भारतीय संस्कृति में तप एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण मूल्य रहा है। इसका संबंध केवल धार्मिक साधना से नहीं बल्कि अपनी गुणवत्ता में वृद्धि, परोपकार और किसी उच्च उद्देश्य की प्राप्ति के लिए स्वेच्छा से शारीरिक और मानसिक कष्ट सहने से है। भगीरथ, ध्रुव, दधीचि, महावीर और बुद्ध जैसे महापुरुषों से लेकर रामकृष्ण परमहंस, महर्षि रमण, महात्मा गांधी, विनोबा भावे, मार्टिन लूथर किंग और नेल्सन मंडेला तक अनेक व्यक्तित्व तप के आदर्श रहे हैं। ऐसे अनेक तपस्वी भी हुए हैं, जिन्हें व्यापक प्रसिद्धि नहीं मिली, पर जिन्होंने अपना जीवन समाज के लिए समर्पित कर दिया।
तप का अर्थ है स्वेच्छा और प्रसन्नतापूर्वक कष्ट स्वीकार करना। यही भावना साधारण कष्ट को आनंद और आत्म-विकास का माध्यम बना देती है। सोने को तपाने से जैसे उसकी चमक बढ़ती है, वैसे ही तप मनुष्य के व्यक्तित्व को निखारता है। संगीत, योग, साहित्य, भक्ति और समाज सेवा जैसे क्षेत्रों में उत्कृष्टता का आधार भी दीर्घकालीन तप ही रहा है। पंडित रविशंकर ने अपनी आत्मकथा में अपने गुरु उस्ताद अलाउद्दीन खां के कठोर अभ्यास का जो वर्णन किया है, वह बताता है कि किसी क्षेत्र में सिद्धि बिना तप के संभव नहीं।
तप के ऐसे पक्ष जिन पर कम ध्यान दिया जाता
तप के दो ऐसे पक्ष हैं जिन पर आज कम ध्यान दिया जाता है। पहला, तप के लिए समय चाहिए, जबकि आज अधिकांश लोग शीघ्र परिणाम चाहते हैं। दूसरा, तप का सबसे बड़ा प्रभाव व्यक्ति के भीतर होता है, जो बाहर से तुरंत दिखाई नहीं देता। आज सफलता का मूल्यांकन लोकप्रियता, धन और बाजार की कसौटी पर होने लगा है। जबकि श्रेष्ठता और लोकप्रियता हमेशा एक-दूसरे की पर्याय नहीं होतीं। पतंजलि के योगसूत्र में तप को ‘नियम’ का आवश्यक अंग माना गया है और क्रियायोग के तीन प्रमुख तत्वों- तप, स्वाध्याय और ईश्वर-प्रणिधान में उसको स्थान दिया गया है। इससे स्पष्ट है कि भारतीय चिंतन में तप केवल व्यक्तिगत साधना नहीं, बल्कि आत्म-विकास का अनिवार्य साधन रहा है।
तप का भाव लंबे समय तक विविध रूपों में विद्यमान रहा
हमारे समाज में तप का भाव लंबे समय तक विविध रूपों में विद्यमान रहा। उपवास, व्रत, सेवा, अनुशासन और त्याग उसी के रूप हैं। माता-पिता बच्चों को दूसरों के लिए कष्ट उठाने की शिक्षा देते थे, शिक्षक अपने शिष्यों को विषय के गहन अध्ययन के लिए प्रेरित करते थे और विद्यार्थी आज की तरह किन्हीं दर्ज बिंदुओं पर आश्रित न रह कर मूल ग्रंथों का अध्ययन करते थे। सेवा को भी तप का रूप माना जाता था।
एक परिचित ने अपने वृद्ध माता-पिता की सेवा को जीवन का प्रमुख दायित्व माना जबकि उसके अन्य भाइयों ने उसमें विशेष रुचि नहीं ली। यह सेवा-तप का एक प्रेरक उदाहरण था। किसी उद्देश्य के प्रति समर्पण और उसके लिए धैर्य का धारण भी तप ही है। कई लोग किसी लक्ष्य का निर्धारण तो कर लेते हैं, लेकिन उसे प्राप्त करने के लिए जिस मार्ग पर चलना पड़ता है, उस पर चलने का धैर्य नहीं रखते। ऐसे में मन में जिस तरह की हड़बड़ी या जल्दी मचती है, उसके नतीजे में या तो लक्ष्य की ओर का यह सफर अधूरा रह जाता है या फिर व्यक्ति रास्ता भटक कर कहीं और पहुंच जाता है।
आज तप-भाव तेजी से क्षीण होता जा रहा
इसके बाद एक समस्या और आती है। अपनी चूक पर गौर नहीं करने के बाद या तो लक्ष्य को या फिर रास्ते को कठघरे में खड़ा किया जाता है। जबकि सच यह है कि आज तप-भाव तेजी से क्षीण होता दिखाई देता है। आलस्य, आरामतलबी और त्वरित सफलता की इच्छा बढ़ रही है। विद्यार्थी गहन अध्ययन के स्थान पर संक्षिप्त रास्ता खोजते हैं। त्याग, सादगी, मितव्ययिता और तप जैसे मूल्य पहले जितने आदरणीय नहीं रहे। जीवन का आदर्श अधिक से अधिक सुविधा प्राप्त करना बनता जा रहा है। इस सुविधा-प्रधान जीवनशैली को ही प्रतिष्ठा का प्रतीक माना जाने लगा है।
कुछ लोग तकनीकी प्रगति, उपभोक्तावाद और परिवार-संरचना में परिवर्तन को इसका कारण मानते हैं, लेकिन इसका सबसे बड़ा कारण पूंजीवादी अर्थव्यवस्था है। यह व्यवस्था व्यक्ति को इतना धन अर्जित करने के लिए प्रेरित करती है कि भविष्य में बिना श्रम के जीवनयापन संभव हो सके।परिणामस्वरूप सुखवाद और आरामतलबी बढ़ती है और तप का महत्त्व घटता जाता है। बिना परिश्रम अधिक आय प्राप्त करने के प्रलोभन देने वाली अनेक योजनाएं इसी मानसिकता का उदाहरण हैं।
गीता में क्या है राजसी तप?
आज अगर व्यक्ति कठिन परिश्रम भी करता है तो आमतौर पर उसका उद्देश्य धन, पद या सत्ता प्राप्त करना होता है। गीता की भाषा में इसे राजसी तप कहा जा सकता है, पर यह सात्विक तप नहीं है। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में किया गया कठोर श्रम भी अक्सर भविष्य के व्यक्तिगत लाभ का निवेश होता है। उसमें आत्मिक उन्नति, चरित्र-निर्माण या लोक-कल्याण का भाव अनिवार्य रूप से उपस्थित नहीं होता।
तप के अभाव में मनुष्य की गुणवत्ता का भी ह्रास होता है। केवल आर्थिक सफलता के लिए किया गया परिश्रम किसी व्यक्ति को संयमी, इंद्रियनिग्रही और निस्वार्थ नहीं बना सकता। जब समाज में तप का आदर्श कमजोर पड़ता है, तब मनुष्य स्वयं भी अधिक उपयोगी और संवेदनशील नहीं रह जाता। यह भी विचारणीय है कि कहीं हमारी दुनिया इतनी असंवेदनशील तो नहीं होती जा रही कि किसी के त्याग और कष्ट से न प्रेरणा मिलती है, न करुणा।
अगर समाज को दीर्घकालीन नैतिक और मानवीय शक्ति चाहिए, तो तप को फिर से एक आदर्श मूल्य के रूप में प्रतिष्ठित करना होगा।
तप केवल कष्ट सहने का नाम नहीं, बल्कि स्वयं को श्रेष्ठ बनाने और व्यापक हित के लिए समर्पित करने की वह साधना है, जिसके बिना व्यक्ति और समाज दोनों का वास्तविक उत्थान संभव नहीं।
