समाज में अक्सर अधिकारों और कर्तव्यों की व्यवस्था को बनाए रखने के लिए, तो कभी किसी खास व्यक्ति या वर्ग की सहूलियत के लिए कई तौर-तरीके अलिखित रूप से शिष्टाचार का रूप लेकर लंबे समय से बने हुए हैं। भले ही ये नियम वर्तमान परिस्थिति के अनुरूप न भी हों, पर इन्हें मनुष्य की सोच के भीतर इस तरह से बैठा दिया गया है कि उन पर विचार-विमर्श या सवाल करने का साहस आम इंसान के जेहन में नहीं आ पाता। अक्सर पीढ़ी-दर-पीढ़ी स्थानांतरित होते रहे तौर-तरीकों का लंबे समय से रहा अस्तित्व और जनसमर्थन ऐसा स्वीकार भाव लाता है, जो श्रद्धा और आस्था का रूप लेने लगता है। आस्था के सामने हम केवल भावनात्मक रूप से ही सोच रहे होते हैं, हमारी तर्क शक्ति पूरी तरह से खत्म-सी हो जाती है। हम परिस्थितियों के आगे समर्पण कर देते हैं।

यह नहीं भूलना चाहिए कि किसी भी तरह के आचरण के नियम उस समय की परिस्थिति के अनुसार बनाए जाते रहे हैं, जिनका समय के साथ संशोधन होते रहना स्वस्थ समाज के लिए आवश्यक है। आज के परिवेश में उनका आकलन जरूर करना चाहिए और देखना चाहिए कि क्या आज भी वे उतने ही सटीक हैं और क्या वे सबके हितों की रक्षा कर पा रहे हैं, क्या वे न्यायपरक हैं। मनुष्य की समझ का दायरा जब समय के साथ विकसित होता रहा है, तो पुराने तौर-तरीके, शिष्टाचार के नियमों पर भी समय-समय पर प्रकाश डाल लेना तर्कसंगत होगा। ऐसा ही शिष्टाचार का एक नियम, जिसने अपनी जड़ें बहुत गहराई से जीवन के हर पक्ष में जमा रखी हैं। वह है हर बात में हां में हां मिलाने की दुर्बलता। अक्सर किसी खास वर्ग के हर निर्णय पर हमारी मौन स्वीकृति हमारे सभ्य होने को रेखांकित कर देती है। यह एक व्यापक रूप से समाज में फैली दुर्बलता है, जो सबको एक-सा व्यवहार करते रहने को बाध्य करती है।

सही को सही और गलत को गलत कहने जैसी स्वाभाविक प्रतिक्रिया को व्यक्त करना भी हमें साहस का काम लगने लगता है। किसी ताकतवर व्यक्ति के करीबी बनने की चाह, तो कभी समाज में सबके पसंदीदा बने रहने की आस में अक्सर मनुष्य अपने उसूलों, विवेक और आत्मसम्मान तक को ताक पर रख देता है। बेहद सुंदर शब्दों का सहारा लेकर इस गुलामी को बनावटी आस्था, नकली श्रद्धा, नैतिकता का रूप देकर अपना लिया जाता रहा है। कभी वह दास्य भाव का रूप लेकर सेवा भाव से खुद को संतुष्ट महसूस कराने लगता है, तो कभी आज्ञाकारी होकर सामने दिए गए हर निर्देश का बिना सवाल के पालन करने लगता है।

विनम्रता की आड़ में हर बात में मौन सहमति, सहनशीलता और हर अच्छे-बुरे काम में सिर झुकाकर सहयोग, यह सब व्यक्ति को कुछ लोगों का पसंदीदा जरूर बना देता है, पर क्या इस तरह से वह खुद के प्रति ईमानदार रह पाता है? अक्सर इस तरह के मौन सम्मान, सहयोग का जन्म हमारे डर का परिणाम होता है जो मात्र किसी और के अहंकार को संतुष्ट करने के लिए किया जा रहा होता है, जिसका उद्देश्य किसी भी तरह की बेहतरी से संबंधित नहीं होता है। इस तरह के आदर और सम्मान की ओट में डर का माहौल हमेशा बना रहता है, जो अच्छे-खासे इंसान को हमेशा झुककर रहने को मजबूर कर देता है। जिसके चलते न तो वह अपने विचार स्वतंत्र रूप से व्यक्त कर पाता है, न ही अपने जीवन के निर्णय आजादी से ले पा रहा होता है। जब व्यक्ति ही अंदरूनी रूप से इतना कमजोर, अधीन हो जाता है, तो ऐसे समाज की नींव भी खोखली हो जाती है।

जब तक निर्भीक होकर स्वतंत्र रूप से अपने विचार रखने, विमर्श करने, तौर-तरीकों में संशोधन करने की आजादी नहीं मिलती, तब तक यह दुर्बलता, जिसने लंबे समय से समाज को जकड़ रखा है, दूर नहीं हो सकेगी। हम गलती करते हैं जब हम अक्सर सामने वाले की हर बात पर सहमति जताने को विनम्रता समझ लेते हैं और असहमति को अनादर। हमारे समाज में अपने वरिष्ठों का कनिष्ठों द्वारा सम्मान उनकी हर बात पर मौन स्वीकृति देने से जोड़ दिया गया है। पदक्रम केवल नौकरी, व्यवसाय, जहां एक व्यवस्थित कार्य प्रणाली होती है और उससे जुड़े नियम होते हैं, तक सीमित नहीं है, समाज के हर पक्ष में पदक्रम अदृश्य रूप से काम कर रहा होता है। किसी के विचार, नियम-कायदे, मान्यताएं सर्वोपरि हो जाती हैं, जिन्हें पालन करते रहने की बाध्यता-सी बन जाती है। आदर-सम्मान, शिष्टाचार के पर्दे में कई लोग लाभान्वित हो रहे होते हैं और कितने ही लोगों का जीवन घुटन में बीत रहा होता है।

क्या वरिष्ठता केवल उम्र की बढ़त, ओहदे और ताकत के बल पर ही प्राप्त हो जाती है? क्या इस तरह ही कोई व्यक्ति सम्माननीय बन सकता है? क्या वरिष्ठता को पाने के लिए वास्तव में किसी भी तरह की मेहनत करने की आवश्यकता नहीं है? इसके लिए योग्यता निर्धारित नहीं होनी चाहिए? किसी भी व्यक्ति के लिए सम्मान उसके अच्छे काम, व्यवहार और गुणों के कारण स्वत: ही मन में उभरने लगता है। सम्मानीय बनने के लिए भी अथाह परिश्रम और संयम की आवश्यकता होती है। अधिकार और कर्तव्य दोनों ही निभाने होते हैं।

समय के साथ जब हमारी सोच पहले से अधिक परिपक्व हुई है, हम अब एक ऐसे समाज की नींव रखने में समर्थ हैं, जहां बिना भेद के स्वतंत्र विचार रखे जा सकें, जहां बराबरी का माहौल हो। आखिर वरिष्ठता हमेशा इंसान को और अधिक विनम्र बनाती है, विचार-विमर्श के कई द्वार खोल देती है, बराबरी को प्रोत्साहित करती है। यह वह समय है जब उम्र, ओहदे के गणित से पृथक खुली सोच के साथ विचारों, गुणों और काम को देखकर सम्मान देना और करना हमें सीखना चाहिए।

एकता कानूनगो बक्षी का विचार