भारत शिक्षा के मामले में सदियों से अग्रणी रहा। हमारी पुरानी शिक्षा व्यवस्था दुनिया को राह दिखाती थी। बड़ी संख्या में विद्यार्थी यहां पढ़ने के लिए आते थे। यहां गुरुकुल से कई ऐसे विद्यार्थी निकले, जिन्होंने दुनिया को राह दिखाई। मगर समय बदलने के साथ भारतीय शिक्षा प्रणाली में अनेक बदलाव हुए। भारत, जो कभी ज्ञान और नवजागरण के क्षेत्र में अग्रणी था, वह पिछड़ता चला गया।

हम पश्चिमी शिक्षा की नकल करने लगे। हमारी शिक्षा व्यवस्था ने शोध और अन्वेषण को कम कर दिया। कला संकाय का महत्त्व कम होता चला गया। शिक्षा पर बाजार हावी होने लगा। नए रास्ते पर चलने की हमारी ललक खत्म हो गई। दुनिया डिजिटल होती गई और इंटरनेट उसकी आधारभूमि बन गया। आज भारत कृत्रिम मेधा का इस्तेमाल कर दुनिया के अग्रणी देशों में शामिल होना चाहता है।

यह सच है कि ज्ञान के आकाश का कोई अंत नहीं, लेकिन भारत अगर सचमुच उस ऊंचाई को छूना चाहता है, तो उसे शिक्षा व्यवस्था में बुनियादी परिवर्तन करने होंगे।

पिछले डेढ़ दशक में डिजिटल तकनीक को अपनाने और इस दिशा में आगे बढ़ने के कई दावे किए गए हैं। भारत कृत्रिम मेधा का अगुआ बनने की कोशिश भी कर रहा है, लेकिन एक कमी रह गई। यह कमी है संकल्प की। हम बेहतरीन शिक्षक तैयार नहीं कर पा रहे हैं। विद्वता बढ़ाने पर भी कोई जोर नहीं दिखता। इच्छा और आकांक्षा जरूर थी, लेकिन अध्यापकों की प्रतिबद्धता में बदलाव नहीं आया। विद्यार्थी उपलब्धियां हासिल करने को ही लक्ष्य मान बैठे। नतीजा यह कि मेहनत और अन्वेषण कर आगे जाने का उत्साह कम पड़ता चला गया। यही कारण है कि हमारी शिक्षा व्यवस्था धीरे-धीरे पिछड़ती चली गई।

बच्चों को पढ़ाने में शिक्षक भी इसलिए पिछड़े, क्योंकि उन्होंने खुद को अद्यतन नहीं किया। नतीजा यह कि हमारे विद्यार्थी समय के साथ आगे नहीं बढ़े। डिजिटल में सहज होने के क्रम में हम कागज-कलम से दूर हो गए। इसी के साथ हम अपनी पुस्तक संस्कृति भी भूल गए। मोबाइल फोन पर ही कक्षाएं लगने लगीं। बच्चे भी वहीं पढ़ने लगे। किताबें कोने में धरी रह गईं। डिग्रियां पाने और सार्वजनिक प्रतियोगिताओं में सफलता प्राप्त करने की होड़ शुरू हो गई। इसके परिणामस्वरूप शिक्षा का असली उद्देश्य पीछे रह गया।

प्रवेश परीक्षाओं में गड़बड़ी कोई नई बात नहीं है। यह काफी समय से हो रही है। मगर जब बड़े पैमाने पर आयोजित होने वाली परीक्षाओं के प्रश्नपत्र बाहर आने लगे, तब इस समस्या को गंभीरता से लिया गया और यह मुद्दा बनने लगा। प्रश्नपत्र लीक को कुछ गिरोहों ने अपना धंधा बना लिया और वे लाखों विद्यार्थियों के भविष्य से खेलने लगे। वर्ष 2024 और 2026 में बड़े पैमाने पर प्रश्नपत्र लीक हुए। निराशा में डूबे कुछ विद्यार्थियों ने खुदकुशी की। इन प्रतिकूल परिस्थितियों के बीच विद्यार्थियों ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर पिछले दिनों आंदोलन किया। युवा पीढ़ी का असंतोष आक्रोश में बदल गया। नतीजा, शिक्षा मंत्री को त्यागपत्र देना पड़ा। हालांकि, इससे शिक्षा व्यवस्था में कोई बदलाव होगा, इसकी कोई गारंटी नहीं।

प्रवेश परीक्षाओं को दुरुस्त करने के लिए सरकार को भागीरथ प्रयास करने होंगे। पिछले दिनों प्रधानमंत्री ने इंस्टाग्राम पर संबोधन कर आक्रोशित विद्यार्थियों को शांत करने और उन्हें समझाने का प्रयास किया कि सरकार अपनी तरफ से क्या कर रही है। इसमें उन्होंने प्रश्नपत्र लीक करने वाले अपराधियों को दंड देने की व्यवस्था की बात भी की। बीती 27 जुलाई को जब संसद का सत्र दोबारा शुरू हुआ, तो परीक्षा संशोधन विधेयक पेश किया गया। इससे प्रश्नपत्र लीक करने वाले गिरोहों पर नकेल कसी जा सकेगी। सरकार इस विधेयक को काफी महत्त्व दे रही है, मगर इसमें गंभीर चिंतन नहीं दिखता है। इस पर संसद में व्यापक बहस भी नहीं हो पाई। कड़े दंड के प्रावधानों वाला यह विधेयक बहुमत के बल पर पारित तो हो गया, लेकिन परीक्षा व्यवस्था और शिक्षा में सुधार के लिए यह काफी नहीं है।

पिछला अनुभव बताता है कि दोषियों को सजा देने के कानून तो पहले भी थे। चाहे उनमें सजा इतनी सख्त नहीं थी, लेकिन फिर भी पिछले पच्चीस वर्षों में देश भर के अलग-अलग हिस्सों से जो प्रश्नपत्र लीक हुए और माफिया ने जो कारगुजारी की, उस हिसाब से बड़े पैमाने पर धर-पकड़ नहीं हुई।

फिलहाल सरकार ने एक बड़ी पहल की है। उसने त्वरित अदालतें बनाई हैं। तीन महीने में फैसला देकर अपराधियों को कड़ी सजा देने की घोषणा भी की गई है, लेकिन पिछले दिनों एक मामले में वकील के हाजिर न होने से अगली तारीख दे दी गई। दंड प्रक्रिया को चुस्त कर प्रवेश परीक्षाओं को शुचितापूर्ण तो बनाया जा सकता है, लेकिन सवाल है कि यह पूरी तरह दोषरहित कैसे होगी? हालांकि, सरकार इसको लेकर गंभीर दिख रही है। उसने छह सदस्यीय उच्चस्तरीय कार्यबल बना दिया है, जो राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी के काम की समीक्षा करेगा और प्रश्नपत्र लीक रोकने के लिए अपनी सिफारिशें देगा। इससे परीक्षा प्रणाली में सुधार की उम्मीद है।

देश की शिक्षा प्रणाली में आमूल-चूल परिवर्तन करने की जरूरत है। नीति-निर्माताओं को यह बात ध्यान में रखनी होगी कि शिक्षा के क्षेत्र में दुनिया आज कितने आगे बढ़ चुकी है और हम अभी नारे ही गढ़ रहे हैं। हम नारे लगाते हैं डिजिटल भारत के। हम बताते हैं कि भारत में मोबाइल क्रांति हो गई है और जल्द ही कृत्रिम मेधा को भी साध लिया जाएगा। इस दिशा में प्रगति निस्संदेह प्रशंसनीय है, मगर सवाल यह है कि क्या हम युवा पीढ़ी को नए रोजगार के काबिल बना रहे हैं? आज भी न तो अध्यापक और न ही छात्र नई राहों के अन्वेषी हैं। वे कोई नया शोध करना नहीं चाहते। वे बस डिग्रियां चाहते हैं। आज भी पाठ्यक्रमों में बड़ा बदलाव नहीं होता। बरसों तक उन्हें वहीं पढ़ाया जाता है।

भारत की साठ फीसद आबादी गांवों में बसती है। मगर वहां पुस्तकों की पर्याप्त उपलब्धता नहीं है, मोबाइल नेटवर्क या तो है ही नहीं या फिर बहुत कमजोर है और यहां चर्चा होती है कि नीट सहित सारी प्रतियोगी परीक्षाएं कंप्यूटर से ली जानी चाहिए। सुधार कैसे होगा, जबकि स्कूलों में पढ़ाई का तरीका वही पुराना है? सरकार कहती है कि ज्यादातर बच्चे स्कूल जाने लगे हैं, लेकिन सच यह है कि दसवीं तक पहुंचने के बाद उनमें से कई बच्चे स्कूल से निकल जाते हैं।

उच्च स्तर पर शिक्षा में बदलाव का आधार स्कूली शिक्षा होनी चाहिए। बदलाव करना है, तो प्राथमिक स्तर से हो। शिक्षा को रोजगारपरक बनाया जाए, लेकिन यह सब रोजगार की गारंटी के बिना संभव नहीं होगा। जो विद्यार्थी पढ़ने के लिए आता है, वह आश्वस्त हो कि उसकी मेहनत और डिग्री के मुताबिक उसे रोजगार अवश्य मिलेगा। इससे छात्रों का शिक्षा के प्रति दृष्टिकोण अपने आप बदल जाएगा। अध्यापकों पर भी बड़ी जिम्मेदारी है। नए माहौल के मुताबिक जब तक वे स्वयं को अद्यतन नहीं करेंगे, तब तक बात नहीं बनेगी।