प्रदूषण की लगातार बढ़ती समस्या और प्राकृतिक संसाधनों का सीमित होना आज दुनिया की बड़ी चुनौतियों में शामिल है। हर देश और नागरिक इस स्थिति से प्रभावित हैं। वैश्विक स्तर पर सबसे बड़ी चुनौती यह है कि लगातार बढ़ते प्रदूषण को कैसे रोका जाए, क्योंकि यह प्रतिवर्ष लाखों लोगों की जान ले रहा है।
दूसरी ओर, प्राकृतिक संसाधन निरंतर घट रहे हैं। इनके बिना जीवन की कल्पना करना मुश्किल है। इन दोनों समस्याओं का सबसे बड़ा समाधान है अक्षय ऊर्जा। अक्षय ऊर्जा वह स्रोत है जो कभी खत्म नहीं होता और स्वच्छ होने के कारण पर्यावरण को सुरक्षित रखता है।
परंपरागत संसाधनों जैसे कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस और लकड़ी की सीमित उपलब्धता और उनके अंधाधुंध दोहन के कारण निकट भविष्य में इनकी कमी गंभीर संकट पैदा कर सकती है। विश्व स्तर पर ऊर्जा की गैर-पारंपरिक और अक्षय स्रोतों से पूर्ति की आवश्यकता बढ़ गई है। भारत में भी 2004 से अक्षय ऊर्जा के विकास और उपयोग के लिए प्रयास जारी हैं।
वैश्विक सर्वेक्षणों के अनुसार यदि अक्षय ऊर्जा को नीति और निवेश के साथ जोड़ा जाए तो इससे न केवल अर्थव्यवस्था मजबूत होगी, बल्कि पर्यावरणीय समस्याओं से भी राहत मिलेगी। इससे करोड़ों लोगों के जीवन में सुधार और स्वच्छ ऊर्जा का विस्तार संभव है।
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) की रिपोर्ट के अनुसार, सौर, पवन, जल और परमाणु ऊर्जा के उपयोग को तीन गुना बढ़ाने से ऊर्जा की खपत कम की जा सकती है और पारंपरिक जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता घट सकती है। इससे वर्ष 2060 तक जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता सिर्फ 12% रह सकती है और पृथ्वी का तापमान दो डिग्री सेल्सियस से नीचे रखा जा सकता है।
अक्षय ऊर्जा में निवेश और सतत विकास लक्ष्यों के अनुरूप नीतियां अपनाकर दुनिया के सभी देश अपने नागरिकों को स्वच्छ बिजली और रसोई ईंधन उपलब्ध कर सकते हैं। इससे कुल 20.4 ट्रिलियन डॉलर की बचत और करोड़ों लोगों को गरीबी, कुपोषण और स्वच्छ पानी जैसी बुनियादी सुविधाएं मिल सकती हैं।
भारत ने 2030 तक 500 गीगावाट अक्षय ऊर्जा का लक्ष्य रखा था और इसे पांच साल पहले ही आधा पूरा कर लिया। देश अब सौर ऊर्जा में तीसरे, पवन ऊर्जा में चौथे और कुल अक्षय ऊर्जा क्षमता में चौथे स्थान पर पहुंच चुका है। यह उपलब्धि न केवल भारत की ऊर्जा नीति में सफलता का प्रतीक है, बल्कि वैश्विक जलवायु प्रयासों में भी उसकी भूमिका दिखाती है।
हालांकि, अन्य देशों को भी यथास्थिति छोड़कर अक्षय ऊर्जा को तेजी से अपनाना होगा। अन्यथा पारंपरिक ईंधन पर निर्भरता से पृथ्वी का तापमान 2.6 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ सकता है, जिसका सीधा प्रभाव स्वास्थ्य, भोजन, पानी और स्वच्छता पर पड़ेगा।
