आजादी के समय भारत ने केवल राजनीतिक स्वतंत्रता का सपना नहीं देखा था, बल्कि एक ऐसे राष्ट्र की कल्पना की थी, जहां हर नागरिक पढ़-लिख सके, अपने अधिकारों को समझ सके और विकास की मुख्यधारा का हिस्सा बन सके। यह सपना उस समय और भी बड़ा था, जब वर्ष 1951 की पहली जनगणना में देश की साक्षरता दर महज 18.3 फीसद थी। यानी आजाद भारत की आबादी का बहुत बड़ा हिस्सा अक्षरों के आलोक से वंचित था। मगर राष्ट्र निर्माण की उस सुबह यह विश्वास था कि शिक्षा के रास्ते पर आगे बढ़ते हुए एक दिन पूरा भारत साक्षर होगा, जो विकसित राष्ट्र की मजबूत नींव तैयार करेगा।

आजादी के करीब आठ दशक बाद जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो उपलब्धियों के साथ एक बेचैन करने वाला सवाल भी सामने खड़ा दिखाई देता है- आखिर भारत कब पूरी तरह साक्षर एवं शिक्षित होगा? हालांकि, साक्षरता के क्षेत्र में देश ने लंबी यात्रा तय की है। वर्ष 1951 में 18.3 फीसद से बढ़कर 2011 में देश की साक्षरता दर 74.04 फीसद हो गई। वर्ष 2001 में यह 64.83 फीसद थी। यानी एक दशक में 9.21 फीसद की वृद्धि हुई। महिला साक्षरता में भी उल्लेखनीय सुधार हुआ और 2001 के 53.67 फीसद से बढ़कर 2011 में यह 65.46 फीसद हो गई।

वर्ष 1988 में राष्ट्रीय साक्षरता मिशन की स्थापना इस उद्देश्य से की गई थी कि भारत को जल्द साक्षर बनाया जाएगा। इसके अंतर्गत पूरे देश में साक्षरता का जनआंदोलन शुरू किया गया, जिसे संपूर्ण साक्षरता अभियान का नाम दिया गया। मगर राष्ट्रीय औसत की चमक के पीछे राज्यों के बीच की असमानता आज भी संपूर्ण साक्षरता के लक्ष्य के लिए बड़ी चुनौती है। इस अभियान की सबसे बड़ी विशेषता थी- सरकार के साथ समाज की भागीदारी। स्वयंसेवक, शिक्षक, विद्यार्थी, सामाजिक संगठन, प्रशासन और आम नागरिक इस अभियान का हिस्सा बने।

वर्ष 1990 के दशक में संपूर्ण साक्षरता अभियान ने देश के अनेक हिस्सों में उम्मीद जगाई। सरकारी मशीनरी और सामाजिक संगठनों की साझेदारी से यह साबित हुआ कि इच्छाशक्ति, जनभागीदारी और स्थानीय नेतृत्व मिल जाए, तो निरक्षरता जैसी बड़ी चुनौती को भी पीछे छोड़ा जा सकता है। इस अभियान की सबसे बड़ी प्रेरक मिसाल केरल बना। 18 अप्रैल, 1991 को केरल को पूर्ण साक्षर राज्य घोषित किया गया। केरल की उपलब्धि ने देश को यह भरोसा दिया कि संपूर्ण साक्षरता कोई असंभव लक्ष्य नहीं है। मगर सवाल है कि जब एक राज्य पूर्ण साक्षर हो गया, तो अगले तीन दशक में देश के सभी राज्य उस मंजिल तक क्यों नहीं पहुंच सके?

दरअसल, साक्षरता अभियान के शुरुआती दौर की जनभागीदारी धीरे-धीरे कमजोर हुई है। साक्षरता को निरंतर सामाजिक आंदोलन बनाए रखने के बजाय कई जगह यह सरकारी कार्यक्रमों और आंकड़ों तक सीमित होती गई। निरक्षर वयस्कों की पहचान, उन्हें नियमित रूप से सीखने के अवसर उपलब्ध कराना, सीखने के बाद उनकी शिक्षा को जारी रखना और नई पीढ़ी को स्कूल से बाहर न होने देना, इन सभी कड़ियों को एक साथ मजबूत करने की आवश्यकता थी। साक्षरता केवल किसी व्यक्ति का अपना नाम लिख लेने तक सीमित नहीं हो सकती। आज के दौर में पढ़ना-लिखना, समझना, गणना करना, बैंकिंग और वित्तीय व्यवहार समझना, डिजिटल माध्यमों का उपयोग करना और अपने अधिकारों तथा कर्तव्यों को जानना भी साक्षरता का हिस्सा है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 पंद्रह वर्ष तथा उससे अधिक आयु के उन लोगों पर केंद्रित है, जो औपचारिक स्कूली शिक्षा से वंचित रह गए। इसमें आधारभूत साक्षरता एवं संख्यात्मक ज्ञान के साथ महत्त्वपूर्ण जीवन कौशल, डिजिटल और वित्तीय साक्षरता, व्यावसायिक कौशल तथा सतत शिक्षा को शामिल किया गया है। दिलचस्प है कि सरकार ने भारतीय परिस्थितियों में 95 फीसद साक्षरता को पूर्ण साक्षरता के समकक्ष मानने का मानक तय किया है।

वर्ष 2024 में लद्दाख ने 97 फीसद से अधिक साक्षरता हासिल कर पूर्ण साक्षर होने का दर्जा प्राप्त किया। इसके बाद मिजोरम, गोवा और त्रिपुरा ने यह उपलब्धि हासिल की। वर्ष 2026 में हिमाचल प्रदेश, अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह, चंडीगढ़, सिक्किम और उत्तराखंड भी इस सूची में शामिल हो गए। भारत ने वर्ष 2030 तक पूर्ण साक्षरता हासिल करने का लक्ष्य रखा था। मगर सवाल यह है कि जब लक्ष्य की समय सीमा केवल कुछ वर्ष दूर है, तो क्या देश के उन राज्यों तक तेजी से पहुंचा जा सकेगा, जहां निरक्षरता का बोझ अभी भी बड़ा है?

वर्ष 2047 में देश आजादी की शताब्दी मनाएगा। मगर विकसित राष्ट्र का सपना उस समय तक अधूरा रहेगा, जब तक देश का अंतिम नागरिक पढ़ने-लिखने और समझने की क्षमता से संपन्न नहीं हो जाता। डिजिटल तकनीक इस काम में बड़ी भूमिका निभा सकती है, लेकिन तकनीक स्वयं समाधान नहीं है। जिसके हाथ में स्मार्टफोन है, लेकिन वह पढ़ नहीं सकता, उसके लिए डिजिटल भारत की यात्रा अधूरी है।

आज जरूरत इस बात की है कि हम वर्ष 2030 के लक्ष्य को केवल सरकारी लक्ष्य न मानें। इसे सामाजिक लक्ष्य बनाएं। आजादी के समय हमने भोर का जो सुंदर स्वप्न देखा था, वह केवल आंकड़ों में साक्षर भारत का नहीं था। वह ऐसे भारत का सपना था, जहां कोई व्यक्ति अंगूठा लगाने के लिए मजबूर न हो, कोई नागरिक साक्षर न होने की वजह से अपने अधिकारों से वंचित न रहे और कोई बच्चा अपने माता-पिता की निरक्षरता का बोझ लेकर आगे न बढ़े। अगर भारत को विकसित राष्ट्र बनाना है, तो पहले यहां के संपूर्ण समाज को साक्षर बनाना होगा।