सद्गुरु: “योग” शब्द का वास्तविक अर्थ है “एकत्व”। जब आप अपनी चेतना में हर चीज़ को एक के रूप में अनुभव करते हैं, तो आप योग की स्थिति में होते हैं। अपने भीतर उस एकत्व को पाने के कई तरीके हैं। उदाहरण के लिए, हठ योग है। हठ योग का मतलब है कि आप शरीर से शुरुआत करते हैं। शरीर का अपना रवैया, अपना अहं और अपनी प्रकृति होती है। क्या आप देखते हैं कि आपके मन के अलावा, आपके शरीर का भी अपना अहं होता है? मान लीजिए आप कहते हैं, “कल से, मैं सुबह पाँच बजे उठकर समुद्र तट पर टहलना चाहता हूँ।” आप अलार्म लगाते हैं। अलार्म बजता है। आप उठना चाहते हैं, लेकिन आपका शरीर कहता है, “चुप रहो और सो जाओ।” उसका अपना ही तरीका होता है।
इसलिए हम शरीर से शुरुआत करते हैं। हठ योग शरीर के साथ काम करने, शरीर को अनुशासित करने, शरीर को शुद्ध करने, और शरीर को ऊर्जा के ऊंचे स्तरों के लिए तैयार करने का तरीका है। हम सभी जीवित हैं, हम सभी मनुष्य हैं। लेकिन हम सब जीवन को एक जैसी तीव्रता से अनुभव नहीं करते क्योंकि हमारी प्राण ऊर्जाएं एक जैसी नहीं होतीं। अलग-अलग लोग जीवन को तीव्रता के विभिन्न स्तरों पर अनुभव करते हैं।
उदाहरण के लिए, कोई व्यक्ति किसी पेड़ को देखता है। पेड़ बस पेड़ होता है। ज़्यादातर लोग उसे देखते भी नहीं हैं। कोई व्यक्ति उस पेड़ को ज़्यादा विस्तार में देखता है। कोई कलाकार उसके हर रंग और रूप को देखता है। कोई दूसरा व्यक्ति न सिर्फ़ पेड़ को देखता है, बल्कि उसमें ईश्वर के दर्शन भी करता है। लोगों के द्वारा देखना एक जैसा इसलिए नहीं होता क्योंकि जिस तीव्रता के साथ आप जीवन को अनुभव करते हैं, वह एक जैसी नहीं होती।
योग की पूरी प्रक्रिया आपको उससे आगे ले जाने के लिए है जो आपको ज्ञात है, और आपके द्वारा अज्ञात में अगला कदम लेने के लिए है। हमने इस योग विज्ञान को लगभग भौतिक विज्ञान जैसा बना दिया है। मान लीजिए कि आप हाइड्रोजन के दो हिस्से और ऑक्सीजन का एक हिस्सा मिलाते हैं, तो आपको पानी मिलता है। चाहे कोई महान वैज्ञानिक इसे मिलाए, तब भी पानी ही बनता है। और अगर कोई मूर्ख भी इसे मिलाए, तब भी पानी ही बनता है। इसी तरह, योग में भी, अगर आप इसे, इसे और इसे करते हैं, तो सिर्फ यही होगा। चाहे कोई महान योगी इसे करे या कोई अज्ञानी व्यक्ति, इससे फ़र्क नहीं पड़ता। अगर वह सही तरीके से अभ्यास और साधना करता है, तो नतीजा सामने दिखता है।
योग में, इन प्रणालियों की पहचान की गई है। शुरुआत में, आप शरीर पर काम करते हैं, फिर आप साँस पर आते हैं, फिर मन पर, और फिर अपने भीतरी स्वरूप पर। इस तरह कई चरण बनाए गए हैं। ये बस अलग-अलग पहलू हैं। ये असल में योग की शाखाएँ नहीं हैं। असल में, हम इन सभी पर एक साथ काम करते हैं। यह महत्वपूर्ण है कि इन सभी पर एक साथ, एक इकाई के रूप में, बहुत संतुलित तरीके से काम किया जाए। वरना, अगर आप सिर्फ़ शरीर पर काम करते हैं, तो उसकी प्रकृति तैयारी वाली होगी। तो, असल में कोई विभाजन नहीं है। योग में ये सब एक साथ हैं।
भारत के पचास सबसे प्रभावशाली लोगों में शामिल सद्गुरु एक योगी, रहस्यवादी, दूरदर्शी और ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ के बेस्टसेलिंग लेखक हैं। असाधारण और विशिष्ट सेवा के लिए भारत सरकार ने उन्हें 2017 में देश के सर्वोच्च वार्षिक नागरिक सम्मान ‘पद्म विभूषण’ से सम्मानित किया। वे दुनिया के सबसे बड़े जन-अभियान ‘कॉन्शियस प्लैनेट – सेव सॉइल’ के संस्थापक भी हैं, जिससे 4 अरब से ज़्यादा लोग जुड़े हैं।
