प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह वाक्य- ‘भारत-यूरोपीय संघ के बीच मुक्त व्यापार समझौता सभी सौदों की जननी है’, सोशल मीडिया पर खूब प्रसारित हुआ है। ‘जननी जन्म भूमिश्च’ को गति देने वाले यूरोप के दो ताकतवर देश हैं- ब्रिटेन और जर्मनी। इस बहुचर्चित श्लोक का पहला वाक्य है, ‘मित्राणि धन धान्यानि प्रजानां सम्मतानिव।’ अर्थात, ‘मित्र, धन-धान्य आदि का संसार में बहुत अधिक सम्मान है।’ ब्रिटेन और जर्मनी ने जो कुछ किया, उससे अमेरिका तिलमिलाया हुआ है। भारत और यूरोपीय संघ के बीच मुक्त व्यापार समझौते से पहले ब्रिटेन और भारत ने जुलाई 2025 में मुक्त व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। यूरोपीय संघ से बाहर निकलने के बाद ब्रिटेन का यह सबसे बड़ा व्यापार समझौता था। भारत और यूरोपीय देशों की इस साझेदारी से अमेरिकी शुल्क नीति के प्रभाव को कम करने में खासी मदद मिलेगी।
ठीक इसी तरह के अभियान के तहत ब्रिटेन के प्रधानमंत्री किअर स्टारमर हाल ही में आधिकारिक दौरे पर बेजिंग पहुंचे। उनके साथ करीब साठ सदस्यों का व्यापार एवं सांस्कृतिक प्रतिनिधिमंडल भी मौजूद रहा। स्टारमर का दौरा इस महीने कई पश्चिमी नेताओं के चीन दौरे के बाद हुआ। स्टारमर की यह यात्रा निश्चित रूप से अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को असहज करने वाली है। इस दौरान स्टारमर ने कहा कि चीन के साथ ब्रिटेन के रिश्तों को और बेहतर बनाना जरूरी है। आठ साल में किसी ब्रिटिश नेता का यह पहला चीन दौरा है।
इस वर्ष चार जनवरी को आयरिश प्रधानमंत्री मिशेल मार्टिन ने चीन का दौरा किया था, 25 जनवरी को फिनलैंड के प्रधानमंत्री पेटेरी ओर्पो बेजिंग पहुंचे थे। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों और स्पेन के राजा फेलिप षष्टम ने पिछले साल के आखिर में चीन का दौरा किया था। माना जा रहा है कि जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज फरवरी में चीन का दौरा कर सकते हैं।
भारत-यूरोपीय संघ के बीच मुक्त व्यापार समझौते को लेकर चीन को कोई परेशानी महसूस नहीं हो रही है। इस मामले में उसे भारत इसलिए प्रतिस्पर्धी नहीं लग रहा, क्योंकि चीन भी अमेरिका का सताया हुआ है। सवाल है कि ट्रंप की नीतियों से असहज यूरोपीय शासन प्रमुखों के चीन दौरों से क्या मायने निकलते हैं? ब्रिटेन के प्रधानमंत्री स्टारमर ने बेजिंग दौरे के दौरान एक कार्यक्रम में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से कहा, ‘चीन दुनिया का एक महत्त्वपूर्ण राष्ट्र है और यह जरूरी है कि हम और ज्यादा बेहतर रिश्ते बनाएं।’ इस पर जिनपिंग ने भी स्पष्ट किया कि वे स्थिर और व्यापक रणनीतिक साझेदारी विकसित करने को तैयार हैं।
स्टारमर ने जिनपिंग के साथ अपनी मुलाकात को वास्तविक परिणामों के साथ बहुत अच्छी एवं रचनात्मक बैठक बताया और चीन में ब्रिटिश व्यवसायों के लिए बेहतर अवसरों पर जोर दिया। दोनों पक्षों ने मीडिया को संकेत दिया कि शराब की विशेष किस्म पर चीन के शुल्क कम करने और चीन के लिए वीजा-मुक्त यात्रा के मुद्दे पर अच्छी प्रगति हुई है।
अब सवाल यह है कि स्टारमर की इस यात्रा के बाद क्या चीन और यूरोपीय संघ के बीच ‘कांप्रिहेंसिव एग्रीमेंट आन इन्वेस्टमेंट’ (सीएआइ) को गति मिलेगी? हालांकि, चीन ने बातचीत फिर से शुरू करने और आर्थिक संबंधों को गहरा करने में दिलचस्पी दिखाई है। स्टारमर का यह दौरा वर्ष 2025 के आर्थिक और वित्तीय संवाद (ईएफडी) के बाद हुआ, जिसके बारे में ब्रिटेन के व्यापार और व्यवसाय विभाग ने दावा किया है कि इससे 600 मिलियन पाउंड का तत्काल लाभ हुआ है एवं वर्ष 2018 के बाद पहली बार ब्रिटेन-चीन संयुक्त आर्थिक और व्यापार आयोग (जेटको) की स्थापना हुई है।
दरअसल, भारत और यूरोपीय संघ के बीच मुक्त व्यापार समझौता होने से पहले ही इसके स्पष्ट संकेत मिलने से उत्साहित होकर ट्रंप विरोधी ताकतें एकजुट होने लगीं। इस महीने की शुरुआत में कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने बेजिंग का दौरा किया था। यह घोषणा करने के बाद कि कनाडा कुछ चीनी इलेक्ट्रिक वाहनों पर शुल्क कम करेगा, ट्रंप ने धमकी दी कि अगर चीन के साथ कनाडा कोई व्यापार समझौता करता है, तो वह कनाडा से आयात पर सौ फीसद शुल्क लगा देंगे।
अब कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ब्रिटेन के अपने समकक्ष स्टारमर की बेजिंग यात्रा से मजबूती महसूस कर रहे हैं। यह यात्रा ऐसे समय में हुई, जब यूरोपीय देश चीन के 1.2 ट्रिलियन डालर के वैश्विक व्यापार अधिशेष से चिंतित हैं। यूरोपीय नेताओं को लगता है कि सस्ता चीनी सामान उनके घरेलू उद्योगों को खोखला कर रहा है। मगर ट्रंप की वजह से इस कड़वे घूंट को भी यूरोपीय नेता मीठा-मीठा मानने लगे हैं।
किअर स्टारमर के दौरे के बारे में पूछे जाने पर चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि यह दोनों देशों के साझा हितों के मद्देनजर महत्त्वपूर्ण है और इससे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के दो स्थायी सदस्यों के तौर पर चीन और ब्रिटेन के लिए वैश्विक शांति, स्थिरता और विकास में मदद मिलेगी।
सुरक्षा परिषद में पांच स्थायी सदस्य हैं- चीन, फ्रांस, रूस, ब्रिटेन और अमेरिका। वर्तमान परिदृश्य में इनमें से तीन ब्रिटेन, रूस और चीन एक तरफ दिखते हैं। ऐसे में यदि वीटो के उपयोग का विकल्प न हो, तो अमेरिका अलग-थलग पड़ सकता है। मगर यह समझना जरूरी है कि दवा का कुछ नकारात्मक प्रभाव भी होता है। भारत और यूरोपीय संघ के बीच मुक्त व्यापार समझौते के बाद भारतीय कार निर्माताओं के शेयरों में पांच फीसद तक की बड़ी गिरावट देखी गई।
इस समझौते से यूरोपीय कंपनियों को सीधा फायदा होने की संभावना जताई जा रही है। माना जा रहा है कि इससे मशीनरी, आप्टिकल, मेडिकल, सर्जिकल और इलेक्ट्रिकल उपकरणों जैसे यूरोपीय उत्पादों की भारतीय बाजारों में आवक बढ़ेगी। एक सबसे अहम बात यह है कि यूरोप की कई कंपनियों की निर्माण इकाइयां चीन में लगी हैं। ऐसे में नाम भले यूरोपीय संघ का हो, मगर उत्पाद चीन से ही आएगा। शायद इसलिए भी चीन इस समझौते से असहज नहीं है।
दूसरी ओर, ट्रंप प्रशासन इस बात से निराश है कि नवंबर के मध्यावधि चुनावों से पहले प्रस्तावित समझौते तेजी से पूरे नहीं हो पा रहे हैं। भारत-ईयू व्यापार समझौते से अमेरिका को जोर का झटका धीरे से लगा है। अटलांटिक पारीय संधि खतरे में है। अमेरिका के वित्त मंत्री का कहना है कि इस समझौते से यूरोपीय संघ ने यूक्रेन से पहले व्यापार को प्राथमिकता दी है। ट्रंप की दबावकारी नीतियों के कारण अमेरिका वैश्विक मंच पर धीरे-धीरे अलग-थलग पड़ रहा है। न्यूटन के तीसरे नियम की तरह—हर क्रिया की बराबर और विपरीत प्रतिक्रिया हो रही है।
