समकालीन समाज एक अजीब विडंबना से गुजर रहा है। भौतिक प्रगति तो आसमान छू रही है, पर मानसिक उन्नति की इच्छा को लोगों ने अवकाश में भेज दिया है। इसका परिणाम मनुष्य की सोच और सुविधा के बीच भारी असंतुलन पैदा कर रहा है। यह बौद्धिक संकट पूरी दुनिया में छाया हुआ है। अमेरिका से लेकर भारत तक कोई भी भूभाग इसका अपवाद नहीं है। इसे समझने के लिए शोध की जरूरत नहीं है। इसका प्रतिबिंब बौद्धिक विमर्शों में देखा जा सकता है।

लोकतांत्रिक समाज में जो बातें सड़क पर हो रही हैं, दुर्भाग्य से वही संसद में भी होती हैं और ठीक उसी रूप में विश्वविद्यालय के सभागारों में भी हो रही हैं। उनके बीच इस अंतर का समाप्त हो जाना बौद्धिक कारखानों में, जो ऑक्सफोर्ड, कैम्ब्रिज, हार्वर्ड, जेएनयू या जादवपुर विश्वविद्यालयों के रूप में हैं, उनकी अविकसित क्षमता और मानसिक भटकाव का संकेत है। इसीलिए अतिशय भौतिकता के बढ़ते नकारात्मक प्रभाव, वैज्ञानिक उपलब्धियों, कृत्रिम मेधा जैसे नवउदारवादी समाज के संकटों से तकनीक के साम्राज्यवाद का खतरा और लोगों में अपनी पहचान के लिए उभरती कट्टर प्रवृत्तियों जैसे भस्मासुरों का मुकाबला करने में इन कारखानों के पात्र पूरी तरह असमर्थ हैं। यही नहीं, वे स्वयं या तो इससे पीड़ित हैं या इसके खाद-पानी बने हुए हैं। मनुष्य का चेतनाशून्य होना पूरी सभ्यता का बीमार हो जाना है।

इस संकट के कारण और निदान पर आत्मालोचन ही बौद्धिकता को पुनर्जागृत करने का एकमात्र रास्ता है। पर यह भी नहीं हो पा रहा है। हर जगह बौद्धिक वर्ग अवसरवाद का शिकार है। साधारणतया अवसरवाद राजनीति के लिए प्रयुक्त होता है। मगर वहां यह काल की दृष्टि से क्षणभंगुर और प्रभाव की दृष्टि से तात्कालिक होता है। यह भी सत्य है कि राजनीति कठोर नियमों से नहीं चल सकती है।

उसे क्षण-क्षण बदलती परिस्थितियों से जूझना पड़ता है और लचीलापन इसकी जरूरत होती है। हजारी प्रसाद द्विवेदी ने लिखा था कि राजनीति विद्युत की तरह चंचला होती है। इसकी सीमा क्या हो, यह जरूर विमर्श का विषय हो सकता है, लेकिन बौद्धिक अवसरवाद का प्रभाव दीर्घकालिक होता है और पीढ़ियों को नुकसान पहुंचाता है। राजनीतिक अवसरवाद दिखाई पड़ता है, मगर यह दिखाई नहीं पड़ता है। यह छद्म स्वरूप में हमारे बीच रहता है।

बौद्धिकों की एक आम शिकायत देखी जा रही है कि राज्यसत्ता की दृष्टि उनके प्रति अनुकूल नहीं है या उदासीन है। वे भूल जाते हैं कि प्रेमचंद, रामधारी सिंह दिनकर, कार्लाइल, गोर्की राजसत्ता के प्रश्रय से या नारेबाजी से नहीं बनते हैं। वे समाज के साधक थे और साधना ही मौलिक बौद्धिकता का निर्माण करती है। बौद्धिकता में भटकाव का कारण यूरोप है। यूरोप के देशों में बौद्धिक कारखानों ने यूरोपीय साम्राज्यवादी हितों के लिए बौद्धिकता का सृजन किया। वे बौद्धिकता को नव-साम्राज्यवादी लक्ष्यों के लिए उपकरण की तरह उपयोग करते रहे। गैर यूरोपीय प्रतिभाएं उनके अनुकूल सर्वेक्षण और आंकड़े एकत्रित करती हैं और सिद्धांत उनके द्वारा प्रतिपादित होता है।

