस द्वारा जरूरी ‘हस्तक्षेप’ न करना। फिर सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस स्थिति का स्वयं संज्ञान लेना और ‘कानून व्यवस्था’ की बिगड़ती स्थिति पर राज्य सरकार को फटकारना। यह बंगाल की ‘कानून व्यवस्था’ की स्थिति के बारे में बहुत कुछ कहता है।
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असम, केरल, पुदुचेरी (केंद्रशासित प्रदेश), तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव 9, 23 और 30 अप्रैल को होंगे। हाल के वर्षों में पहली बार भाजपा केरल, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में स्थापित वाम-उदारवादी राजनीतिक दलों को चुनौती दे रही है। वैचारिक दृष्टि से केरल में यूडीएफ यानी यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट और एलडीएफ यानी लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट, दोनों ही वाम केंद्रित हैं। तमिलनाडु में द्रमुक के नेतृत्व वाला गठबंधन (जिसमें कांग्रेस भी शामिल है) और पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस स्पष्ट रूप से वाम-उदारवादी दल हैं। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक
