देश की संसद जनता की आकांक्षाओं की वह अभिव्यक्ति है, जो चयनित प्रतिनिधियों में पूर्ण विश्वास प्रकट कर निर्मित की गई है। इसके उत्तरदायित्व में मुख्य रूप से देश के विकास, सुरक्षा और आमजन के कल्याण के लिए नीति निर्माण एवं योजनाएं बनाना है। तकनीकी तरक्की के साथ अब संसद की सारी कार्यवाही सीधे हर घर तक पहुंचती है। अपेक्षा यही की जाती है कि संसद की बैठकों में संवाद और गरिमा के अनुकरणीय स्तर देखने को मिलेंगे। साथ ही इसमें संवेदनशील पारस्परिकता, समय के महत्त्व, जिम्मेदारी का बोध और अध्ययनशीलता जैसे प्रेरक तथा विश्वास उत्पन्न करने वाले तत्त्वों के समावेश की उम्मीद भी की जाती है। संसद के दोनों सदनों में जन प्रतिनिधियों को यह ध्यान रखना होता है कि देश की नई पीढ़ी उनके हर कार्यकलाप, आचार-विचार-व्यवहार को न केवल देखने और महसूस करने में रुचि रखती है, बल्कि उसका अनुसरण भी करना चाहेगी।

स्वतंत्रता के बाद कई वर्षों तक संसद की कार्यवाही सामान्य जन आज की तरह देख तो नहीं सकते थे, लेकिन तब समाचार पत्रों में उससे संबंधित खबरों को तन्मयता से पढ़ा जाता था और उस पर लोग आपस में चर्चा भी करते थे कि संसद देश के भविष्य का निर्माण कर रही है। उस समय काफी हद तक वह सब मिलता था, जो जनता द्वारा चयनित कुशल, सभ्य, संयमित और जवाबदेह प्रतिनिधियों की शिखर संस्था से अपेक्षित होता था। तब देश के हर गांव, कस्बे और शहर में स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ी घटनाओं की चर्चा होती थी, आजादी पाने के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने वालों को सम्मान पूर्वक एवं गर्व से याद किया जाता था।

मगर देश के वे वरिष्ठजन, जो आज भी संसद की कार्यवाही में रुचि लेते हैं, उसका प्रसारण देखते हैं, उन्हें अब निराशा ही होती होगी। महात्मा गांधी की चर्चा अब कम ही होती है। उन्होंने तत्कालीन संदर्भ में कहा था कि कार्य करने के बाद प्राप्त किए गए अनुभव के बिना दिया गया वक्तव्य परिष्कार और शालीनता से रहित होगा! इसका अनुभव अब सामान्यजन को लगातार हो रहा है। उनकी अपेक्षाएं अब निराशा में तब्दील होती जा रही हैं। विकास के जो प्रयास हो रहे हैं, उनमें सर्वजन कल्याण की भावना के बजाय चयनात्मक सोच की झलक देखने को मिलती है।

भारत में भी इसकी अपेक्षा थी कि विपक्ष और विशेषकर सत्ता से जनता द्वारा हटाए गए राजनीतिक दल भी लोकतंत्र की मूल भावना के अनुसार जनसेवा तथा जनसंपर्क पर अधिक ध्यान देंगे: सत्ता पक्ष से प्रश्न पूछेंगे, उनकी कमियां निकालेंगे और लोकतंत्र को मजबूत करने की दिशा में काम करेंगे। मगर इस मूल भावना की कमी साफ देखने को मिल रही है। यह सही है कि विपक्ष के अधिकांश राजनीतिक दलों के पास जनता का विश्वास पुन: प्राप्त करने की कोई ठोस रूपरेखा उपलब्ध नहीं है, उनमें शामिल युवा और वरिष्ठ राजनेता भी अपने लिए कोई संभावनाएं नहीं देख पा रहे हैं।

हताशा के इस माहौल में राष्ट्र और नई पीढ़ी के प्रति उत्तरदायित्व का बोध भी कम हो रहा है। संभवत: वे इस सिद्धांत को भी भूल गए हैं कि सत्ता में वापस आने का रास्ता जनता के दिलों में स्वीकार्यता से होकर गुजरता है और उसे आरोप-प्रत्यारोप के जरिए तलाशने का प्रयास निरर्थक है।

देखा जाए तो जन सामान्य की चर्चाओं में केवल विपक्ष की ही आलोचना होती हो, ऐसा भी नहीं है। आज देश का आम नागरिक जागरूक है, वह स्थिति का विश्लेषण अत्यंत समझदारी और तुलनात्मक रूप से करता है तथा जो इसको समझ सकता है, वही अपने कार्यकलापों में अपेक्षित एवं आवश्यक बदलाव ला सकता है। लोकतंत्र, जनतंत्र या गणतंत्र, मूलभाव को समझने के लिए इनमें से कोई भी विकल्प चुना जाए, उसका आधार जिस शाब्दिक संकल्पना में निहित मिलेगा वह है- संवाद। हर समस्या और वाद-विवाद का समाधान संवाद से ही निकलता है।

जनहित के संकल्प संवाद की सार्थकता में ही निहित हैं। इस समय देश का राजनीतिक वातावरण इस तरह का हो गया है कि लगता है सियासी दल और राजनेता इस पक्ष को भूलते जा रहे हैं। देश के राजनीतिक क्षितिज पर यह शब्द लगभग खो गया है, या यों कहें कि कुछ ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न की जा रही हैं कि सभ्य समाज की आधारभूत संकल्पना ‘चर्चा-परिचर्चा’ की कोई संभावना ही ना बचे!

अब यह बात भी छिपी नहीं है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारत की प्रगति और साख में जो बढ़ोतरी हुई है, वह कई बड़े देशों की आंख की किरकिरी बन गई है। उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान जैसे प्रदेशों में किसी भी गांव और कस्बे में जाकर देखा जा सकता है कि वहां सरकारी तंत्र से जुड़ा रहा सम्मानित लोगों का वर्ग एक ही है। पक्ष या विपक्ष में होना एक-दूसरे के प्रति व्यक्तिगत सम्मान तथा सौहार्द में कोई कमी लाए, यह तो सामान्य अपेक्षा हो ही नहीं सकती है।

वरिष्ठ राजनीतिक नेतृत्व को पक्ष-विपक्ष के भेदभाव को भूलकर विद्वत वर्ग और विशेषज्ञों की राय लेकर जनहित में संवादहीनता की इस घुटन से देश को मुक्त करने का हर संभव प्रयास करना होगा।

द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद स्वतंत्र हुए देशों में शामिल भारत में लोकतंत्र के स्थापित होने और उसके आगे बढ़ने को वैश्विक स्तर पर सम्मान से देखा जाता रहा है। आपातकाल को छोड़कर भारत में व्यक्तिगत हित साधने के लिए संविधान के प्रावधानों का दुरुपयोग करने जैसे अवसर पुन: नहीं आए। जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में देश ने एकजुट होकर लोकतंत्र को पुन: स्थापित कर दिया।

यह भी याद रखना होगा कि देश के सुरक्षा बलों ने संविधान की उस आत्मा का अक्षरश: सम्मान किया है कि सर्वोच्च संस्था तो ‘हम, भारत के लोग’ में ही निहित है। देश को सुरक्षित रखने के दायित्व का अत्यंत गरिमामय ढंग से पालन हुआ है। देश के सुरक्षा बल किसी भी प्रकार की राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा से हमेशा दूर रहे हैं। सकारात्मकता की इस स्थिति के निर्मित होने में देश की ज्ञानार्जन परंपरा, दर्शन, वैचारिकता और वैश्विकता की संस्कृति का अहम योगदान रहा है।

राजनीति में पक्ष और विपक्ष की सीमाओं से मुक्त हर भारतीय नागरिक यह गर्व से स्वीकार करता रहा है कि स्वतंत्र भारत राजनीतिक परिपक्वता का परिचय देता रहा है। इसी कारण इक्कसवीं सदी में भारत की विश्व स्तर पर मान्यता और साख तेजी से बढ़ी है। इसमें हमारे युवाओं और उनको तैयार करने वाली संस्थाओं का बहुत बड़ा योगदान रहा है।

मगर पिछले कुछ समय से जो सियासी माहौल बना है, उसमें जनहित के बजाय दलगत राजनीति के निहित स्वार्थ ज्यादा दिखते हैं। स्वतंत्र भारत में प्रारंभ से ही विकास के कार्यों में दूरदृष्टि-पूर्ण निर्णय लिए गए हैं। जो अच्छा कार्य करते हैं, उनसे ही यह अधिकार पूर्वक पूछा जाता है कि वे और अधिक अच्छा क्यों नहीं कर पा रहे हैं। यह आलोचना नहीं, बल्कि प्रेरणा और इच्छाशक्ति को मजबूती देता है। राजनीतिक दलों की अपनी विचारधारा जो भी हो, वे पक्ष में हों या विपक्ष में, उन्हें देश की प्रगति में आपसी सहयोग और सद्भाव के रास्ते लगातार तलाशते रहना होगा।