किसी समाज की सबसे गहरी सच्चाइयां उसकी जागती हुई आंखों में नहीं, उसकी नींद में दिखाई देती हैं। जब विश्राम की रातें छोटी होने लगती हैं, तो समझ लेना चाहिए कि बेचैनी केवल व्यक्ति के भीतर नहीं, व्यवस्था के भीतर भी घर कर चुकी है। भारत आज कुछ ऐसी ही सामूहिक अनिद्रा के दौर से गुजर रहा है। एक ओर देश पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने और वैश्विक नेतृत्व के महत्त्वाकांक्षी लक्ष्यों की चर्चा कर रहा है, वहीं करोड़ों लोगों की रातें सिकुड़ती जा रही हैं। यह हमारी शहरी संरचना, रोजगार की प्रकृति, पारिवारिक बंधनों और सामूहिक भविष्य के भरोसे की कसौटी है। नींद छिनने से केवल चैन नहीं जाता, धीरे-धीरे सपने देखने और उन्हें साकार करने की क्षमता भी कमजोर पड़ने लगती है।
मेहनतकश समाज में गहरी नींद को सबसे बड़ी पूंजी माना जाता था। दिन भर की मशक्कत के बाद थकान स्वाभाविक नींद लाती थी, जो अगले दिन नई ऊर्जा प्रदान करती थी। आज यह सच्चाई तेजी से बदल रही है। अब नींद भी बराबर नसीब नहीं होती। कुछ के पास आरामदायक बिस्तर है, लेकिन नींद नहीं। कुछ के पास समय नहीं। कोई भविष्य की चिंता में जागता है, तो कोई मोबाइल स्क्रीन की नीली रोशनी में अपनी थकान को बढ़ाता रहता है। यह बदलाव व्यक्तिगत जीवनशैली का नहीं, बल्कि पूरी सामाजिक-आर्थिक संरचना में परिवर्तन का संकेत है।
हाल के अध्ययनों ने इस संकट की गंभीरता को उजागर किया है। एक पत्रिका में प्रकाशित 2025 की एक समीक्षा के अनुसार, भारत में लगभग हर चार में से एक वयस्क किसी न किसी प्रकार की अनिद्रा से प्रभावित है। विभिन्न राष्ट्रीय सर्वेक्षण यह भी बताते हैं कि लगभग 60 फीसद भारतीय वयस्क प्रतिदिन छह घंटे से कम नींद ले पा रहे हैं। नींद का संकट अकेले पैदा नहीं होता।
यह एक बेचैन समाज का परिणाम है। जब व्यक्ति को नौकरी की सुरक्षा, स्थिर आय, रहने योग्य शहर और पारिवारिक सहारे का भरोसा होता है, तब सोना अपेक्षाकृत आसान होता है। मगर आज अस्थायी रोजगार, लगातार बढ़ती महंगाई, बैंक ऋण की मासिक किस्तें, बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य की समस्या तथा धुंधला भविष्य रातों में आशंकाओं का सबसे लंबा दौर बना देते हैं। पहले लोग थकान से सोते थे, अब चिंताओं से जागते हैं। पहले मशीनें कारखानों तक सीमित थीं, अब वे जेब में हैं और मनुष्य हर समय काम की परिधि में रहता है।
इस संकट का सबसे गंभीर रूप महानगरों में दिखता है। नौकरी अब आठ घंटे के कार्यालय तक सीमित नहीं रही। दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, हैदराबाद, अहमदाबाद और पुणे जैसे शहरों में औसत एकतरफा यात्रा समय करीब एक घंटे तक पहुंच गया है, जिससे दैनिक आवागमन का कुल समय दो घंटे से अधिक हो जाता है। लाखों कर्मचारी अपना सबसे ऊर्जावान समय सड़कों पर गुजारते हैं। इससे परिवार, बच्चों और व्यक्तिगत विश्राम का समय छिनता है। घर पहुंचते-पहुंचते व्यक्ति शारीरिक और मानसिक दोनों रूप से थक चुका होता है।
घर पहुंचने के बाद भी काम समाप्त नहीं होता। मोबाइल फोन ने कार्यालय को घर के भीतर पहुंचा दिया है। औद्योगिक क्रांति ने मनुष्य के श्रम का समय बदला था। डिजिटल अर्थव्यवस्था ने तो उसके विश्राम का समय भी बदल दिया है। देर रात के ई-मेल, व्हाट्सऐप समूहों की सक्रियता, अचानक होने वाली ऑनलाइन बैठकें और हर समय व्यस्त दिखाई देने की संस्कृति ने काम और निजी जीवन की सीमाएं धुंधली कर दी हैं।
युवा वर्ग पर इसका प्रभाव सबसे गहरा और चिंताजनक है। प्रतियोगी परीक्षाओं का दबाव, सीमित स्थायी रोजगार, कृत्रिम बुद्धिमत्ता से जुड़ी नई अनिश्चितताएं, लगातार नए कौशल सीखने का दबाव और ‘हमेशा बेहतर’ साबित होने की मजबूरी ने युवा मन को अत्यधिक असुरक्षित बना दिया है। राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षणों में युवाओं में चिंता और अवसाद के बढ़ते मामले दर्ज हुए हैं, जो सीधे नींद की समस्या से जुड़े हैं। जो पीढ़ी डिजिटल रूप में जुड़ी हुई है, वही भावनात्मक रूप से खुद को सबसे अधिक अकेला महसूस कर रही है।
नींद की कमी का प्रभाव सूक्ष्म, लेकिन व्यापक है। अधूरी नींद वाला कर्मचारी अधिक गलतियां करता है, ड्राइवर जोखिम लेता है, छात्र सीखने में पिछड़ता है और परिवार में धैर्य की कमी आती है। चिकित्सा विज्ञान स्पष्ट रूप से चेतावनी देता है कि लगातार कम नींद उच्च रक्तचाप, मधुमेह, हृदय रोग, अवसाद और स्मृति ह्रास से जुड़ी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन और अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन लंबी कार्य अवधि को समय से पहले होने वाली मौत के प्रमुख कारणों में गिनते हैं।
कामकाजी महिलाओं के लिए स्थिति और जटिल है। दफ्तर से घर लौटने के बाद उनके काम की दूसरी पाली शुरू होती है। इससे उनकी नींद सबसे पहले कुर्बान होती है। यह श्रम के साथ-साथ आराम के असमान वितरण की समस्या भी है, जो स्वास्थ्य संबंधी चिंताएं बढ़ाती है। घरेलू श्रम की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि इसका हिसाब कहीं दर्ज नहीं होता, लेकिन उसकी कीमत नींद को चुकानी पड़ती है।
आधुनिक अर्थव्यवस्था ने समय को पूंजी में बदल दिया है। देर रात काम करना, सप्ताहांत पर भी जवाब देना और ‘व्यस्त दिखना’ सफलता का प्रतीक बन गया है। जबकि अध्ययन साबित करते हैं कि पर्याप्त नींद लेने वाले कर्मचारियों की रचनात्मकता, निर्णय क्षमता और उत्पादकता बेहतर होती है। कम सोना अधिक काम करने का प्रमाण नहीं, बल्कि अक्सर कम प्रभावी काम करने का कारण बनता है।
भारत में मानसिक स्वास्थ्य की स्थिति चिंताजनक है। अनिद्रा अक्सर गहरे तनाव का लक्षण होती है। यदि हम केवल दवाओं से इसे दबाएंगे, तो समस्या की जड़ को अनदेखा कर देंगे। यह मुद्दा लोकतंत्र से भी जुड़ता है। थका हुआ समाज कम पढ़ता है, कम सोचता है और कम सवाल उठाता है। सजग नागरिकता के लिए मानसिक ऊर्जा जरूरी है, जो पर्याप्त विश्राम से आती है।
विकास की चर्चा अक्सर सड़कों, हवाई अड्डों और जीडीपी वृद्धि तक सीमित रहती है। यह जरूरी है, लेकिन विकास का अंतिम उद्देश्य मनुष्य का बेहतर जीवन है। यदि विकास प्रक्रिया ही आराम, परिवार और मानसिक शांति छीन ले, तो उसकी दिशा पर पुनर्विचार आवश्यक है।
दरअसल, नींद किसी गद्दे, तकिए या दवा से शुरू नहीं होती। वह भरोसे से शुरू होती है। इस भरोसे से कि कल की नौकरी सुरक्षित है, शहर आदमी को पूरी तरह नहीं निगलेगा, परिवार के लिए समय बचेगा और भविष्य केवल चिंता का दूसरा नाम नहीं है। जिस समाज में यह भरोसा मजबूत होता है, वहां लोग अपेक्षाकृत शांति से सोते हैं। और जहां रातें आशंकाओं में गुजरती हैं, वहां केवल आंखें ही नहीं, भविष्य भी थकने लगता है।
किसी भी विकास की सबसे बड़ी कसौटी अंततः नागरिकों का जीवन होता है, न कि अर्थव्यवस्था का आकार। हम अक्सर पूछते हैं कि भारत विकसित राष्ट्र कब बनेगा। शायद अब एक और प्रश्न भी पूछने का समय है— क्या भारत के नागरिक चैन की नींद सो पा रहे हैं? किसी राष्ट्र के बड़े सपने केवल प्रयोगशालाओं और उद्योगों में नहीं बनते। वे उन शांत रातों में जन्म लेते हैं, जहां मनुष्य भविष्य से भयभीत नहीं होता, बल्कि उसके बारे में सपने देखने का साहस करता है।
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दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन स्थल जंतर- मंतर पर भारी भीड़ उमड़ने के बीच संक्रामक बीमारियों का खतरा मंडराने लगा है। भीषण गर्मी, उमस और धरना स्थल पर उमड़ी भीड़ में शामिल लोगों में सिरदर्द और गले में दर्द की शिकायतों के साथ वायरल बुखार तेजी से फैलने की आशंका है। खांसने और छींकने से एक-दूसरे में फैल रहे इस संक्रमण ने प्रदर्शनकारियों की परेशानी बढ़ा दी है। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक
