अस्पताल उपचार का केंद्र होते हैं, लेकिन कई बार वे खुद ही बीमार नजर आते हैं। यह कहने और सुनने में अजीब लग सकता है, लेकिन देश के स्वास्थ्य तंत्र की इस सच्चाई को नकारा नहीं जा सकता। जिन स्वास्थ्य संस्थानों पर हम जीवन बचाने का भरोसा करते हैं, वही कई बार संसाधनों की कमी, प्रबंधन की विफलता और बढ़ती व्यावसायिकता की वजह से संकट का कारण बन जाते हैं। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था पर ज्यादा दबाव है, या फिर इसे खुद इलाज की जरूरत है।
आज के दौर में अस्पताल जाना कई बार बीमारी से बड़ा अनुभव बन जाता है। मरीज इलाज के लिए अस्पताल जाता है, लेकिन सबसे पहले उसे भीड़ और कतार में खड़े होकर कई घंटे इंतजार करने की परेशानी से जूझना पड़ता है। इसके बाद कहीं बिस्तर नहीं मिलता, तो कहीं विशेषज्ञ चिकित्सक मौजूद नहीं होते। यही नहीं, कई बार सब कुछ होने के बावजूद व्यवस्था साथ नहीं देती। यह तस्वीर किसी एक शहर की नहीं, बल्कि देश भर की है।
देश के अस्पतालों में प्रति एक हजार लोगों के लिए औसतन 1.3 बिस्तर हैं, जबकि दुनिया का मानक इससे दोगुने से भी ज्यादा है। इससे स्पष्ट है कि मरीज ज्यादा हैं और जगह कम है। उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में यह समस्या और साफ दिखती है, जहां आबादी इतनी ज्यादा है कि अस्पताल हमेशा भरे रहते हैं। समय के साथ आबादी बढ़ी, मरीजों की संख्या में भी बढ़ोतरी हुई, लेकिन इसके अनुरूप अस्पतालों में स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार नहीं हो पाया।
राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्रोफाइल (एनएचपी-2022) के अनुसार, देश में प्रति दस हजार आबादी पर अस्पतालों में बिस्तर की उपलब्धता लगभग पंद्रह है, जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानक के अनुसार न्यूनतम संख्या तीस बिस्तरों की है। यानी हम बुनियादी स्तर पर अभी आधे रास्ते में हैं। राज्यों के बीच असमानता इस संकट को और गहरा करती है। केरल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में स्वास्थ्य सेवाएं अपेक्षाकृत बेहतर हैं, जबकि बिहार और उत्तर प्रदेश में स्थिति गंभीर है। बिहार में प्रति दस हजार आबादी पर बिस्तरों की संख्या छह-सात के बीच है। इसका मतलब है कि एक ही देश में स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता नागरिक की भौगोलिक स्थिति पर निर्भर करती है।
ग्रामीण स्वास्थ्य सांख्यिकी (आरएचएस 2022-23) की रपट से पता चलता है कि देश के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में विशेषज्ञ चिकित्सकों के 70 फीसद से अधिक पद खाली हैं। कई बड़े राज्यों में यह आंकड़ा 75-80 फीसद तक है। यानी ग्रामीण भारत में रहने वाले करोड़ों लोग प्राथमिक स्तर पर ही विशेषज्ञ चिकित्सा सेवाओं से वंचित हैं।
अस्पतालों में संक्रमण की स्थिति भी चिंताजनक है। विभिन्न अध्ययनों के अनुसार, देश में 10-15 फीसद मरीज इलाज के दौरान ही संक्रमण का शिकार हो जाते हैं। विकसित देशों में यह आंकड़ा लगभग आधा है। यानी हमारे अस्पताल कई बार रोग से मुक्ति के बजाय नई बीमारी का केंद्र बन जाते हैं। कोविड-19 महामारी ने इस सच्चाई को सबके सामने रखा। आक्सीजन की कमी, गहन चिकित्सा इकाई में बिस्तरों का अभाव और अस्पतालों के बाहर लंबी कतारें, ये दृश्य केवल एक आपदा नहीं, बल्कि हमारी तैयारियों की कमी का परिणाम थे।
निजी अस्पतालों की भूमिका भी सवालों से परे नहीं है। इलाज की बढ़ती लागत और पारदर्शिता की कमी ने आम नागरिकों के लिए स्वास्थ्य सेवा को महंगा एवं जटिल बना दिया है। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के आंकड़े बताते हैं कि ग्रामीण क्षेत्रों में 65 फीसद और शहरी क्षेत्रों में 70 फीसद लोग निजी अस्पतालों का सहारा लेते हैं। यह केवल सुविधा नहीं, बल्कि सरकारी व्यवस्था पर घटते भरोसे का संकेत है।
देश में चिकित्सक-जनसंख्या अनुपात 1:1400 के आसपास है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति और खराब है। नर्सिंग स्टाफ की कमी और उपकरणों की स्थिति भी कम चिंताजनक नहीं है। कैग की रपटों में पाया गया है कि कई अस्पतालों में महंगे उपकरण या तो खराब पड़े रहते हैं या उनका उपयोग नहीं हो पाता। यानी समस्या संसाधनों की कमी के साथ-साथ उनके प्रबंधन की भी है।
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार, भारत में प्रतिदिन 700 टन से अधिक जैव-चिकित्सीय कचरा उत्पन्न होता है, जिसका पूरी तरह वैज्ञानिक तरीके से निपटान नहीं हो पाता। यह स्थिति संक्रमण के खतरे को और बढ़ाती है।
इन चुनौतियों के बीच वर्ष 2018 में आयुष्मान भारत योजना की शुरुआत हुई। इसका उद्देश्य था- गरीब और कमजोर वर्ग को पांच लाख रुपए तक का मुफ्त इलाज उपलब्ध कराना। यह योजना अपनी अवधारणा में बेहतर थी और इसने लाखों लोगों को पहली बार बड़े अस्पतालों तक पहुंचने का अवसर दिया। मगर जैसे-जैसे इसका विस्तार हुआ, वैसे-वैसे इसके दुरुपयोग के मामले भी सामने आने लगे।
राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राधिकरण की जांच में पाया गया कि कई अस्पतालों ने फर्जी मरीज दिखाकर या अनावश्यक प्रक्रियाएं जोड़कर इस योजना के तहत धनराशि के दावे किए। ऐसे मामलों में सैकड़ों निजी अस्पतालों को अनियमितताओं के कारण इस योजना से बाहर कर दिया गया।
ऐसे मामलों का मानवीय पक्ष अधिक असहज करता है। एक सीमित आय वाला परिवार आयुष्मान कार्ड के भरोसे निजी अस्पताल पहुंचता है और यही उसकी सबसे बड़ी पूंजी होती है। सतह पर सब कुछ सामान्य दिखता है, मगर बाद में कई बार सामने आता है कि अस्पताल की ओर से मरीज के इलाज के दौरान जिन प्रक्रियाओं का दावा किया गया, वे हुई ही नहीं। यानी अस्पतालों के लिए उपचार की गुणवत्ता से इतर, खर्च के बिल का विस्तार प्राथमिकता बन जाता है।
देश की स्वास्थ्य व्यवस्था में शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के बीच असमानता भी स्पष्ट दिखाई देती है। लगभग 65 फीसद आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है, लेकिन स्वास्थ्य सुविधाओं और चिकित्सकों का बड़ा हिस्सा शहरों में केंद्रित है। इस प्रक्रिया में समय और संसाधनों की बर्बादी के साथ-साथ कई बार मरीज की स्थिति भी गंभीर हो जाती है।
दूसरी ओर, शहरी क्षेत्रों में सुविधाएं उपलब्ध होने के बावजूद अत्यधिक भीड़ और दबाव के कारण स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता प्रभावित होती है। यह असमानता केवल सुविधा की कमी नहीं, बल्कि स्वास्थ्य सेवाओं तक समान पहुंच के अभाव को दर्शाती है।
देश में स्वास्थ्य सेवाओं का एक बड़ा हिस्सा निजी क्षेत्र के माध्यम से संचालित होता है, जबकि सरकारी अस्पतालों पर गरीब और निम्न आय वर्ग की निर्भरता अधिक है। अनुमानत: 60 से 70 फीसद मरीज निजी अस्पतालों में इलाज कराते हैं, जहां सुविधाएं अपेक्षाकृत बेहतर होती हैं, लेकिन खर्च अधिक होता है।
इसके विपरीत, सरकारी अस्पतालों में इलाज सस्ता या नि:शुल्क होता है, लेकिन वहां संसाधनों की कमी और अत्यधिक भीड़ के कारण मरीजों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। यह स्थिति एक ऐसी दोहरी व्यवस्था को जन्म देती है, जहां इलाज की गुणवत्ता व्यक्ति की आर्थिक क्षमता पर निर्भर करती है और यह स्वास्थ्य सेवाओं की समानता और न्याय के सिद्धांत के विपरीत है।
ऐसे में अस्पतालों की स्थिति में सुधार के लिए बहुआयामी दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है। स्वास्थ्य पर सार्वजनिक व्यय बढ़ाना, ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे को मजबूत करना और मानव संसाधनों की कमी को दूर करना प्राथमिक कदम होने चाहिए। इसके साथ ही डिजिटल निगरानी, पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना भी जरूरी है।