हालांकि पश्चिमी समाज दूसरों के लिए खाई खोदते हुए स्वयं उसमें गिर गया है। वहां के बौद्धिकों का सामर्थ्य सर्वसमावेशी, मानवीय और शुद्ध लोकतंत्र की बात करने में असमर्थ है। प्राचीन एवं मध्यकाल में भारत की जो बौद्धिकता थी, उसका प्रतिबिंब भी समकालीन समाज में नहीं है। यही कारण है कि रवींद्रनाथ ठाकुर ने ‘भारत तीर्थ’ में जो लिखा था, वह आज अधिक प्रासंगिक है- ‘पुरानी रेखाएं लुप्त हो चुकी हैं, नई रेखा के निर्माण की क्षमता बची नहीं है।

विडंबना है कि अहसास करने की ताकत भी जीर्ण हो चुकी है। अपनी स्थिति का अहसास करना ही आज की सबसे बड़ी उपलब्धि मानी जाएगी।’ बौद्धिकता की सबसे बड़ी खासियत होती है सभी प्रकार के वैचारिक और सामाजिक-राजनीतिक बंधनों एवं झुकावों के बावजूद अपनी स्वायत्तता बनाए रखना। यही स्वायत्तता समाज-संस्कृति-राजनीति के प्रति आलोचनात्मक दृष्टि का विकास करती है।

इसकी निरंतरता समाज के लिए एक सौगात होती है। बौद्धिक विमर्श में पूर्वाग्रह पाले बिना परस्पर सत्संग होता है। बौद्धिकता का ह्रास राजनीति और संकीर्णतावादी ताकतों को निष्कंटक बना देता है और समाज की नकारात्मक ताकतों को प्रतिष्ठा प्राप्त करने का अवसर दे देता है। वह अपने विचारकों की फौज पैदा करती है। भूलना नहीं चाहिए कि बौद्धिकता का महानगरीय चरित्र भी इसके ह्रास का कारण है। भारतीय ज्ञान परंपरा बड़े महानगरों या शहरों से नहीं, बल्कि नवद्वीप, साहेबसपारी, काशी से विकसित हुई थी। साहेबसपारी (बिहार) से न्याय तो नवद्वीप (बंगाल) से नव-न्याय दर्शन आया था।

आज भी भारत के दूरदराज के इलाकों में बौद्धिकता के प्रति झुकाव है। यही आशावाद का कारण है। बौद्धिक पुनर्जागरण महानगरीय कारखानों, जो अवसरवाद के शिकार रहते हैं, से नहीं, दूरदराज के नए नवद्वीप और नए नालंदा से ही संभव है। एक राजनीतिक ने, जो चिंतन से लगाव रखते हैं, ठीक ही बताया कि सुदूर क्षेत्रों में ज्ञान आधारित व्याख्यानों को सुनने सैकड़ों लोग एकत्रित होते हैं।

नवीन समाज की आकांक्षा रखने वालों की सुदूर क्षेत्रों में बौद्धिक आवाजाही भविष्य का विलक्षण संकेत है। हमें भूलना नहीं चाहिए कि एक समय राजनीति आलोचनात्मक बौद्धिकता के कारण विभाजित होकर भी अखंडित थी। संपूर्णानंद कांग्रेस के थे और दीनदयाल उपाध्याय की ‘पोलिटिकल डायरी’ का प्राक्कथन लिखा, तो एसएम जोशी समाजवादी थे और उन्होंने नेहरू की आत्मकथा का मराठी में अनुवाद किया। बौद्धिकता की समृद्धि राजनीति और समाज की मानसिक संपन्नता का कारण बनती है। उसी खोज में यात्रा पीढ़ियों के प्रति कृतज्ञता मानी जाएगी।