हम सभी यह सुनते और जानते हुए बड़े हुए हैं कि जल है तो जीवन है। इसके बावजूद जल का अपव्यय करते हैं। जिस गति से संचय करने की बात की जाती है, उससे कई गुना पानी की बर्बादी होती है। कहीं भी सड़कों पर पानी बहते हुए देखा जा सकता है। यही कारण है कि भारत में जल संकट अब भविष्य की चेतावनी नहीं, वर्तमान की कठोर सच्चाई है। देश के अनेक हिस्सों में भूजल स्तर नीचे जा चुका है, नदियां प्रदूषण से बेहाल हैं। शहरों की जल आपूर्ति व्यवस्था दबाव में है। लोग पानी के लिए घंटों इंतजार में खड़े रहते हैं। जलवायु परिवर्तन ने वर्षा को भी इतना अनिश्चित बना दिया है कि कहीं बाढ़ और कहीं सूखा एक साथ दिखाई देता है। समस्या केवल पानी की कमी की नहीं है, असली संकट यह है कि प्रकृति की अपनी सीमाएं हैं। जल संचय के लिए बनी नीतियों की धीमी गति और समाज के असंतुलित जल-व्यवहार के बीच आज भारत बुरी तरह उलझता जा रहा है।
भारत में जल संकट इसलिए भी जटिल है, क्योंकि यहां पानी का सवाल सिर्फ पर्यावरण का नहीं, बल्कि कृषि, स्वास्थ्य, शहरीकरण, सामाजिक न्याय और शासन-व्यवस्था सबसे जुड़ा है। भूजल पर भारत की निर्भरता बहुत गहरी है। केंद्रीय भूजल बोर्ड और सरकार द्वारा जारी नवीनतम आकलन के अनुसार, वर्ष 2025 में देश की कुल वार्षिक भूजल पुनर्भरण क्षमता 448.52 बिलियन क्यूबिक मीटर आंकी गई, जबकि वार्षिक निकासी 247.22 बिलियन क्यूबिक मीटर रही। पहली नजर में यह संतुलित लग सकता है, लेकिन सच यह है कि राष्ट्रीय औसत के भीतर क्षेत्रीय असंतुलन छिपा हुआ है। कई इलाके ऐसे हैं जहां निकासी सुरक्षित सीमा के आसपास या उससे ऊपर है, जबकि दूसरे क्षेत्रों में संसाधन अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में हैं। यही वजह है कि जल संकट पूरे देश में एक समान नहीं, बल्कि कई रूप में सामने आता है।
इसमें दोराय नहीं कि बांध, नहर, पाइपलाइन और बोरवेल आवश्यक हैं, लेकिन वे अकेले समाधान नहीं हैं। अब जरूरत इस बात की है कि जल नीति आपूर्ति बढ़ाने से आगे बढ़ कर मांग-प्रबंधन, जल गुणवत्ता, पुनर्भरण, पुनर्चक्रण और स्थानीय जल शासन पर जोर दे। इसी संदर्भ में राष्ट्रीय जल नीति में संशोधन की चर्चा महत्त्वपूर्ण हो जाती है। लंबे समय से यह महसूस किया जा रहा है कि वर्ष 2012 में अद्यतन हुई नीति अब मौजूदा चुनौतियों के लिए पर्याप्त नहीं है। जल संसाधन मंत्रालय के दस्तावेजों में भी यह स्वीकार किया गया है कि कम जल-उपयोग दक्षता, भूजल पर बढ़ता दबाव, जलवायु परिवर्तन, अपशिष्ट जल के दोबारा उपयोग और फसल-पद्धति जैसे मुद्दों को ध्यान में रखते हुए राष्ट्रीय जल नीति के पुनरीक्षण की जरूरत पड़ी। मिहिर शाह समिति इसी उद्देश्य से गठित की गई थी।
बुनियादी सवाल यह है कि जब संकट इतना स्पष्ट है, तो सुधार की गति इतनी धीमी क्यों है! इसका उत्तर भारत की संघीय संरचना और जल शासन की जटिलता में छिपा है। जल राज्यों का विषय है। केंद्र दिशा दे सकता है, योजनाएं बना सकता है, वित्तीय सहायता दे सकता है, पर वास्तविक क्रियान्वयन राज्यों, स्थानीय निकायों और विभागीय तंत्र के माध्यम से ही होता है। यही कारण है कि राष्ट्रीय स्तर पर अच्छी नीयत से बनाई गई नीतियां भी जमीन तक पहुंचते-पहुंचते धीमी पड़ जाती हैं। ऊपर से पानी का प्रश्न राजनीतिक रूप से संवेदनशील भी है। मुफ्त या सस्ती बिजली, सिंचाई, शहरी जलापूर्ति, उद्योगों की जरूरतें और राज्यों के जल विवाद ये सब मिल कर निर्णय को कठिन बना देते हैं।
कृषि इस बहस के केंद्र में है, क्योंकि भारत में जल उपयोग का सबसे बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र में होता है। मगर कृषि को दोष देकर समस्या हल नहीं होगी। असल बात यह है कि दशकों से नीतिगत ढांचा ही ऐसे फसल को बढ़ावा देता रहा है जो कई क्षेत्रों में जल-उपलब्धता के अनुकूल नहीं हैं। जहां पानी सीमित है, वहां भी धान या गन्ने जैसी फसलों की खेती जारी रहती है, जिसमें पानी की अधिक जरूरत होती है। इस परिस्थिति में यदि जल संरक्षण की बात की जाए, तो किसानों को विकल्प, तकनीक, सिंचाई, बाजार और मूल्य का आश्वासन भी देना होगा।
समस्या का दूसरा बड़ा कारण जल गुणवत्ता है। कई बार पानी उपलब्ध होता है, पर सुरक्षित नहीं होता। केंद्रीय भूजल बोर्ड की 2025 की वार्षिक भू-जल गुणवत्ता रपट और संसद में सरकार द्वारा साझा जानकारी बताती है कि परीक्षण के लिए एकत्रित 28.3 फीसद नमूनों में नाइट्रेट, फ्लोराइड और आर्सेनिक जैसी समस्याएं अभी भी गंभीर हैं। दिसंबर 2025 में साझा आंकड़ों के अनुसार 2024 के नमूनों में 3,415 में से 123 नमूनों में आर्सेनिक और 2,537 में से 24 नमूनों में सीसा अनुमेय सीमा से अधिक पाया गया। इसका मतलब साफ है कि भारत की जल समस्या केवल ‘कितना पानी है’ का प्रश्न नहीं, बल्कि ‘कैसा पानी है’ का भी प्रश्न है।
शहरी भारत में भी स्थिति कम चिंताजनक नहीं है। तेजी से बढ़ते शहरों ने अपने स्थानीय जलस्रोतों जैसे तालाबों, झीलों, नालों और जलग्रहण क्षेत्रों को या तो पाट दिया है या उपेक्षित छोड़ दिया है। नतीजा यह हुआ कि शहर अब दूरदराज के स्रोतों, गहरे बोरवेल और टैंकरों पर निर्भर होते गए। यह व्यवस्था महंगी है और असमान भी। धनाढ्य इलाके में लोग पानी खरीद लेते हैं, लेकिन गरीब बस्तियां अनिश्चित आपूर्ति पर निर्भर रहती हैं। शहरों में सीवर और औद्योगिक अपशिष्ट का पर्याप्त शोधन न होने के कारण सतही जल स्रोत और भूजल दोनों प्रभावित होते हैं। यानी शहर अपने लिए पानी खींचते भी हैं और उसे प्रदूषित भी करते हैं। यह दोहरा दबाव भविष्य की शहरी जल सुरक्षा को और अधिक नाजुक बनाता है।
ग्रामीण भारत में तस्वीर अलग होते हुए भी उतनी ही गंभीर है। पिछले कुछ वर्षों में जल जीवन मिशन ने ग्रामीण पेयजल आपूर्ति के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। जनवरी 2026 के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, मिशन के तहत 81.57 फीसद से अधिक ग्रामीण परिवारों को नल से जल दिया जा चुका है। यह उपलब्धि छोटी नहीं है। वर्ष 2019 में जहां केवल सीमित हिस्से तक नल-जल पहुंचा था, वहीं अब स्थिति काफी बदली है। मगर चुनौती यहीं समाप्त नहीं होती। पाइप के जरिए पानी देना एक बात है, नियमित, पर्याप्त और सुरक्षित जल आपूर्ति सुनिश्चित करना दूसरी बात है। कार्यक्षमता आकलन रपट भी इस बात की ओर संकेत करती है कि ‘कनेक्शन’ और ‘भरोसेमंद सेवा’ में फर्क है।
यही वह बिंदु है जहां समाज की भूमिका बहुत अहम हो जाती है। भारत में पानी को अब भी असीमित संसाधन की तरह बरतने की प्रवृत्ति व्यापक है। घरों में अपव्यय, कालोनियों में वर्षाजल संचयन की उपेक्षा, भूजल के अनियंत्रित दोहन और स्थानीय जलस्रोतों के प्रति उदासीनता ये सब मिल कर संकट को गहरा करते हैं। दूसरी ओर, यही समाज समाधान का आधार भी बन सकता है। जहां पंचायतें, मोहल्ले, किसान समूह, स्वयंसेवी संस्थाएं और स्थानीय प्रशासन मिल कर जलस्रोतों के पुनर्जीवन, तालाबों की मरम्मत और फसलों के विविधीकरण जैसे उपाय करते हैं, वहां परिणाम अधिक टिकाऊ दिखते हैं। नीतियां तभी सफल होती हैं, जब समाज उसे अपना कार्यक्रम समझे, केवल सरकारी योजना नहीं। हाल के वर्षों में जल बजट पर भी जोर बढ़ा है, जो इस दिशा में उपयोगी कदम हो सकते हैं।
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पानी का संकट दुनिया भर में गहराता जा रहा है। भारत भी इससे अछूता नहीं है। आधिकारिक रिपोर्ट के मुताबिक पृथ्वी पर कुल उपलब्ध पानी का 97.5 फीसदी हिस्सा समुद्री है, बाकी 2.5 फीसदी हिस्सा मीठा जल है, लेकिन इसका भी काफी मात्रा प्रदूषित है, जो पीने योग्य नहीं है। एक अनुमान के अनुसार कुल जल का केवल एक फीसदी हिस्सा ही पीने योग्य है, जो दुनिया की आबादी के लिहाज से बहुत कम है। ऐसे में जल संकट भयावह होता जा रहा है। भारत सरकार का जल शक्ति मंत्रालय, जल प्रबंधन और संरक्षण (Water Management and Conservation), खास तौर पर वर्षा जल संरक्षण के लिए कदम उठा रहा है, और इस दिशा में कई तरह के प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन अब भी परिणाम अपेक्षा के अनुरूप नहीं है। जल शक्ति मंत्रालय को लोगों को पेयजल उपलब्ध कराने सहित पानी के दूसरे मुद्दों से निपटने की जिम्मेदारी दी गई है। इसके लिए विभाग ने कई महत्वाकांक्षी योजनाएं बनाई है, इसमें सबसे प्रमुख 2024 तक भारत के हर घर में पाइप से पानी के कनेक्शन (Piped Water Connection in Every House) उपलब्ध कराने की योजना है। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक
