मानसून की पहली बारिश जैसे ही धरती को भिगोती है, सरकारी तंत्र सुपरिचित रस्म-अदायगी में जुट जाता है। वन विभाग, नगर निगम, जिला प्रशासन और स्वयंसेवी संस्थाएं लाखों पौधे लगाने के लक्ष्य तय करती हैं, प्रेस विज्ञप्तियां जारी करती हैं और अगले मानसून तक इस पूरे उपक्रम को विस्मृत कर देती हैं।

हर वर्ष करोड़ों पौधे लगाए जाते हैं, हर साल आंकड़े दिखाए जाते हैं। मगर हर बार जमीन पर हरियाली उतनी ही कम होती चली जाती है। यह उस तंत्र की स्वाभाविक परिणति है, जहां जवाबदेही की जड़ें उतनी ही कमजोर हैं, जितनी सड़क किनारे गड्ढे में ठूंस दिए गए उस पौधे की, जिसे न पानी मिलेगा, न देखभाल होगी और न जीवित रहने का कोई वास्तविक अवसर मिलेगा।

दिल्ली का उदाहरण इस स्थिति का सबसे सटीक आईना है। पिछले चार वर्षों में राजधानी में दो करोड़ पांच लाख पौधे लगाए गए, लेकिन उनमें से केवल 60 फीसदी ही जीवित रह सके। यह उस शहर का हाल है, जहां सरकारी निगाह सबसे अधिक रहती है। दूरदराज के जिलों और गांवों में तो यह दर और भी दयनीय है।

जब वन आवरण बढ़ने की घोषणाएं की जाती हैं, तो उनके दावों की पड़ताल जरूरी हो जाती है। दिसंबर 2024 में जारी भारत वन स्थिति रिपोर्ट-2023 में कहा गया कि 2021 से देश का कुल वन और वृक्ष क्षेत्र 1,445 वर्ग किलोमीटर बढ़ा है और यह 2023 में कुल भौगोलिक क्षेत्र का 25.17 फीसदी हो गया है।

इसी रिपोर्ट पर पर्यावरणविदों ने तीखी आपत्ति जताई। कई विशेषज्ञों ने दावा किया कि सरकार ने बांस के बागान, नारियल के पेड़ों और बागों को वन आवरण के हिस्से के रूप में गिना और बढ़ा-चढ़ाकर पेश किए गए आंकड़ों के साथ एक दोषपूर्ण रिपोर्ट तैयार की। रबर, यूकेलिप्टस और बबूल के बागान जैव विविधता के लिहाज से उन सघन प्राकृतिक वनों की बराबरी बिल्कुल नहीं कर सकते, जो सदियों में विकसित हुए थे और जिनका एक-एक पेड़ सैकड़ों जीव-जंतुओं का आश्रय था।

वनों की निगरानी रखने वाले मंच ‘ग्लोबल फॉरेस्ट वॉच’ के आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2001 से 2024 के बीच भारत ने 23.1 लाख हेक्टेयर हरित आवरण खो दिया, जो वर्ष 2000 की तुलना में 7.1 फीसदी की गिरावट है। इससे 1.29 गीगाटन कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन हुआ और वैश्विक स्तर पर वनों की कटाई के मामले में भारत वर्ष 2015 से 2020 के बीच दूसरे स्थान पर रहा, जहां प्रतिवर्ष 6.68 लाख हेक्टेयर वन क्षेत्र नष्ट हुआ।

यह तथ्य अकेले ही पूरी बहस की दिशा तय कर देता है। विकास की हर परियोजना, हर राजमार्ग, हर बांध, हर खदान पहले पेड़ों का बलिदान मांगती है। पूर्वोत्तर राज्यों में स्थानांतरित कृषि, मध्य भारत में खनन और पश्चिमी घाटों पर सड़क निर्माण व पर्यटन का दबाव मिलकर उस वन संपदा को नष्ट कर रहे हैं, जिसे बनाने में प्रकृति को हजारों वर्ष लगे। दुनिया में प्रति व्यक्ति औसतन 400 पेड़ हैं, जबकि भारत में यह संख्या इससे कहीं कम है। जिस देश में चिपको आंदोलन चला, वहीं बिना सोचे-समझे पेड़ काट दिए जाते हैं।

ऐसे में जब कनाडा के क्यूबेक प्रांत के एक छोटे कस्बे से खबर आती है कि उसने आधिकारिक रूप से पेड़ों को अपने अधिकारों वाले जीवित प्राणी के रूप में मान्यता दी है, तो उस पर ध्यान जाता है। ओंटारियो में म्युनिसिपल एक्ट-2001 के तहत नगरपालिकाओं को पेड़ों की सुरक्षा के लिए विस्तृत उपनियम बनाने का अधिकार मिला हुआ है और इसे जमीन पर लागू भी किया जाता है।

टोरंटो में पेड़ काटने पर जुर्माना 500 से एक लाख डॉलर प्रति पेड़ तक हो सकता है और अतिरिक्त एक लाख डॉलर गंभीर उल्लंघन के लिए निर्धारित है। इसी का परिणाम है कि टोरंटो प्रतिवर्ष लगभग एक लाख 20 हजार पेड़ लगाता है और शहर में अनुमानित एक करोड़ 15 लाख पेड़ों का प्रबंधन करता है, जिनसे प्रतिवर्ष पांच करोड़ 50 लाख डॉलर से अधिक का पर्यावरणीय लाभ मिलता है। यह पर्यावरण की नहीं, अर्थशास्त्र की भी भाषा है। भारत में यह सोच अभी तक न नीतियों में उतरी है, न प्रशासनिक ढांचे में।

इथियोपिया का उदाहरण प्रेरक और उससे भी ज्यादा शिक्षाप्रद है। बीसवीं सदी के आरंभ में इथियोपिया की 35 फीसदी भूमि वन से आच्छादित थी, जो वर्ष 2000 तक घटकर केवल चार फीसदी रह गई थी। इस गिरावट को रोकने के लिए इथियोपिया ने जो रास्ता अपनाया, वह दुनिया के लिए एक मिसाल बन गया।

जुलाई 2019 में उसने देशभर में एक हजार निर्धारित स्थलों पर महज 12 घंटों में साढ़े तीन करोड़ से भी अधिक पौधे लगाए और एक दिन में सर्वाधिक पौधे लगाने का विश्व कीर्तिमान तोड़ दिया। इथियोपिया के ‘ग्रीन लेगेसी’ कार्यक्रम में लगाए गए 70 फीसदी से अधिक पेड़ देशज प्रजातियों के थे, जो स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र को सहारा देते हैं। इस कार्यक्रम ने ग्रामीण क्षेत्रों में तीन लाख से अधिक रोजगार सृजित किए, जिनमें 60 फीसदी महिलाएं और युवा थे। वर्ष 2019 से 2023 तक इथियोपिया का वन आवरण 17.2 फीसदी से बढ़कर 23.6 फीसदी हो गया। यह वृद्धि आंकड़ों की बाजीगरी नहीं, धरती की वास्तविक हरियाली थी।

इथियोपिया की सबसे बड़ी उपलब्धि यह नहीं कि उसने रिकॉर्ड तोड़ा, बल्कि यह है कि उसने पौधारोपण को एक राष्ट्रीय संकल्प में बदला, जहां नेता, किसान, विद्यार्थी और महिलाएं सब एक साथ खड़े हुए।

कोस्टा रीका का अनुभव भी उतना ही सीखने लायक है। इसने 1970 के दशक में, जब उसका वन आवरण केवल 17 फीसदी रह गया था, तब से लेकर 2024 तक उसे 54 फीसदी तक पहुंचाया। इसके पीछे कोई बड़ा धन नहीं था, बल्कि एक सरल और दूरदर्शी नीति थी, जिसमें वन भूमि को बनाए रखने वाले किसानों और जमींदारों को सरकार की ओर से वित्तीय प्रोत्साहन दिया गया।

रवांडा ने भी अपनी अनूठी सामुदायिक भागीदारी के बल पर वन आवरण को वर्ष 2000 में 10 फीसदी से बढ़ाकर 2024 तक 30 फीसदी से अधिक कर लिया। वहां एक अनूठी व्यवस्था है, जिसके तहत नागरिक हर महीने एक शनिवार की सुबह पर्यावरण कार्यों (जिनमें पेड़ लगाना भी शामिल है) के लिए समर्पित करते हैं। कानून और सामुदायिक जिम्मेदारी के इस संयोजन ने रवांडा को अफ्रीका में वन संरक्षण का अग्रदूत बना दिया।

भारत के पास इन सभी देशों से सीखने का अवसर है। यहां न साधनों की कमी है, न भूमि की और न मानव संसाधनों की। कमी है तो केवल राजनीतिक इच्छाशक्ति, सख्त कानूनी ढांचे और दीर्घकालिक सोच की।

आज जब अल-नीनो की मार, रिकॉर्ड तोड़ती गर्मी और गहराता सूखा हर वर्ष के साथ विकराल होता जा रहा है, तब पौधारोपण को एक औपचारिकता की तरह नहीं, बल्कि एक कानूनी दायित्व की तरह देखने की जरूरत है। जिस देश में पीपल को पवित्र माना जाता है और बरगद को अमर, उस देश में पेड़ को जीवित प्राणी का दर्जा देने के लिए कानून की नहीं, केवल संकल्प की जरूरत है। इरादा तब बनता है, जब यह समझ आए कि जो पेड़ काटा गया, उसके साथ भविष्य की एक सांस भी काटी गई।