वैश्विक अस्थिरता, जलवायु परिवर्तन और दुनिया में बढ़ते युद्धों ने केवल अर्थव्यवस्था, महंगाई, पर्यावरण और ऊर्जा संकट को ही गहरा नहीं किया है, बल्कि खाद्य संकट को भी एक नई चुनौती के रूप में सामने ला दिया है। खाद्य संकट अब केवल भूख का प्रश्न नहीं रहा, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा, सामाजिक स्थिरता और आर्थिक विकास से भी जुड़ गया है। बढ़ती आबादी, सीमित संसाधनों और महंगाई के दबाव के कारण करोड़ों लोगों की थाली तक सुरक्षित, पर्याप्त और पौष्टिक भोजन नहीं पहुंच पा रहा है। इसलिए खाद्य सुरक्षा को अब केवल अनाज की उपलब्धता के बजाय उत्पादन, पहुंच, क्रय-शक्ति और वितरण से जुड़ी व्यापक चुनौती के रूप में समझना होगा।
हाल के वर्षों में युद्धों और भू-राजनीतिक तनावों ने खाद्य संकट का एक नया चेहरा दिखाया है। रूस-यूक्रेन युद्ध इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। युद्ध से पहले रूस और यूक्रेन गेहूं, सूरजमुखी तेल और मक्के के प्रमुख निर्यातकों में शामिल थे। युद्ध ने उत्पादन और निर्यात दोनों को प्रभावित किया, जिससे वैश्विक बाजार में खाद्य वस्तुओं की कीमतों और आपूर्ति पर दबाव बढ़ा। ‘सेंटर फार स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज’ के जून 2026 के विश्लेषण के अनुसार, युद्ध के चार साल बाद भी यूक्रेन का 2025 का अनाज निर्यात 2020 की तुलना में लगभग 35 फीसद कम रहा। रूस के महत्त्वपूर्ण उर्वरक निर्यातक होने के कारण युद्ध का असर कृषि लागत पर भी पड़ा। पश्चिम एशिया के संघर्षों ने समुद्री व्यापार मार्गों को जोखिम में डालकर खाद्य आपूर्ति की अनिश्चितता और बढ़ा दी है।
इन परिस्थितियों ने दुनिया की सरकारों को यह सोचने पर विवश किया है कि खाद्य सुरक्षा अब राष्ट्रीय सुरक्षा का अभिन्न हिस्सा है। संयुक्त राष्ट्र की पांच एजंसियों द्वारा जारी रिपोर्ट ‘विश्व में खाद्य सुरक्षा एवं पोषण की स्थिति, 2026’ के अनुसार, वर्ष 2025 में दुनिया की करीब 7.8 फीसद आबादी यानी लगभग 64.5 करोड़ लोग भूख से जूझ रहे थे। यह आंकड़ा लगातार तीसरे वर्ष घटा है। वर्ष 2024 में यह 8.1 फीसद और 2022 में 8.6 फीसद था। हालांकि इस सुधार को स्थायी उपलब्धि मानना जल्दबाजी होगी, क्योंकि पौष्टिक भोजन की कीमत लगातार बढ़ रही है। रिपोर्ट के अनुसार, 2025 में एक पौष्टिक थाली की औसत वैश्विक कीमत लगभग 4.28 डालर प्रतिदिन हो गई, जबकि 2017 में यह 2.94 डालर थी।
अप्रैल 2026 में जारी ‘खाद्य संकट पर वैश्विक रिपोर्ट’ भी चिंताजनक तस्वीर प्रस्तुत करती है। इसके अनुसार 47 देशों में लगभग 26.6 करोड़ लोग गंभीर खाद्य असुरक्षा का सामना कर रहे थे। पहली बार एक ही वर्ष में गाजा और सूडान में अकाल जैसी स्थितियां सामने आईं। स्पष्ट है कि वैश्विक स्तर पर खाद्य संकट का स्वरूप एक समान नहीं है। दक्षिण एशिया और लातिन अमेरिका में स्थिति में कुछ सुधार दिखता है, लेकिन अफ्रीका और पश्चिम एशिया के अनेक हिस्सों में संकट लगातार गहरा रहा है। ऐसे में भारत की स्थिति उपलब्धि और चुनौती, दोनों का मिश्रण है।
गौरतलब कि भारत में कुपोषित लोगों का अनुपात 2004-06 के 21.1 फीसद से घटकर 2023-25 में 9.8 फीसद रह गया है। इस अवधि में कुपोषित लोगों की संख्या भी लगभग 24 करोड़ से घटकर 14.25 करोड़ रह गई। दो दशकों में हुआ यह सुधार निश्चित रूप से महत्त्वपूर्ण है, लेकिन दूसरी ओर 2025 में भारत की करीब 35.5 फीसद आबादी, यानी 52 करोड़ से अधिक लोग पौष्टिक और संतुलित भोजन का खर्च वहन करने की स्थिति में नहीं थे। यह आंकड़ा 2017 के 59.8 फीसद से कम जरूर हुआ है, लेकिन अभी भी काफी बड़ा है। भारत में पौष्टिक भोजन की अनुमानित कीमत 2025 में करीब 4.11 डालर प्रतिदिन रही।
यहीं भारत के खाद्य संकट का सबसे बड़ा विरोधाभास सामने आता है। देश में अनाज की कमी नहीं है, लेकिन संतुलित पोषण की कमी अब भी गंभीर है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार, भारत में लगभग 35.5 फीसद बच्चों का कद उनकी उम्र के अनुपात में कम है और 19.3 फीसद बच्चे कम वजन की समस्या से जूझ रहे हैं। दूसरी ओर, महिलाओं में रक्ताल्पता और शहरी क्षेत्रों में बढ़ता मोटापा एक अलग चिंता पैदा कर रहे हैं। सस्ता और अधिक प्रसंस्कृत भोजन कई परिवारों के लिए मजबूरी बन रहा है। परिणामस्वरूप भारत एक साथ अल्पपोषण और मोटापे के दोहरे बोझ का सामना कर रहा है।
गौरतलब है कि केंद्रीय कृषि मंत्रालय के नवंबर 2025 के अंतिम अनुमानों के अनुसार, वर्ष 2024-25 में देश ने करीब 35.77 करोड़ टन खाद्यान्न का उत्पादन किया। चावल और गेहूं का उत्पादन रिकार्ड स्तर पर रहा। सार्वजनिक वितरण प्रणाली भी लगभग 80 करोड़ से अधिक लोगों तक सस्ता अनाज पहुंचा रही है। इसलिए भारत की मूल चुनौती अब केवल अधिक अनाज पैदा करना नहीं, बल्कि हर परिवार की थाली में विविधता और पोषण सुनिश्चित करना है।
इस चुनौती की जड़ें कई स्तरों पर फैली हैं। खाद्य महंगाई, डीजल और उर्वरकों की बढ़ती लागत तथा दालों और तिलहनों के आयात पर निर्भरता कृषि व्यवस्था पर दबाव डालती है। गरीबी और आय की असमानता यह तय करती है कि परिवार आय का कितना हिस्सा पौष्टिक भोजन पर खर्च कर सकता है। गांव और शहर के बीच की आर्थिक दूरी भी भोजन की गुणवत्ता को प्रभावित करती है। वहीं, अनियमित मानसून, सूखा, बाढ़, भूजल का अत्यधिक दोहन और मिट्टी की घटती उर्वरता भविष्य की खाद्य सुरक्षा के लिए गंभीर खतरे हैं।
इस पूरी व्यवस्था के केंद्र में किसान है। अगर खाद्य सुरक्षा राष्ट्रीय प्राथमिकता है, तो किसान की आर्थिक सुरक्षा को उससे अलग नहीं किया जा सकता। छोटे और सीमांत किसानों के लिए बीज, खाद, डीजल और सिंचाई की बढ़ती लागत के साथ मौसम का जोखिम तथा बाजार में कीमतों की अनिश्चितता बड़ी चुनौती है। फसल बीमा, बेहतर भंडारण, प्रसंस्करण सुविधाओं और डिजिटल बाजार तक पहुंच को मजबूत करना जरूरी है। किसान की आय स्थिर होगी, तो कृषि उत्पादन भी अधिक टिकाऊ बनेगा और देश की खाद्य सुरक्षा की नींव मजबूत होगी।
आगे का रास्ता स्पष्ट है। भारत को जलवायु-अनुकूल कृषि, सूखा और गर्मी सहने वाली फसल किस्मों, सटीक खेती तथा स्मार्ट सिंचाई जैसी तकनीकों को तेजी से अपनाना होगा। मिलेट्स यानी मोटे अनाजों, दालों और स्थानीय अनाजों को बढ़ावा देना पोषण और पर्यावरण, दोनों के लिए उपयोगी होगा। इसके साथ, बेहतर भंडारण, खाद्य प्रसंस्करण में निवेश, आपूर्ति शृंखला को मजबूत करना और भोजन की बर्बादी कम करना भी आवश्यक है। स्थानीय खाद्य प्रणालियों को मजबूत किए बिना दीर्घकालिक खाद्य सुरक्षा संभव नहीं है।
इक्कीसवीं सदी में जिस देश के पास उपजाऊ मिट्टी, पर्याप्त और स्वच्छ पानी, स्वस्थ किसान तथा हर नागरिक तक पौष्टिक भोजन की पहुंच होगी, वही आर्थिक और रणनीतिक रूप से मजबूत होगा। भारत ने अनाज उत्पादन के क्षेत्र में बड़ी उपलब्धियां हासिल की हैं। अब अगली मंजिल बेहतर थाली की है। सवाल यह नहीं होना चाहिए कि देश कितना अनाज पैदा करता है, बल्कि यह कि क्या हर भारतीय को संतुलित, सुरक्षित, पौष्टिक और सस्ता भोजन उपलब्ध है। भारत को खाद्य सुरक्षा से आगे बढ़कर पोषण, किसान और पर्यावरण- इन तीनों की सुरक्षा को एक साथ साधना होगा। आखिरकार खाद्य संकट केवल खेत-खलिहान का सवाल नहीं, बल्कि राष्ट्र के वर्तमान और भविष्य की सुरक्षा का प्रश्न है।
