भारत आज दुनिया के सबसे युवा देशों में गिना जाता है। यह बात अक्सर गर्व के साथ दोहराई जाती है कि देश की बड़ी आबादी कार्यशील आयु वर्ग में है और यही भारत के विकास की सबसे बड़ी ताकत है, लेकिन जब यही युवा, खासकर शिक्षित युवा रोजगार के लिए भटकते नजर आते हैं, तब यह ‘जनसांख्यिकीय लाभ’ एक कठिन सवाल बन कर सामने खड़ा हो जाता है। हाल ही में जारी ‘भारत में कामकाज की स्थिति-2026’ रपट ने इस जटिल वास्तविकता को ठोस तथ्यों के साथ सामने रखा है और देश के युवाओं की शिक्षा, रोजगार और श्रम बाजार से जुड़े कई अहम रुझानों को रेखांकित किया है।

अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय द्वारा जारी रपट केवल तथ्यों का संकलन नहीं, बल्कि उस संकट का दस्तावेजीकरण है, जिसमें आज का शिक्षित युवा जूझ रहा है। उसके पास उपाधियां हैं, आकांक्षाएं हैं और सपने भी हैं, लेकिन अवसर सीमित हैं। पिछले चार दशकों में भारत में उच्च शिक्षा का दायरा तेजी से बढ़ा है। विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों और तकनीकी शिक्षा संस्थानों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। इसके अनुसार, उच्च शिक्षा में नामांकन दर अब 28 फीसद तक पहुंच चुकी है और इसमें लड़कियों की भागीदारी खासतौर पर बढ़ी है। वहीं पुरुषों के नामांकन में गिरावट दर्ज की गई है। यह वर्ष 2017 के 38 फीसद से घट कर वर्ष 2024 के अंत तक 34 फीसद रह गई है। इसके पीछे मुख्य कारण यह है कि युवा अपने परिवार की जरूरतों को पूरा करने के लिए कमाने के अवसर तलाशने लगते हैं।

यह बदलाव सामाजिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है। इससे संकेत मिलता है कि शिक्षा अब समाज के व्यापक वर्गों तक पहुंच रही है, लेकिन इस प्रगति के साथ एक गहरी विडंबना भी जुड़ी है। शिक्षा में प्रगति तो रही है, लेकिन रोजगार के अवसर उसी अनुपात में नहीं बढ़ रहे हैं। रपट बताती है कि 20 से 29 वर्ष के 6.3 करोड़ स्नातकों में से लगभग 1.1 करोड़ युवा बेरोजगार हैं। यह सचमुच बेहद निराशाजनक है कि ये युवा वर्षों की पढ़ाई के बाद भी रोजगार से वंचित हैं। उनको जो नौकरियां मिलती हैं, वह अक्सर अस्थायी, कम वेतन वाली या कौशल के अनुरूप नहीं होती। स्नातक होने के एक वर्ष के भीतर केवल सात फीसद युवाओं को ही स्थायी वेतन वाली नौकरी मिल पाती है। यह धारणा लंबे समय तक बनी रही कि शिक्षा ही बेरोजगारी से मुक्ति का रास्ता है। मगर आज स्थिति उलट दिखती है। तथ्य यही है कि 15 से 25 वर्ष के युवाओं में बेरोजगारी दर लगभग 40 फीसद है, जबकि 25 से 29 वर्ष के युवाओं में यह करीब 20 फीसद है।

यह स्थिति इस बात का संकेत है कि शिक्षा और रोजगार के बीच का संबंध कमजोर हो गया है। डिग्री या उपाधि होने के बावजूद नौकरी नहीं मिलने से युवाओं में निराशा और असंतोष है। आज युवाओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल बेरोजगारी नहीं, बल्कि ‘अधूरा रोजगार’ भी है। बड़ी संख्या में ऐसे युवा काम कर रहे हैं, जो उनकी शिक्षा और कौशल के अनुरूप नहीं हैं। कई इंजीनियर वितरण का काम कर रहे हैं, कई स्नातक अस्थायी अनुबंधों पर निर्भर हैं। यह केवल व्यक्तिगत हानि नहीं, बल्कि राष्ट्रीय संसाधनों की भी बर्बादी है। जिस शिक्षा पर इतना निवेश किया गया, वह अपेक्षित उत्पादकता में नहीं बदल पा रही है।

अब यह भी साफ हो गया है कि केवल शिक्षा का विस्तार पर्याप्त नहीं है, उसकी गुणवत्ता और उपयोगिता भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण है। वर्ष 2010 से 2021 के बीच प्रति लाख युवाओं पर महाविद्यालयों की संख्या 29 से बढ़ कर 45 हो गई है। औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों (आइटीआइ) की संख्या में भी कई गुना वृद्धि हुई है। इसके बावजूद क्षेत्रीय असमानताएं बनी हुई हैं। वहीं शिक्षकों की कमी भी बड़ी चुनौती के रूप में सामने आई है। निर्धारित मानकों के मुकाबले निजी और सरकारी कालेजों में शिक्षक-छात्र अनुपात काफी अधिक है। मगर इन संस्थानों से निकलने वाले युवाओं के पास वह कौशल नहीं है जिसकी मांग उद्योगों में है। यह स्थिति बताती है कि हमारी शिक्षा व्यवस्था अभी भी ‘डिग्री केंद्रित’ है, न कि ‘कौशल केंद्रित’। एक महत्त्वपूर्ण पहलू यह भी है कि उच्च शिक्षा में गरीब परिवारों की भागीदारी बढ़ी है जो वर्ष 2007 के आठ फीसद से बढ़ कर 2017 में पंद्रह फीसद हो गई है।

भारत की अर्थव्यवस्था में बदलाव हो रहा है। मगर दूसरी ओर, युवा कृषि से हट कर सेवा और विनिर्माण क्षेत्रों की ओर बढ़ रहे हैं। सूचना प्रौद्योगिकी (आइटी), मोटर वाहन और व्यावसायिक सेवाओं में महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है, जबकि पेशेवर क्षेत्र में जाति और स्त्री-पुरुष के बीच भेदभाव कम हुआ है। मगर इन क्षेत्रों में भी रोजगार सृजन की गति अपेक्षित नहीं है। एक ओर उच्च कौशल वाली नौकरियां सीमित हैं, दूसरी तरफ कम कौशल वाले कार्यों में अस्थिरता और कम वेतन की समस्या है। यह असंतुलन युवाओं के सामने एक कठिन स्थिति पैदा करता है। वे न तो पूरी तरह रोजगार पा रहे हैं, और न ही अपने कौशल का सही उपयोग कर पा रहे हैं।

देश के पास इस समय सीमित वक्त है, जिसमें वह अपने इस जनसांख्यिकीय लाभ को आर्थिक विकास में बदल सकता है। कहा जा रहा है कि वर्ष 2030 के बाद कामकाजी आयु वर्ग की आबादी का अनुपात घटने लगेगा। इसका मतलब यह है कि आने वाले कुछ वर्षों में रोजगार सृजन को गति देना जरूरी होगा। यदि यह अवसर निकल गया, तो बड़ी संख्या में बेरोजगार और असंतुष्ट युवा सामाजिक और आर्थिक संकट का कारण बन सकते हैं। यह एक बड़ी चुनौती होगी।

इस गंभीर समस्या का समाधान केवल एक क्षेत्र में सुधार से संभव नहीं है। इसके लिए समग्र दृष्टिकोण अपनाना होगा। पहला, शिक्षा और उद्योग के बीच बेहतर तालमेल स्थापित करना होगा। पाठ्यक्रमों को अब वास्तविक जरूरतों के अनुरूप बनाना जरूरी है। दूसरा, कौशल विकास को प्राथमिकता देनी होगी। प्रशिक्षण कार्यक्रमों की गुणवत्ता सुधारनी होगी। तीसरा, रोजगार सृजन को नीति के केंद्र में रखना होगा। केवल विकास दर बढ़ाने से काम नहीं चलेगा, बल्कि रोजगार आधारित विकास की दिशा में कदम उठाने होंगे। चौथा, उद्यमिता विकास को बढ़ावा देना होगा। युवाओं को केवल नौकरी तलाशने के बजाय रोजगार सृजक बनने के लिए प्रोत्साहित करना होगा। पांचवां, क्षेत्रीय और सामाजिक असमानताओं को कम करने के लिए लक्षित नीतियां बनानी होंगी।

भारतीय युवाओं के सामने आज जो स्थिति है, वह केवल आर्थिक समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक और मनोवैज्ञानिक संकट भी है। यह समझना जरूरी है कि शिक्षा केवल डिग्री प्राप्त करने का माध्यम नहीं, बल्कि जीवन और रोजगार के लिए तैयारी का साधन है। यदि यह तैयारी अधूरी रह जाती है, तो उसका परिणाम बेरोजगारी, असंतोष और सामाजिक असंतुलन के रूप में सामने आता है। इसी कारण शिक्षा से जो उम्मीदें पैदा होती हैं, जब वे पूरी नहीं होतीं, तो उसका असर पूरे समाज पर पड़ता है। इस लिहाज से गौर करें, तो यह तय है कि यदि शिक्षा और रोजगार के बीच की खाई को समय रहते नहीं भरा गया, तो देश का सबसे बड़ा संसाधन ही उसकी सबसे बड़ी चुनौती बन सकता है।

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एआई कंपनी एंथ्रोपिक ने अपने नए मॉडल क्लॉड माइथोज (Claude Mythos AI) को सार्वजनिक रूप से जारी करने पर रोक लगा दी है। कंपनी फिलहाल यह मॉडल केवल चुनिंदा कंपनियों और सिक्योरिटी संगठन को देगी। कंपनी ने भले ही इस मॉडल को सार्वजनिक उपयोग से बाहर कर लिया है मगर इसकी संभावित क्षमताओं को देखते हुए सुरक्षा से जुड़े, खासकर बैंकिंग सेक्टर में, सवाल उठने लगे हैं। भारत की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और आईटी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने गुरुवार को दोनों मंत्रालयों के कई वरिष्ठ अधिकारियों के साथ बैठक में बैंकिंग सेक्टर पर एआई मॉडल के परिणाम को लेकर अहम बैठक की। टेक-फिन सेक्टर के विशेषज्ञ मान रहे हैं कि यह बैठक क्लॉड माइथोज से उत्पन्न स्थिति को देखते हुए आहुत थी। वित्त मंत्री सीतारमण ने बैठक में बैंकिंग सुरक्षा को मजबूत करने और आपसी तालमेल बढ़ाने जोर दिया। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक