देश की आर्थिक स्थिति मई, 2026 के आखिर तक काफी खराब थी। जून की शुरुआत में सरकारी गतिविधियों में हड़बड़ी नजर आई। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआइ) ने एक अहम कदम उठाया- सरकारी बांड के लिए पूर्णत: सुलभ मार्ग (एफएआर) का दायरा बढ़ाया गया, ताकि विदेशी निवेशक नए 15-साल, 30-साल और 40-साल वाले सरकारी बांड में निवेश कर सकें।

इसके अलावा, विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों पर लगी कई सीमाएं और पाबंदियां हटा दी गईं। साथ ही, सरकार ने एक अध्यादेश जारी करके विदेशी निवेशकों को बांड की बिक्री पर दीर्घकालिक पूंजीगत लाभ कर (12.5 फीसद) और स्रोत पर कर (20 फीसद ) से छूट दे दी। आरबीआइ ने बैंकों को ‘हेजिंग’ यानी जोखिम से बचने की लागत वहन करने के लिए उदार प्रस्ताव के साथ एफसीएनआर (बी) जमा आकर्षित करने की भी अनुमति दे दी।

ये उपाय आजमाए और परखे हुए हैं। इनसे विदेशी मुद्रा का प्रवाह बढ़ने की उम्मीद है:

अनुमान है कि इससे विदेशी मुद्रा भंडार को बढ़ाने के लिए 30-40 अरब अमेरिकी डालर या शायद इससे भी अधिक की राशि आएगी। इससे रुपए की गिरावट को रोका जा सकता है:

रुपए में गिरावट प्रधानमंत्री के लिए एक राजनीतिक मुद्दा बन गया था, जिन्होंने वर्ष 2014 में वादा किया था कि रुपया-डालर विनिमय दर को 40 रुपए पर नियंत्रित किया जाएगा (ठीक वैसे ही जैसे राजा कैन्यूट ज्वार को रुकने का आदेश दे रहे हों!)।

दूसरा विकल्प नहीं

इन कदमों में जोखिम हैं। मगर हमें अभी जोखिमों पर ज्यादा सोचने की जरूरत नहीं है, क्योंकि सरकार और आरबीआइ के पास कोई दूसरा विकल्प नहीं था। कुछ न करने का जोखिम ज्यादा बड़ा था।

सरकार कई महीनों तक सच्चाई से इनकार करती रही, खासकर ट्रंप- शुल्क लागू होने, अमेरिका-इजराइल बनाम ईरान युद्ध, तेल की कीमतों में अचानक उछाल और आपूर्ति शृंखला बाधित होने के बाद से। विदेशी निवेशक भारत में निवेश करने से हिचकिचा रहे थे। इसके नतीजे आंकड़ों में दिख रहे थे, फिर भी सरकार ने चेतावनी संकेतों पर ध्यान नहीं दिया:

चालू खाता घाटा (सीएडी) हर महीने बढ़ रहा था और माना जा रहा है कि वर्ष 2025-26 का घाटा 25 अरब अमेरिकी डालर से ज्यादा पहुंच गया होगा। चिंता की बात यह भी है कि इस साल के लिए वस्तुओं के व्यापार घाटे का अनुमान 333 अरब अमेरिकी डालर है और सोने के आयात का अनुमान 72 अरब अमेरिकी डालर है। यानी हमें पता है कि असल समस्या कहां है।

शुद्ध विदेशी निवेश सिर्फ 6.9 अरब अमेरिकी डालर था, जो भारतीय अर्थव्यवस्था और शेयर बाजार की संभावनाओं में विदेशी निवेशकों के भरोसे की कमी को दिखाता है। वर्ष 2025-26 के ज्यादातर महीनों में विदेशी निवेशक भारतीय इक्विटी बाजार में शुद्ध विक्रेता रहे, और मार्च 2026 में यह आंकड़ा 1,17,775 करोड़ रुपए के ऊंचे स्तर पर पहुंच गया।

स्थिर कीमतों पर सकल स्थायी पूंजी निर्माण (जीएफसीएफ) वर्ष 2022-23 से 32.3 फीसद पर ही अटका हुआ है। जीएफसीएफ सरकारी, घरेलू (रियल एस्टेट और निर्माण) और निजी क्षेत्र के बीच लगभग बराबर बंटा हुआ है। समझाने-बुझाने, मनाने, चेतावनी देने और निवेश सम्मेलनों के बावजूद निजी क्षेत्र निवेश बढ़ाने को तैयार नहीं है, खासकर विनिर्माण में। राजग के शासनकाल में कई वर्षों से स्थिर कीमतों पर जीवीए यानी सकल मूल्य संवर्धन (जीडीपी = जीवीए शुद्ध वस्तु कर) में विनिर्माण का हिस्सा 17 फीसद पर ही अटका हुआ है।

मजबूत नहीं कमजोर

आरबीआइ के मासिक बुलेटिन और वित्त मंत्रालय की मासिक समीक्षाओं ने एक तरह की बेफिक्री पैदा कर दी थी। कई जानकार अर्थशास्त्रियों ने इस बात की ओर इशारा किया कि ये दोनों रिपोर्टें जरूरत से ज्यादा उम्मीद जगाने वाली थीं और इन्होंने असल स्थिति और संभावित खतरों को छिपा दिया। सरकार के प्रवक्ता लगातार ‘मजबूती’ शब्द का इस्तेमाल कर रहे थे, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि यह शब्द असल में ‘कमजोरी’ को छिपाने का एक आवरण था।

हो सकता है कि सरकार इन उपायों को ही पर्याप्त मान लें, लेकिन ऐसा किया गया तो यह एक बड़ी चूक होगी। ‘इंडिया टुडे’ की मार्या शकील को दिए एक साक्षात्कार में मुख्य आर्थिक सलाहकार अनंत नागेश्वरन ने सरकार की मौजूदा सोच के बारे में बताया। सोने के आयात पर पाबंदियां लगाने के सवाल पर उन्होंने सीधा जवाब देने से परहेज किया और कहा कि उन्हें इसके बारे में ‘जानकारी नहीं’ है।

वे मुख्य सलाहकार हैं, तो निश्चित रूप से इस विषय पर उनका अपना दृष्टिकोण होगा और उन्होंने अपनी सलाह भी दी होगी। जाहिर है, वे सार्वजनिक रूप से कुछ भी कहने से बच रहे हैं, क्योंकि उन्हें वर्ष 2013-14 में नरेंद्र मोदी के कहे शब्द याद हैं (‘वित्त मंत्री आपका मंगलसूत्र चुरा रहे हैं’), जब तत्कालीन सरकार ने सोने के आयात पर कड़ी पाबंदियां लगाई थीं। मुझे डर है कि सरकार के पास सोने के आयात की रफ्तार को धीमा करने के अलावा कोई और चारा नहीं है।

चुनौतियों को स्वीकारें

सरकार को यह मानना होगा कि घरेलू ऋण बढ़ा है (जीडीपी का 41 फीसद), जबकि घरेलू वित्तीय बचत कम हुई है (जीडीपी के छह फीसद से कम), और खर्च में गिरावट आई है (सिवाय उन कुछ लोगों के जो विलासिता की वस्तुएं खरीदते हैं)। सरकार को सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय और अन्य मंत्रालयों की ओर से ‘उपलब्धियों’ के बारे में बताए गए अपने फायदे वाले आंकड़ों पर भरोसा नहीं करना चाहिए।

उसे लोगों के हाथों में अधिक पैसा पहुंचाने के उपाय करने होंगे। ऐसा करने के कई तरीके हैं: महंगाई के हिसाब से न्यूनतम मजदूरी बढ़ाना, खपत पर कर कम करना, दिखावटी और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाली ग्रेट निकोबार बंदरगाह एवं हवाई अड्डा जैसी परियोजनाओं को रद्द करना, शिक्षा के लिए कर्ज बढ़ाना, मनरेगा जैसी श्रम-प्रधान योजनाओं को फिर से शुरू करना और वर्ष 2025-26 के विपरीत, पीने के पानी, गांव की सड़कों, ग्रामीण विकास योजनाओं और शहरी आवास के लिए आबंटित धनराशि को पूरी तरह से खर्च करना।

केंद्र सरकार को स्वीकृत पदों पर रिक्तियों को भरना होगा और राज्यों को भी ऐसा करने के लिए प्रेरित करना होगा- खासकर तृतीय और चतुर्थ श्रेणी के पदों, चिकित्सकों, शिक्षकों, नर्सों, पुलिस और केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों में जवानों और रेलवे में कर्मचारियों के खाली पदों को भरना चाहिए, मध्य वर्ग और निम्न-मध्य वर्ग के युवाओं की उम्मीद इन्हीं नौकरियों से जुड़ी हुई है।

सरकार के सामने ऐसे लक्ष्य हैं, जो लोगों में जोश और उम्मीद पैदा कर सकते हैं। प्रधानमंत्री मोदी को अपनी ऊर्जा उन लक्ष्यों को हासिल करने में लगानी चाहिए, न कि समाज को बांटने वाले, ध्रुवीकरण करने वाले और बेकार के लक्ष्यों के पीछे अपना समय बर्बाद करना चाहिए।

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पश्चिम एशिया में जारी युद्ध और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के बंद होने से दुनिया भर में तेल सप्लाई पर बड़ा असर पड़ रहा है। शुरुआत में जितनी परेशानी की आशंका थी, अब स्थिति उससे ज्यादा गंभीर होती दिख रही है। इसका सबसे बड़ा असर भारत जैसे देशों पर पड़ सकता है, जो अपनी जरूरत का ज्यादातर तेल विदेशों से खरीदते हैं। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक