भारत के विदेश व्यापार पर हाल ही में जारी आंकड़ों के अनुसार अप्रैल 2025 से जनवरी 2026 के दौरान भारत का वस्तु व्यापार घाटा 283.23 अरब डालर रहा, जो पिछले वर्ष की इसी अवधि के 247.38 अरब डालर से अधिक है। इस अवधि में जहां वस्तु निर्यात 2.48 फीसद बढ़ कर 366.63 अरब डालर रहा, वहीं आयात 7.21 फीसद बढ़ कर 649.86 अरब डालर रहा। सबसे अधिक व्यापार घाटा चीन के साथ रहा, जिसका आकार 92.30 अरब डालर था। चालू वित्त वर्ष में भारत का व्यापार घाटा बढ़ने के पीछे सोने-चांदी के आयात में भारी उछाल और उनके वैश्विक मूल्य में वृद्धि और कमजोर निर्यात जैसे प्रमुख कारण उभर कर दिखाई दे रहे हैं।

बढ़ते व्यापार घाटे को कम करने के लिए चार महत्त्वपूर्ण बातों पर ध्यान देने की जरूरत है। एक, अन्य देशों के साथ किए गए द्विपक्षीय और मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) के तहत तेजी से कारोबार और निर्यात बढ़ाने के लिए रणनीतिक कदम आगे बढ़ाना। दो, व्यापार समझौतों का पूरा लाभ उठाने के लिए गुणवत्तापूर्ण उत्पादन और नए सुधारों पर ध्यान केंद्रित करना। तीन, निर्यात के नए बाजारों में प्रवेश करना। चार, वर्ष 2026-27 के लिए पेश केंद्रीय बजट में घोषित नए निर्यात प्रोत्साहनों के क्रियान्वयन पर नए वित्तीय वर्ष की शुरुआत से ही ध्यान दिया जाना।

गौरतलब है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट द्वारा वैश्विक शुल्क को अवैध ठहराए जाने के बाद 24 फरवरी से 150 दिनों के लिए भारत सहित सभी देशों के लिए 15 फीसद अस्थायी शुल्क लगाने का आदेश जारी किया। इस समयावधि के बाद अमेरिकी संसद में इस पर प्रस्ताव लाया जाएगा और फिर संसद तय करेगी कि इसे आगे बनाए रखना है या नहीं। ट्रंप का कहना है कि संसद से शुल्क पर प्रस्ताव मंजूर होने के बाद भारत के साथ किया गया व्यापार समझौता पूर्व निर्धारित रूप में ही लागू होगा। अब देखना यह है कि अदालत का निर्णय और ट्रंप प्रशासन की कवायद व्यापार समझौते के अंतिम क्रियान्वयन को कैसे प्रभावित करती है।

यह महत्त्वपूर्ण है कि अब अमेरिका के साथ अंतरिम व्यापारिक समझौते की बातचीत में भारत अधिक लाभ की स्थिति में होगा। उल्लेखनीय है कि 18 फरवरी को नई दिल्ली में यूरोपीय संघ (ईयू) के कई राष्ट्राध्यक्षों ने शिखर सम्मेलन के दौरान एलान किए गए भारत-ईयू के बीच मुक्त व्यापार समझौते को जल्दी लागू किए जाने का समर्थन दिया है। यह समझौता दुनिया की दो बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच तालमेल का उदाहरण है और भारत के लिए बेहद लाभप्रद भी। गौरतलब है कि इस समझौते को ‘सभी व्यापार समझौतों की जननी’ कहते हुए रेखांकित किया गया है कि भारत के साथ यह समझौता यूरोप को आर्थिक क्षेत्रों में बढ़त दिलाएगा। इससे दो अरब लोगों का एक साझा बाजार तैयार होगा। वहीं यह संयुक्त बाजार, वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के लगभग एक चौथाई हिस्से का प्रतिनिधित्व करेगा।

ब्रिटेन, ओमान और न्यूजीलैंड के साथ किए गए मुक्त व्यापार समझौते का इस वर्ष कार्यान्वयन अहम होगा। इन सबके साथ-साथ मारीशस, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), आस्ट्रेलिया और चार यूरोपीय देशों- आइसलैंड, स्विट्जरलैंड, नार्वे और लिकटेंस्टाइन के साथ लागू हो रहे समझौते के और अधिक लाभ मिलते हुए दिखाई देंगे। साथ ही इस वर्ष पेरू, चिली, मैक्सिको, कनाडा, दक्षिण अफ्रीका और इजराइल सहित अन्य प्रमुख देशों के साथ भी नए एफटीए आकार लेते हुए दिखाई देंगे। इसमें दो मत नहीं हैं कि इस समय एक के बाद एक विभिन्न देशों के साथ भारत के व्यापार समझौते तेजी से आकार ले रहे हैं। यह कोई छोटी बात नहीं है कि पहले अधिकांश अंतरराष्ट्रीय आर्थिक-व्यापारिक टिप्पणियों में कहा जाता था कि भारत ने मौका गंवा दिया, लेकिन अब अनेक देशों का मानना है कि अगर आर्थिक रूप से तेजी से बढ़ते हुए भारत के साथ नहीं जुड़ पाए, तो वे महत्त्वपूर्ण मौका गंवा देंगे।

वैश्विक व्यापार की चुनौतियों के बीच निर्यात बढ़ाना कोई सरल काम नहीं है। ऐसे में चिह्नित किए गए करीब दो सौ देशों में निर्यात की नई रणनीति के साथ आगे बढ़ना होगा। अच्छी बात है कि केंद्रीय बजट 2026-27 में विनिर्माण, वस्त्र, चमड़ा और समुद्री उत्पाद जैसे क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करते हुए निर्यात बढ़ाने के लिए जो रणनीतिक उपाय किए गए हैं, उन पर नए वित्तीय वर्ष की शुरुआत से ध्यान देने की जरूरत होगी। खासतौर से सीमा शुल्क में छूट, निर्यात दायित्व अवधि को छह महीने से बढ़ा कर 12 महीने करना तथा सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों के लिए दस हजार करोड़ रुपए का विकास कोष शामिल है, जो वैश्विक प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देगा। डेटा केंद्रों और इलेक्ट्रानिक विनिर्माण के लिए कर रियायतों से विदेशी निवेश और निर्यात बढ़ेगा। निस्संदेह देश के व्यापार घाटे को काबू में करने के लिए हमें इस बात पर भी ध्यान देना होगा कि निर्यातकों की दिक्कतें केवल शुल्क वृद्धि तक सीमित नहीं, बल्कि यह उन पर लगे ‘एंटी-डंपिंग’ शुल्क से भी संबंधित है।

निर्यात बढ़ाने के लिए बाजार तक पहुंच में सहयोग के साथ-साथ लाजिस्टिक लागत में कमी, गुणवत्तापूर्ण उत्पादन, विश्वसनीय कच्चा माल, कम ऊर्जा लागत और गंतव्य बाजारों के साथ नियामकीय समन्वय भी जरूरी है। नियामक संस्थाओं के कामकाज में मूलभूत बदलाव की भी जरूरत है। कर सुधारों को और गहराई देने के साथ जीएसटी प्रणाली को प्रभावी बनाना होगा। इन व्यापार समझौतों का पूरा लाभ तभी मिलेगा, जब भारत गहरे सुधारों और गुणवत्तापूर्ण उत्पादन को आगे बढ़ाए। भारत व्यापार एकीकरण को विस्तार दे और अपनी विनिर्माण रणनीति को वैश्विक मानकों के अनुरूप सुसज्जित करे। एक रपट में कहा गया है कि व्यापार समझौतों का अधिकतम लाभ लेने के लिए सबसे पहले किफायती लागत पर गुणवत्तापूर्ण उत्पादन और सीमा शुल्क प्रक्रियाओं को सरल बनाने जैसे सुधारों पर तेजी से आगे बढ़ना होगा। वहीं घरेलू कंपनियों को गुणवता, तकनीक और कुशल कर्मियों के साथ काम करने की जरूरत होगी। व्यापार समझौतों से देश को आर्थिक शक्ति बनाने के लिए युवा अधिकारियों को नए दौर की जरूरतों के मुताबिक और ज्यादा प्रशिक्षित करने की जरूरत है।

इसमें दोराय नहीं कि नए व्यापार समझौतों से भारत दुनिया की बड़े बाजारों में प्रवेश पाने में सफल होगा, लेकिन इसके साथ ही देश को व्यापारिक महाशक्ति बनाने के लिए आकर्षक दरों पर अच्छी गुणवत्ता वाला माल तैयार करने की जरूरत है। सरकारी और निजी क्षेत्रों में शोध, विकास और नवाचार बढ़ाने का समय आ गया है। इस समय जहां विकसित देशों द्वारा शोध और विकास पर अच्छा-खासा खर्च किया जा रहा है, वहीं चीन और वियतनाम जैसे देश शोध एवं विकास पर अपने वार्षिक बजट का 2.5 फीसद से भी अधिक खर्च करते हैं, जबकि भारत का शोध और विकास पर खर्च 0.70 फीसद से भी कम है। हमें कृत्रिम मेधा और क्वांटम कंप्यूटिंग जैसी उभरती तकनीकों तथा इनके लिए आवश्यक ऊर्जा की तकनीक में भी अधिक आगे बढ़ना होगा। उम्मीद करना चाहिए कि सरकार व्यापार घाटे पर नियंत्रण के लिए विभिन्न देशों के साथ व्यापार समझौतों के अधिकतम लाभ के लिए गुणवत्तापूर्ण उत्पादन और सुधारों की राह पर आगे बढ़ेगी।