विद्यालय को केवल शिक्षा का केंद्र नहीं, बल्कि लोकतंत्र का सबसे जीवंत प्रवेश-द्वार भी माना जाता है। देश ने पिछले चार दशक में स्कूली शिक्षा के विस्तार की एक लंबी यात्रा तय की है। गांव-गांव स्कूल पहुंचे, नामांकन बढ़ा, बालिका शिक्षा में सुधार हुआ, बिजली, शौचालय, कंप्यूटर और स्मार्ट कक्षाओं जैसी सुविधाएं बढ़ीं। मध्याह्न भोजन, निशुल्क पाठ्यपुस्तकें, छात्रवृत्तियां, स्कूल परिवहन, डिजिटल संसाधन और समग्र शिक्षा जैसी योजनाओं ने शिक्षा के विस्तार को गति दी है। मगर इस पूरी कवायद में एक गहरा अभाव आज भी दिखाई देता है और वह है शिक्षा की गुणवत्ता।
इस संदर्भ में देखें तो वर्तमान में देश में लगभग 14.7 लाख सरकारी स्कूल, 24 करोड़ से अधिक विद्यार्थी और करीब एक करोड़ शिक्षक हैं। आकार के लिहाज से यह दुनिया की सबसे बड़ी स्कूली शिक्षा व्यवस्थाओं में से एक है। मगर इतनी विशाल व्यवस्था का वास्तविक मूल्यांकन भवनों, योजनाओं और नामांकन से नहीं, बल्कि इस कसौटी पर होना चाहिए कि क्या बच्चों को वास्तव में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिल पा रही है?
नीति आयोग की ओर से हाल में जारी एक रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत ने स्कूलों तक पहुंच की लड़ाई काफी हद तक जीत ली है, लेकिन गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की लड़ाई अब भी अधूरी है।
रिपोर्ट से पता चलता है कि देश में आज भी एक लाख से अधिक विद्यालय ऐसे हैं, जहां केवल एक शिक्षक है। यह सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि भारतीय शिक्षा व्यवस्था के कमजोर पक्ष का आईना है। इन स्कूलों में एक ही शिक्षक पहली से पांचवीं तक की कक्षा के विद्यार्थियों को पढ़ाता है, जिसके ऊपर मध्याह्न भोजन की निगरानी, सरकारी पोर्टलों पर डेटा अपलोड करने और प्रशासनिक कार्यों की जिम्मेदारी भी है। हम अक्सर यह भूल जाते हैं कि शिक्षक सिर्फ पाठ्य पुस्तकें नहीं पढ़ाते, वे सीखने का वातावरण भी रचते हैं। वे जिज्ञासा को दिशा देते हैं, बच्चों में आत्मविश्वास जगाते हैं और कक्षा को संवाद का जीवंत मंच बनाते हैं। मगर जब वही शिक्षक मूल उद्देश्य से इतर कार्यों में उलझ जाता है, तो कक्षा में ज्ञान का संवाद स्वाभाविक रूप से कमजोर पड़ता है। शिक्षा तब सीखने और सिखाने के बजाय पाठ्यक्रम पूरा करने की प्रक्रिया बनकर रह जाती है।
नीति आयोग की रिपोर्ट का एक अन्य पहलू छोटे स्कूलों पर केंद्रित है। देश के लगभग 35 फीसद विद्यालयों में पचास से कम विद्यार्थी हैं। इनमें से हजारों स्कूल ऐसे हैं, जहां दस से भी कम बच्चे पढ़ते हैं। पहली नजर में यह दूरस्थ इलाकों तक शिक्षा पहुंचाने का प्रमाण लगता है, लेकिन यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि इतने छोटे और अलग-थलग स्कूलों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षण कैसे संभव होगा? बहुस्तरीय कक्षाएं, सीमित संसाधन, कभी शिक्षक की अनुपस्थिति, कभी विषय विशेषज्ञों का अभाव- ये सब मिलकर शिक्षा को सिर्फ बच्चों की उपस्थिति तक सीमित कर देते हैं। ग्रामीण और जनजातीय क्षेत्रों में यह चुनौती और गहरी हो जाती है, जहां कई स्थानों पर स्कूल भवन मौजूद हैं, लेकिन प्रयोगशालाएं नहीं हैं। कंप्यूटर हैं, इंटरनेट नहीं, पुस्तकालय हैं, नियमित पठन संस्कृति नहीं। यानी शिक्षा का ढांचा खड़ा है, पर उसके भीतर सीखने की आत्मा अभी भी कमजोर दिखाई देती है।
देश की स्कूली शिक्षा व्यवस्था को लेकर हाल के वर्षों में आई विभिन्न रिपोर्ट में यही संकेत दिया गया है कि शिक्षा की गुणवत्ता आज भी चिंता का विषय बनी हुई है। तीसरी-चौथी कक्षा का बच्चा दूसरी कक्षा का पाठ सहजता से नहीं पढ़ पा रहा। पांचवीं कक्षा के विद्यार्थियों का एक बड़ा हिस्सा सरल भाग, प्रतिशत या अनुपात जैसी बुनियादी गणितीय समझ में संघर्ष करता दिखाई देता है। इसलिए स्कूलों में केवल नामांकन बढ़ाना पर्याप्त नहीं, सीखना शिक्षा का असली पैमाना है। यह स्थिति उस बुनियादी संकट का संकेत है, जो आगे चलकर माध्यमिक शिक्षा, उच्च शिक्षा और रोजगार क्षमता तीनों को प्रभावित करता है। जब नींव कमजोर होती है, तो आगे की पूरी शैक्षिक संरचना अस्थिर हो जाती है। यही कारण है कि आज उद्योग जगत भी युवाओं में कौशल के अभाव की बात करता है।
दो दशक पहले की बात की जाए, तो तब देश के अधिकांश बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ते थे। मगर आज स्थिति बदल रही है। वर्ष 2005 में जहां लगभग 71 फीसद बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ते थे, वहीं 2024-25 में यह आंकड़ा घटकर 49.24 फीसद रह गया है। यानी सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों का अनुपात आधे से नीचे चला गया है।
ग्रामीण परिवार, जो कभी सरकारी विद्यालय को स्वाभाविक विकल्प मानते थे, अब सीमित आय के बावजूद निजी स्कूलों की ओर देख रहे हैं। यह केवल विकल्प में परिवर्तन नहीं, बल्कि भरोसे के संकट को दर्शाता है। अभिभावक अक्सर अंग्रेजी माध्यम, अनुशासन, नियमित उपस्थिति और अपेक्षाकृत बेहतर जवाबदेही को निजी स्कूलों से जोड़कर देखते हैं, भले ही वास्तविक गुणवत्ता हर जगह समान न हो। यह प्रवृत्ति विशेष रूप से चिंताजनक है, क्योंकि सरकारी विद्यालय ही सामाजिक न्याय, अवसर की समानता और लोकतांत्रिक शिक्षा के सबसे बड़े माध्यम रहे हैं। यदि इन संस्थानों पर भरोसा कम होता है, तो शिक्षा के साथ लोकतंत्र की बुनियाद भी कमजोर होती है।
शिक्षा के माध्यमिक स्तर पर स्थिति और चुनौतीपूर्ण हो जाती है। नीति आयोग की रिपोर्ट बताती है कि प्राथमिक स्तर पर बच्चों को स्कूल तक लाने में तो सफलता मिली है, लेकिन जैसे-जैसे कक्षाएं ऊपर की ओर जाती हैं, बच्चे छूटते जाते हैं। माध्यमिक स्तर पर स्कूल छोड़ने की दर ग्यारह फीसद से अधिक है। विशेष रूप से लड़कियां, आदिवासी समुदाय और प्रवासी एवं आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के बच्चे सबसे पहले स्कूली शिक्षा से बाहर होते हैं। इसके पीछे केवल आर्थिक कारण ही नहीं हैं, बल्कि किशोरावस्था में सामाजिक दबाव, बाल विवाह, सुरक्षित परिवहन की कमी, विज्ञान और गणित शिक्षकों का अभाव, स्थानीय स्तर पर करिअर मार्गदर्शन की कमी और परिवारों का जागरूक न होना भी इस संकट को गहरा करता है। इसके अलावा शिक्षकों के खाली पद वर्षों तक नहीं भरे जाते। कई राज्यों में अतिथि शिक्षक और संविदा शिक्षक व्यवस्था को स्थायी समाधान बनाया जा रहा है।
ऐसे में शिक्षकों की समयबद्ध नियुक्ति, छोटे स्कूलों का तर्कसंगत पुनर्गठन, स्कूल नेतृत्व को मजबूत करना, डिजिटल संसाधनों का प्रभावी उपयोग, सीखने के परिणामों की नियमित निगरानी और शिक्षकों के निरंतर प्रशिक्षण जैसे ठोस कदम उठाने की जरूरत है। असली बदलाव तब होगा, जब जिला शिक्षा कार्यालय से लेकर कक्षा-कक्ष तक जवाबदेही की संस्कृति आकार लेगी। विडंबना यह है कि देश में शिक्षा सुधार का संकट नीति का कम और क्रियान्वयन का अधिक रहा है। योजनाएं बनती हैं, बजट स्वीकृत होते हैं, लक्ष्य तय होते हैं, लेकिन जमीन पर उनका असर प्रभावी एवं समान रूप से नहीं दिखाई देता। भारत वर्ष विकसित राष्ट्र बनने का सपना देख रहा है। मगर कोई भी राष्ट्र शिक्षा की गुणवत्ता के बिना विकास की दौड़ में आगे नहीं निकल सकता। सड़कें, मेट्रो-रेल सेवाएं, डिजिटल सुविधाएं और औद्योगिक निवेश विकास की पहचान हो सकते हैं, मगर बेहतर भविष्य की नींव तो विद्यालयों में ही तैयार होती है।
