बरसात का मौसम भारत में हर वर्ष एक ऐसा दृश्य रचता है, जो पहली नजर में सुहाना लगता है, लेकिन वास्तव में यह हमारी विकास-नीति की सबसे बड़ी विडंबना को भी उजागर करता है। देश का एक हिस्सा बाढ़ में डूबा होता है, नदियां तटबंध तोड़ रही होती हैं, खेत जलमग्न हो जाते हैं और हजारों परिवार अपने घर छोड़ने को विवश हो जाते हैं। उसी समय दूसरे हिस्से में लोग पीने के पानी के लिए संघर्ष कर रहे होते हैं।

कहीं पानी विनाश का कारण बनता है, तो कहीं उसका अभाव जीवन को संकट में डाल देता है। प्रश्न यह नहीं कि भारत में पानी कम है या अधिक, बल्कि यह है कि क्या हमने पानी को संसाधन भर माना या उसे जीवन, समानता और न्याय के अधिकार के रूप में समझने का प्रयास किया?

देश में जल संकट को प्राय: पर्यावरण, कृषि या विकास से जुड़ी समस्या के रूप में देखा जाता है, जबकि यह मूलत: शासन और संवैधानिक उत्तरदायित्व का प्रश्न है। यदि किसी गांव की महिलाओं को प्रतिदिन कई किलोमीटर चलकर पानी लाना पड़ता है, किसी सरकारी विद्यालय में बच्चे दूषित पानी पीने को विवश हैं, किसी सरकारी कार्यालय में कर्मचारियों के लिए सुरक्षित पेयजल की व्यवस्था नहीं है, बाढ़ के बाद राहत शिविरों में स्वच्छ पानी उपलब्ध नहीं हो पाता है, तो इसे केवल प्रशासनिक लापरवाही कहना संविधान में निहित समानता, गरिमा और जीवन के अधिकार की अधूरी व्याख्या है।

भारतीय संविधान में भले ही जल के अधिकार को अलग से मौलिक अधिकार के रूप में उल्लिखित नहीं किया गया हो, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन के अधिकार की जो व्यापक व्याख्या की है, उसमें स्वच्छ पेयजल को गरिमामय जीवन की अनिवार्य शर्त माना गया है।

अनुच्छेद 47 राज्य को जनस्वास्थ्य सुधारने का दायित्व देता है। अनुच्छेद 48(क) पर्यावरण और जल स्रोतों के संरक्षण की बात करता है, जबकि अनुच्छेद 51(क) एवं (ग) प्रत्येक नागरिक को नदियों, झीलों और प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा का नैतिक दायित्व सौंपता है। गंगा, यमुना, घाघरा, राप्ती और शारदा जैसी विशाल नदियों वाला उत्तर प्रदेश हर वर्ष बाढ़ से प्रभावित होता है। पूर्वांचल के अनेक जिले महीनों तक जलभराव झेलते हैं, जबकि बुंदेलखंड का बड़ा हिस्सा गर्मियों में पेयजल संकट से गुजरता है। एक ही राज्य में पानी की अधिकता और कमी का साथ-साथ मौजूद होना बताता है कि समस्या प्राकृतिक नहीं, बल्कि प्रबंधन की है।

बिहार की स्थिति इससे भी अधिक जटिल है। कोसी को लंबे समय से ‘बिहार का शोक’ कहा जाता है, लेकिन केवल नदी को दोष देकर समस्या का समाधान नहीं निकलेगा। नेपाल से आने वाला जल प्रवाह, नदी तल में गाद का लगातार जमाव, तटबंधों की सीमाएं और अनियोजित बसावट, ये सभी मिलकर हर वर्ष बाढ़ को त्रासदी में बदल देते हैं।

बाढ़ केवल मकानों को नहीं डुबोती, वह बच्चों की पढ़ाई, किसानों की आजीविका, लोगों के स्वास्थ्य और पीने के पानी की उपलब्धता को भी प्रभावित करती है। सामाजिक न्याय का अर्थ केवल पुनर्वास नहीं, बल्कि सम्मानजनक पुनर्स्थापन भी है।

मध्य प्रदेश में चुनौती कुछ अलग है। नर्मदा, चंबल, बेतवा, केन और ताप्ती जैसी नदियों से समृद्ध यह राज्य जल संपन्न दिखाई देता है, मगर अनेक जिलों में भूजल का स्तर लगातार नीचे जा रहा है। शहरों का विस्तार, उद्योगों की बढ़ती मांग और पारंपरिक जल स्रोतों की उपेक्षा ने संकट को गहरा किया है। मालवा और बुंदेलखंड क्षेत्र में गर्मियों के दौरान जल संकट लगातार गंभीर होता जा रहा है। यह वही प्रदेश है, जहां कभी तालाबों और बावड़ियों की समृद्ध परंपरा थी।

राजस्थान का अनुभव देश के लिए एक महत्त्वपूर्ण सीख है। कम वर्षा वाले इस राज्य ने सदियों पहले ही समझ लिया था कि पानी की एक-एक बूंद भविष्य की पूंजी है। जोहड़, बावड़ी, कुंड, टांका और अन्य पारंपरिक जल संरचनाएं केवल स्थापत्य कला का उदाहरण नहीं थीं, बल्कि जल प्रबंधन की उत्कृष्ट वैज्ञानिक प्रणालियां थीं। आधुनिक विकास ने इन्हें पिछड़ेपन का प्रतीक मान लिया, लेकिन आज वही दुनिया वर्षा जल संचयन और सामुदायिक जल प्रबंधन को टिकाऊ विकास का आधार मान रही है।

महाराष्ट्र भी विरोधाभासों का राज्य है। मराठवाड़ा और विदर्भ बार-बार सूखे की मार झेलते हैं, जबकि मुंबई और कोंकण क्षेत्र कुछ दिनों की वर्षा में ही जलमग्न हो जाते हैं। यदि एक ही राज्य में सूखा और बाढ़ दोनों लगातार बने रहें, तो यह संकेत है कि जल नीति को क्षेत्रीय भूगोल के अनुसार पुनर्गठित करने की जरूरत है।

पर्वतीय राज्यों जैसे उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, सिक्किम और पूर्वोत्तर के कई हिस्सों की चुनौतियां मैदानी राज्यों से भिन्न हैं। यहां बादल फटना, अचानक आने वाली बाढ़, भूस्खलन और हिमनद झीलों के फटने जैसी घटनाएं बढ़ रही हैं। इन आपदाओं का संबंध केवल प्राकृतिक परिस्थितियों से नहीं, बल्कि अनियोजित निर्माण, अंधाधुंध सड़क विस्तार, वनों की कटाई और जलवायु परिवर्तन से भी है। पहाड़ हमें सिखाते हैं कि प्रकृति के साथ संघर्ष करके विकास नहीं किया जा सकता। वहां विकास का अर्थ प्रकृति के साथ संतुलन स्थापित करना है। यदि नदियों को केवल ऊर्जा उत्पादन या पर्यटन के साधन के रूप में देखा जाएगा, तो भविष्य में आपदाओं का रूप और डरावना हो सकता है।

यदि जल संकट और बाढ़ की इन विविध चुनौतियों को एक साथ रखकर देखा जाए, तो स्पष्ट होता है कि भारत को केवल अधिक बांधों, ज्यादा पाइपलाइनों या अधिक टैंकरों की आवश्यकता नहीं है। जरूरत उस दृष्टिकोण की है, जो पानी को विकास की वस्तु नहीं, बल्कि सार्वजनिक अधिकार और साझा संसाधन के रूप में देख सके।

यही कारण है कि पिछले कुछ वर्षों में केंद्र और राज्य सरकारों ने जल संरक्षण एवं सुरक्षित पेयजल की दिशा में अनेक योजनाएं शुरू की हैं। जल जीवन मिशन के माध्यम से प्रत्येक ग्रामीण परिवार तक नल से जल पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया, अटल भूजल योजना ने भूजल संरक्षण में स्थानीय समुदायों की भागीदारी पर बल दिया, जल शक्ति अभियान और ‘कैच द रेन’ जैसे अभियानों ने वर्षा जल संचयन को जनआंदोलन बनाने का प्रयास किया, जबकि अमृत 2.0 ने शहरी जलापूर्ति और अपशिष्ट जल प्रबंधन को नई दिशा देने की कोशिश की। मगर स्वच्छ पानी का प्रश्न आज केवल उपलब्धता का नहीं, बल्कि गुणवत्ता का है। देश के अनेक हिस्सों में पानी में फ्लोराइड, आर्सेनिक, आयरन, नाइट्रेट तथा जीवाणुओं की मात्रा निर्धारित सीमा से अधिक पाई जाती है।

जल संरक्षण की चर्चा तब तक अधूरी रहेगी, जब तक उसमें नागरिक भागीदारी को केंद्र में नहीं रखा जाएगा। वहीं, जलवायु परिवर्तन ने इस पूरे विमर्श को और जटिल बना दिया है। वर्षा का स्वरूप बदल रहा है। कहीं अल्प अवधि में अत्यधिक वर्षा हो रही है, तो कहीं लंबे समय तक सूखा बना रहता है। इसका अर्थ है कि भविष्य की जल नीति अतीत के अनुभवों पर आधारित नहीं हो सकती।

बाढ़ और सूखे का सबसे अधिक प्रभाव हमेशा गरीब तथा हाशिये पर खड़े समुदायों को ही झेलना पड़े, तो यह सामाजिक असमानता का स्पष्ट संकेत है। जिस समाज में आर्थिक स्थिति के आधार पर पानी की गुणवत्ता तय होने लगे, जहां संपन्न वर्ग बोतलबंद पानी खरीद ले और गरीब दूषित जल पीने को विवश हो, वहां समानता का संवैधानिक आदर्श भी अधूरा रह जाता है।