लोकतंत्र एक ऐसा पौधा है, जो जिंदा तब तक रहता है, जब तक आम नागरिक उसकी अहमियत समझते हों। इसलिए पिछले सप्ताह मुझे पहली बार लगने लगा कि भारत में लोकतंत्र को खतरा होने लगा है। ऐसा खतरा, जो छिप-छिपकर वार कर रहा है।
कहने को तो सब ठीक है। चुनाव होते रहते हैं, किसी न किसी राज्य में हर साल। ऊपर से काकरोच जनता पार्टी ने सबको याद दिलाया है कि लोकतंत्र का मतलब और उसका महत्त्व वे बच्चे भी समझ गए हैं, जिन्होंने शायद कभी किसी चुनाव में वोट नहीं डाला है।
जंतर-मंतर पर उन्होंने दिखाया है कि लोकतंत्र का असली मतलब है कि सत्ता हिलाई जा सकती है, जब आम लोगों को एहसास होने लगता है कि उनकी निजी शक्ति सत्ताधारियों से कहीं ज्यादा है। सो उस प्रधानमंत्री को उन्होंने घुटनों पर लाकर दिखाया, जो अपने बारे में बहुत बार कह चुके हैं कि उनकी छाती छप्पन इंच की है और उनके सामने दुनिया के बाकी नेता बौने लगते हैं। नरेंद्र मोदी ने यह भी दिखाया है कि उनके सामने इस देश के बाकी नेता इतने ज्यादा बौने हैं कि उनके राजनीतिक दल आसानी से तोड़े जा सकते हैं।
जंतर मंतर पर युवाओं ने अपनी शक्ति दिखाई
तकरीबन सारे विपक्षी दल टूटकर बिखर चुके हैं, इतनी बुरी तरह कि चुनाव मैदान में मोदी के सामने कोई ताकतवर प्रतिद्वंद्वी दिखता ही नहीं है। युवाओं ने जंतर-मंतर से अपनी शक्ति न दिखाई होती, तो उनके भक्त आज भी पूरे यकीन से कहते फिरते कि 2029 में ‘आएगा तो मोदी ही’।
अब लगता है कि मोदी की टीम थोड़ी घबरा गई है। सोशल मीडिया पर जो होने लगा है, उसकी तरफ ध्यान देंगे तो देखेंगे कि मोदी सरकार और उनके समर्थकों ने एक ऐसी मुहिम छेड़ रखी है, जिसका मकसद काकरोच जनता पार्टी को बदनाम करना है।
यह मैं इसलिए कह रही हूं कि सोशल मीडिया पर मेरी नजर दिन भर रहती है और वहां से जो आम लोगों की आवाज उठती है, उसे मैं पूरे ध्यान से सुनती हूं।
जब से काकरोच जनता पार्टी ने शिक्षा मंत्री को उनके पद से हटाया है, तब से मोदी के खास भक्त ऊंची आवाज में कहने लगे हैं कि जो हुआ वह अलोकतांत्रिक था और ऐसा किसी दूसरे लोकतांत्रिक देश में हो ही नहीं सकता। यानी भारत ही एक ऐसा देश है, जहां युवाओं को प्रधानमंत्री के खिलाफ उल्टी-सीधी बातें बोलने के बावजूद उन पर कोई कानूनी कार्रवाई नहीं होगी।
हुआ ऐसा कि मैंने एक वीडियो देखा, जिसमें अरुंधति राय को जंतर-मंतर पर दिखाया गया है। वहां वे कहती हैं कि बहुत दिनों बाद उन्हें भारतीय होने पर गर्व होने लगा है।
आगे यह मशहूर लेखिका कहती हैं कि अब वे खुशी से मर सकेंगी, क्योंकि देश के नौजवानों ने ऐसा कुछ करके दिखाया है, जिससे उनके दिल में एक बार फिर उम्मीद जाग गई है।
इस वीडियो को एक मोदी समर्थक ने ‘एक्स’ पर साझा करते हुए लिखा कि ऐसी बातें किसी और देश में लोग कह नहीं सकते। क्या चीन, उत्तर कोरिया या रूस में इस तरह की बातें कोई कर सकता है?
मैंने इस पोस्ट पर ‘एक्स’ में टिप्पणी की कि भारत एक लोकतांत्रिक देश है, इसलिए उसकी तुलना तानाशाही देशों से नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक देशों से करनी चाहिए।
यहां याद दिलाना चाहूंगी कि अगर आप अमेरिकी टीवी चैनलों से थोड़े-बहुत भी परिचित हैं, तो आपने देखा होगा कि वहां मशहूर एंकर किस तरह रोज डोनाल्ड ट्रंप का मजाक उड़ाते हैं। कभी उनकी नकल करके, कभी उनकी नीतियों की आलोचना करके और कभी उनके परिवार की कथित भ्रष्ट आदतों पर टिप्पणी करके।
हैरानी तब हुई, जब मेरी इस टिप्पणी के बाद मुझे कितनी गालियां पड़ीं। कुछ लोगों ने कहा कि ट्रंप के खिलाफ जिसने भी आवाज उठाई है, उसका वीजा रद्द कर उसे सीधे वापस भेज दिया जाता है।
सच यह है कि किसी विदेशी व्यक्ति ने अपने मेजबान देश के प्रधानमंत्री के खिलाफ अगर जंतर-मंतर पर खड़े होकर आवाज उठाई होती, तो उसके साथ भी ऐसा हो सकता था। मगर अरुंधति भारतीय हैं, इसलिए उनके साथ ऐसा नहीं हो सकता और उन्हें अपनी बात कहने का पूरा अधिकार है।
मेरी इस बात से सोशल मीडिया पर ऐसी बहस छिड़ गई, जिसमें मुझे भी राष्ट्रविरोधी घोषित कर दिया गया और ढेर सारी गालियां सुनने को मिलीं, भाजपाइयों से भी और आम लोगों से भी।
कुछ लोगों ने कंगना रनौत की तरह यहां तक कहा कि हमारे प्रधानमंत्री को कई लोग भगवान मानते हैं, इसलिए उनके खिलाफ कुछ कहना न सिर्फ गलत है, बल्कि भगवान का अपमान भी है।
इन बातों को सुनने के बाद मैं कुछ देर सोच में पड़ गई, क्योंकि मैंने इंदिरा गांधी का आपातकाल भी देखा है। तब भी हम लोग चुपके से इंदिरा गांधी को खूब गालियां दिया करते थे। और जब 1977 का चुनाव आया, तो मतदाताओं ने इंदिरा गांधी और उनके बेटे को उनके अपने चुनाव क्षेत्रों में हराकर दिखा दिया कि जनता की शक्ति कितनी बड़ी होती है।
मोदी के दौर में, जब तक काकरोच जनता पार्टी नहीं बनी थी, किसी ने खुलकर बोलने की अगर हिम्मत नहीं दिखाई, तो उसकी वजह यह थी कि माहौल में खौफ बढ़ता जा रहा था। यहां तक कि जाने-माने टीवी एंकर भी अपनी बातें दबी जुबान में रखते हैं।
रही मेरी अपनी बात, तो मैं बेझिझक कहने को तैयार हूं कि मैं खुद फूंक-फूंककर चलती हूं और डर-डरकर अपने लेख लिखती हूं। ऐसा उन देशों में नहीं होता, जहां लोकतंत्र की जड़ें मजबूत होती हैं।
भारत में ये जड़ें इतनी कमजोर हैं कि आम लोग भी मानते हैं कि लोकतंत्र की सीमा चुनाव जीतने तक ही रहती है। लोकतंत्र के लिए यह खतरनाक नहीं है क्या?
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जब तक प्रधानमंत्री ने काकरोच जनता पार्टी के विरोध प्रदर्शन पर चुप्पी तोड़ी, उससे पिछले सप्ताह उनके गुमशुदा होने के पोस्टर फैल रहे थे सोशल मीडिया पर। पोस्टर पर उनके मुस्कुराते चेहरे के नीचे लिखे थे ये शब्द- ‘क्या इस व्यक्ति को देखा है आपने? नाम- नरेंद्र मोदी, छाती- 56 इंच, सुनने-देखने में अक्षम हैं। पिछली बार दिखे थे मेलोनी के साथ।’ इस पोस्टर को मैंने उस दिन देखा, जिस दिन प्रधानमंत्री ने वादा किया कि पेपर लीक की साजिश रचने वालों के लिए ‘त्वरित अदालतें’ बननेवाली हैं। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक
