भारत में वामपंथ का शताब्दी वर्ष बिना किसी विमर्श के बीत गया। जो वामपंथी दल बात-बात पर दस्तावेज प्रकाशित करते थे, आज उनकी बौद्धिकता पर सन्नाटा छाया हुआ है। एक समय था, जब बीटी रणदिवे, भूपेश गुप्ता, पी. सुंदरैया, ईएमएस नंबूदरीपाद, हरकिशन सिंह सुरजीत जैसे वाम नेताओं की लेखनी विमर्श को इस हद तक प्रभावित करती थी कि सत्ताधारी दल (कांग्रेस) को उसमें कूदने के लिए बाध्य होना पड़ता था। छोटी-छोटी घटनाओं पर भी सौ दस्तावेज आ जाते थे।

इसके दो उदाहरण हैं- मानवेंद्र राय पहले और अंतिम मार्क्सवादी थे, जिन्होंने दुनिया के वाम आंदोलन में अपनी जगह बनाई। वे सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी के सर्वोच्च नेता लेनिन को वैचारिक जवाब देने की पात्रता रखते थे। इसी क्रम में लेनिन की नापसंदगी हुई और वे रातों-रात ‘प्रतिक्रियावादी’ घोषित हो गए। जब वे लौटकर भारत आए, तो उनके समर्थन एवं विरोध में सैकड़ों दस्तावेज लिखे गए।

दूसरी घटना वर्ष 1962 की है, जब भारत-चीन युद्ध को लेकर कम्युनिस्ट पार्टी में ‘कौन गलत, कौन सही’ के सवाल पर दंगल हुआ। चीन की पक्षधरता को लेकर पार्टी के विचारक एक-दूसरे के आमने-सामने थे। इस पर दस्तावेजों की भरमार लग गई।

आत्मालोचन से दूरी और वैचारिक संकट की गूंज

वर्ष 2025-26 वैचारिक-संगठनात्मक-चुनावी गिरावट पर गौर करने का अवसर था, जो अंधेरे में खो गया। जो बात वर्ष 1978 में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने बंगाल के सालकिया की बैठक में की थी, उसे दोहराने का नैतिक साहस अब उसमें शायद नहीं बचा है। तब पार्टी ने आत्मालोचन किया था और अपनी गिरावट के लिए तीन कारणों को रेखांकित किया था, जिसमें एक सार्वजनिक विमर्श के लिए उपयोगी था, जबकि दो अन्य पार्टी की संगठनात्मक कमजोरी से जुड़े थे।

यह था ‘बुर्जुआ अवगुणों’ का पार्टी में समावेश। इसका अर्थ बताया गया कि भाई-भतीजावाद, भ्रष्टाचार, संसाधनों को एकत्रित करने की लालसा और व्यक्तिवादी प्रवृत्ति का पार्टी की संस्कृति में संक्रमण। तब और अब में कितना अंतर आ गया है। आज पार्टी केरल के पूर्व मुख्यमंत्री पिनरई विजयन के परिवार पर कथित भ्रष्टाचार के आरोप के बावजूद उनके समर्थन में सड़कों पर है।

इस प्रदर्शन को राजनीतिक बचाव कहा जा सकता है। जब राजनीति और सामाजिक जीवन में मूल्यों का सामूहिक क्षरण होता है, तब वित्तीय अनियमितताओं, अनैतिक आचरणों और कुसंस्कृति के प्रत्यक्ष उदाहरणों को सार्वजनिक रूप से सही बताना पुरुषार्थ बन जाता है। और ऐसे पुरुषार्थी ही पुरस्कृत किए जाते हैं। यह तब होता है, जब शेष समाज अपने आपको तमाशबीन बना लेता है। ऐसे समय में विचार, दर्शन और मूल्यों की बात करना असंतुष्ट घोषित होने का जोखिम उठाना होता है। वामपंथ में इस जोखिम को उठाने वाले कभी बहुतायत में होते थे, वे अब नहीं दिखते।

जनसंघ के सिद्धांतकार पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने वर्ष 1967 में पार्टी के कालीकट अधिवेशन में भारत के कम्युनिस्टों को आलोचनात्मक सुझाव दिया था। उन्होंने कहा था कि समानता की लड़ाई किसी का एकाधिकार नहीं है। उन्होंने वामपंथियों के भीतर विदेशज से देशज बनने की इच्छाशक्ति का अभाव बताया था। तब वामपंथी इस आलोचना को नजरअंदाज कर गए।

वामपंथी मार्क्स के दर्शन को मानने के लिए स्वतंत्र थे और हैं, मगर उन्होंने भारतीय विचारों को अस्पृश्य बनाकर रखा। सिर्फ भारत का विचार है, इसलिए उसे मानने की बाध्यता नहीं हो सकती। बाध्यता का कारण उसकी सर्वकालिक उपयोगिता है। भारतीय दर्शन की एक विशिष्टता, जो इसे पाश्चात्य से अलग करती है, वह है कि इसमें भौतिकता का महिमामंडन नहीं है। धन अर्जन और भौतिक चमक-दमक के जीवन-दर्शन में नैतिक-अनैतिक का अंतर समाप्त होना स्वाभाविक है।

मैत्रेयी का प्रश्न और वामपंथ का वैचारिक द्वंद्व

भारत की दार्शनिक मैत्रेयी ने ऋषि याज्ञवल्क्य से जो प्रश्न किया था, वह सामंतवाद, पूंजीवाद, नवउदारवाद सभी व्यवस्थाओं की जन्मजात न्यूनताओं का समाधान है। मैत्रेयी ने पूछा था कि ‘धन की प्रचुरता से क्या मन की संतुष्टि और जीवन की अमरता प्राप्त की जा सकती है?’ वृहदारण्यक और छांदोग्य उपनिषदों में यह संवाद मनुष्य को धन-संग्रह की प्रवृत्ति से बचाने का व्यावहारिक एवं दार्शनिक संदेश है। ऐसे तो गैर-वामपंथी भी उसे उद्धृत कर अपना काम पूरा मान लेते हैं, मगर वामपंथियों के लिए उसका नाम लेना भी साम्यवाद से भटकाव हो जाता है।

समानता और सृष्टि का पोषण, दोनों बातें भारतीय दार्शनिक भारुचि, तनका और गुहादेव आदि में भरपूर मिलती हैं। साम्यवादियों ने उसको जानने की जरूरत तक महसूस नहीं की। किसी भी विचार को उपयोगी बनाए रखना अपनी सोच और भूमिका का फलक बढ़ाना होता है। विचारों में रूढ़िवादिता उसको धीरे-धीरे कमजोर करती है। दूसरा, वैचारिक अस्पृश्यता स्व-विकास को रोकती है। एक ही तरह की बात एक ही जैसे लोगों से लगातार सुनने से आलोचनात्मक सृजन की ताकत का क्षरण हो जाता है।

भारत के कम्युनिस्ट समकालीन विचारधाराओं से तो दूर रहे ही, अपनी सभ्यता की विरासत के साथ अनुभव लेने से भी भागते रहे। यह और बात है कि उनके आलोचकों ने भी वैचारिक असामाजिकता को अपना लिया। अब एक-दूसरे से वैचारिक संसाधनों को लेना गुनाह बन गया है। भारतीय वैचारिक क्षितिज का यह सबसे घातक पहलू बन गया है।

नवउदारवाद के खिलाफ कम्युनिस्ट और गैर-कम्युनिस्ट दोनों हैं, पर विचारों की न्यूनतम साझेदारी नहीं है। नवउदारवाद ने धन सृजन और संग्रह को ही सब कुछ मान लिया। फलस्वरूप धन का विकेंद्रीकरण एक समानता एवं आर्थिक नैतिकता और गैर-विकासवादी अवधारणा के रूप में निंदित होने लगा है। इस विडंबना से बाहर निकलने के लिए मार्क्स से अधिक मैत्रेयी की सार्थकता है। मगर उनकी विरासत का बोझ ऐसा करने से रोकता है। यही उनके बीच बौद्धिक सन्नाटे का कारण भी है।

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सत्यभक्त कौन थे? यह प्रश्न सिर्फ एक व्यक्ति की पहचान से जुड़ा नहीं होकर भारत के कम्युनिस्ट आंदोलन के चरित्र और प्रकृति को भी दिखाता है। भारत में कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना का विचार सबसे पहले उनके मन में आया और कानपुर में 1925 में इसकी स्थापना हुई। उसी वर्ष उन्होंने चार पृष्ठों का दस्तावेज जारी किया, जिसे सरकार ने प्रतिबंधित कर दिया। वे पार्टी की नींव रखने वाले थे। पर कम्युनिस्ट इतिहास में उनका नाम कहीं नहीं है, बल्कि वे निंदा के पात्र हैं। ऐसा क्यों हुआ? पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक