मानव सभ्यता के इतिहास पर अगर हम निष्पक्ष दृष्टि डालें, तो यह स्पष्ट होता है कि प्राकृतिक आपदाओं, महामारियों या हिंसक वन्यजीवों ने मानवता को उतना नुकसान नहीं पहुंचाया है, जितना स्वयं मनुष्य ने मनुष्य को पहुंचाया है। पशु जगत में हिंसा का आधार प्रायः जैविक है – भूख या आत्मरक्षा।
मगर मनुष्य ही एकमात्र ऐसी प्रजाति है, जो बिना किसी स्पष्ट उकसावे के, विचारधारा, धर्म, जाति या वर्चस्व के नाम पर संगठित हिंसा को अंजाम देती है। घृणा और असहिष्णुता का यह विषाक्त वातावरण एक ऐसी पीढ़ी को जन्म देता है, जो विरासत में ही द्वेष की घुट्टी लेकर पैदा होती है।
जब हम घृणा, गरीबी और शोषण के अंतर्संबंधों पर बात करते हैं, तो प्रगतिशील कवि और गीतकार साहिर लुधियानवी की कालजयी पंक्तियां मानस पटल पर उभर आती हैं। उन्होंने अपनी नज्म ‘चकलें’ में उस कड़वे सच को उकेरा था, जो आज भी हमारे आधुनिक समाज के चेहरे पर एक तमाचा है—‘संसार की हर एक बेशर्मी, गुरबत की गोद में पलती है/ चकले ही में आकर रुकती हैं, फाकों (भूख) में जो राहें निकलती हैं।’
‘घृणा’ एक ऐसा शक्तिशाली और विनाशकारी भाव है, जिसने मानव इतिहास के पृष्ठों को रक्त और राख से रंगा है। शेक्सपियर ने प्रेम और घृणा को व्यक्तित्व के दो ध्रुव बताया है। वास्तविकता यह है कि घृणा में जलने वाला व्यक्ति अपनी समस्त ऊर्जा उस व्यक्ति या व्यवस्था के प्रति समर्पित कर देता है, जिसे वह नापसंद करता है। यह एक ऐसी आत्मघाती प्रक्रिया है, जो पाने वाले का कम, लेकिन उसे पोषित करने वाले का सर्वस्व नष्ट कर देती है। तथागत बुद्ध ने ‘धम्मपद’ में इस शाश्वत सत्य को अत्यंत स्पष्टता से रेखांकित किया है—इस संसार में द्वेष कभी भी द्वेष से शांत नहीं होता, वह केवल अद्वेष, प्रेम और करुणा से ही शांत होता है।
दरअसल, अपराध और सामाजिक पतन का मूल कारण आमतौर पर व्यक्ति का जन्मजात चरित्र नहीं, बल्कि व्यवस्था द्वारा थोपी गई दरिद्रता, बेबसी और निरंतर अभाव होता है। जब एक समाज अपनी ही संतानों को भूख और हताशा के आगे घुटने टेकने पर मजबूर कर देता है, तो उस समाज में मानवीय मूल्यों का क्षरण होना स्वाभाविक है। साहिर का मार्मिक सवाल ‘जिन्हें नाज है हिंद पर, वो कहां हैं’ आज भी उन सत्ताधीशों, नीति-निर्माताओं और संभ्रांत वर्ग को झकझोरने के लिए पर्याप्त है, जो विकास की चकाचौंध और बड़े-बड़े आंकड़ों में तो चमकते हैं, लेकिन हाशिये पर खड़े उस अंतिम व्यक्ति की पीड़ा को देखने से कतराते हैं, जिसके श्रम से यह राष्ट्र खड़ा है।
अक्सर हम सामाजिक अपराधों और दंगों को केवल व्यक्तिगत नैतिक पतन या सांप्रदायिक कट्टरता के रूप में देखते हैं, जबकि इसका एक गहरा आर्थिक आधार भी है। शहरों में जिस प्रकार का विभाजन हुआ है, वह बढ़ती असमानता का जीवंत प्रमाण है। जब एक तरफ समृद्धि के उत्तुंग शिखर हों और दूसरी तरफ सुविधाओं से वंचित मलिन बस्तियां, तो वहां उपजे आक्रोश की पृष्ठभूमि को समझा जाना चाहिए। यह आक्रोश केवल गरीबी का परिणाम नहीं है, बल्कि संसाधनों के अनुचित वितरण, अवसर की असमानता और निरंतर शोषण का संचित परिणाम है।
गरीब वर्ग स्वभाव से कहीं अधिक सहिष्णु और कानून का पालन करने वाला होता है, लेकिन जब उसे यह अहसास होता है कि व्यवस्था, भ्रष्टाचार, अकर्मण्यता और पक्षपात के कारण उसके हकों को कुचला जा रहा है, तो उसके भीतर ‘सापेक्षिक वंचना’ का भाव जागृत होता है।
आज के भारत में एक साथ कई शताब्दियां जी रही हैं—कहीं बैलगाड़ी है, तो कहीं लेम्बोर्गिनी। उपभोक्तावादी संस्कृति ने अमीर और गरीब के बीच की गहरी खाई को और अधिक चौड़ा कर दिया है। अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है, लेकिन यह विकास वंचित वर्गों के लिए समावेशी नहीं बन पाया है। जो लोग विकास की इस दौड़ में पीछे छूट गए हैं, उनका धैर्य अब जवाब दे रहा है।
यह नीति-निर्माताओं के लिए खतरे की घंटी है। यदि हम शहरी विकास के नाम पर केवल उन लोगों की सुविधा सुनिश्चित करेंगे, जो आर्थिक रूप से संपन्न हैं, तो हम उन लाखों-करोड़ों लोगों की उपेक्षा कर रहे हैं, जिनके श्रम और पसीने पर यह पूरी शहरी सभ्यता और उसके आराम का ढांचा टिका है।
आजादी के अमृतकाल में भी हम केवल ‘मुफ्त की योजनाओं’ और लोक-लुभावन वादों के सहारे समाज को सांत्वना दे रहे हैं। सच्चाई यह है कि ये कृत्रिम और तात्कालिक उपचार अब नाकाफी हैं। राष्ट्र की वास्तविक वृद्धि तब होगी, जब युवाओं को उनके परिश्रम का उचित प्रतिफल मिलेगा, तंत्र में संवेदनशीलता होगी और विकास की मुख्यधारा में हर हाथ को काम मिलेगा। यह न केवल सामाजिक न्याय का तकाजा है, बल्कि बढ़ते हुए मध्य वर्ग के लिए भी आत्म-संरक्षण का प्रश्न है। अगर मध्य वर्ग हाशिये के समाज को साथ लेकर नहीं चलता, तो सामाजिक विखंडन और अराजकता का खतरा बना रहेगा।
आज हमें ऐसे दूरदर्शी विचारकों और नेतृत्व की आवश्यकता है, जो एक ऐसे भारत की कल्पना कर सकें जो केवल सांख्यिकी में नहीं, बल्कि मानवीय गरिमा में उन्नत हो। घृणा का उन्मूलन केवल उपदेशों या कठोर कानूनों से नहीं, बल्कि समानता और न्यायपूर्ण वितरण से होगा। जब एक मजदूर का बेटा यह महसूस करेगा कि राष्ट्र उसके सपने का भी उतना ही सम्मान करता है, जितना कि किसी बड़े कॉरपोरेट जगत के नायक का, तभी ‘भारत’ का विचार पूर्ण होगा।
समय आ गया है कि हम ‘दलों’ और ‘दस्तावेजों’ की राजनीति से ऊपर उठकर एक ऐसे समावेशी भारत का निर्माण करें, जहां किसी भी नागरिक को घृणा, भूख या अभाव की गोद में न पलना पड़े। सच्चा राष्ट्रवाद वही है, जो अपने सबसे कमजोर व्यक्ति के चेहरे पर मुस्कान ला सके।
