भारत आज विश्व की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में से एक के रूप में स्थापित हो चुका है। वैश्विक स्तर पर भू-राजनीतिक तनाव, आपूर्ति शृृंखला में व्यवधान और बढ़ती महंगाई जैसी चुनौतियों के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था ने जिस प्रकार से लचीलापन दिखाया है, वह काबिलेगौर है। पिछले एक दशक में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में वृद्धि, बुनियादी ढांचे का विस्तार और सेवा क्षेत्र की मजबूती से वैश्विक आर्थिक परिदृश्य में भारत की साख भी मजबूत हुई है। मगर, इस चमकदार तस्वीर के पीछे एक गहरी चिंता भी छिपी हुई है और वह है व्यापक असमानता की। यानी आर्थिक विकास के लाभ समाज के सभी वर्गों तक समान रूप से नहीं पहुंचे हैं। एक ओर समृद्ध वर्ग अपनी आय और संपत्ति में निरंतर वृद्धि देख रहा है, दूसरी ओर निम्न आय वर्ग अभी भी संघर्षरत है। यह स्थिति आर्थिक प्रगति और सामाजिक न्याय के बीच बढ़ती खाई को दर्शाती है, जो देश के विकास की स्थिरता और समावेशिता पर गंभीर प्रश्न खड़े करती है।
हाल के वर्षों में ‘के-आकार की रिकवरी’ (के-शेप्ड रिकवरी) शब्द काफी चर्चा में रहा है। इसका अर्थ है कि किसी आर्थिक संकट के बाद समाज के विभिन्न वर्ग अलग-अलग गति से उबरते हैं। भारत में यह परिघटना स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। कोरोना महामारी के बाद बड़े उद्योग, निगमित घराने और उच्च आय वर्ग तेजी से उबर गए। शेयर बाजारों में उछाल आया, डिजिटल अर्थव्यवस्था का विस्तार हुआ और उच्च कौशल वाले लोगों के लिए अवसर बढ़े। इसके विपरीत, छोटे व्यवसाय, दिहाड़ी-मजदूर और असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों को भारी नुकसान उठाना पड़ा। यह विभाजन समाज को दो भागों में बांट देता है- एक जो तेजी से ऊपर जा रहा है और दूसरा जो पीछे छूटता जा रहा है। यही कारण है कि समावेशी विकास अब एक अनिवार्यता बन चुका है।
भारत में आय और संपत्ति का असंतुलन चिंताजनक स्तर तक पहुंच चुका है। समाज का एक खास और छोटा-सा वर्ग देश की अधिकांश संपत्ति पर अधिकार रखता है, जबकि बड़ी आबादी के पास बहुत सीमित संसाधन हैं। शीर्ष दस फीसद लोगों के पास राष्ट्रीय आय और संपत्ति का बड़ा हिस्सा केंद्रित है, जबकि निचले पचास फीसद लोगों की हिस्सेदारी बहुत कम है। यह केवल बाजार की स्वाभाविक प्रक्रिया का परिणाम नहीं है, बल्कि शिक्षा, रोजगार और संसाधनों तक असमान पहुंच का नतीजा है। वित्तीय बाजारों और जमीन-जायदात कारोबार के बढ़ते प्रभाव ने इस असमानता को और गहरा किया है। जिनके पास पहले से संपत्ति थी, उसमें तेजी से बढ़ोतरी हुई है, जबकि जिनके पास संसाधन नहीं थे, वे और पीछे रह गए। यह स्थिति दीर्घकालिक सामाजिक और आर्थिक अस्थिरता को जन्म दे सकती है।
देश का मध्यम वर्ग, जिसे अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है, वह आज कई तरह की चुनौतियों का सामना कर रहा है। बढ़ती महंगाई, सीमित वेतन वृद्धि और रोजगार की अनिश्चितता ने इस वर्ग की आर्थिक स्थिति को प्रभावित किया है। मध्यवर्ग बचत, निवेश और मांग को आगे बढ़ाता है। अगर यह वर्ग कमजोर होता है, तो इसका सीधा असर पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।
भारत में असमानता केवल आंतरिक कारणों से नहीं, बल्कि वैश्विक परिस्थितियों से भी प्रभावित होती है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव, व्यापारिक तनाव और आर्थिक अनिश्चितता भारत की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करती हैं। घरेलू स्तर पर भी कई संरचनात्मक समस्याएं हैं, जैसे ग्रामीण-शहरी अंतर, क्षेत्रीय असमानता और असंगठित क्षेत्र का पिछड़ना। हालांकि सरकार की ओर से डिजिटल और बुनियादी ढांचे के क्षेत्र में किए गए प्रयासों से नए अवसर पैदा हुए हैं, लेकिन इनके लाभ सभी तक समान रूप से नहीं पहुंचे हैं। इससे साफ है कि असमानता एक जटिल समस्या है, जिसे हल करने के लिए बहुआयामी दृष्टिकोण की जरूरत है।
देश की आर्थिक वृद्धि के बावजूद रोजगार सृजन अपेक्षाकृत तेजी से नहीं हो पाया है। देश की बड़ी आबादी आज भी असंगठित क्षेत्र में कार्यरत है, जहां न तो स्थायी आय होती है और न ही सामाजिक सुरक्षा। कोरोना महामारी ने इस कमजोरी को उजागर किया, लाखों लोगों ने अपनी नौकरियां खो दीं और उन्हें अपने गांवों की ओर लौटना पड़ा। यह स्थिति बताती है कि भारत की अर्थव्यवस्था में रोजगार का ढांचा कितना अस्थिर है। ऐसे में समाधान के लिए श्रम-प्रधान उद्योगों को बढ़ावा देना, कौशल विकास को मजबूत करना और रोजगार को औपचारिक रूप देना आवश्यक है।
समाज में असमानता को कम करने में शिक्षा और कौशल की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है, लेकिन भारत में इस क्षेत्र में भी कई चुनौतियां हैं। हालांकि शिक्षा तक पहुंच बढ़ी है, लेकिन गुणवत्ता में भारी अंतर है। ग्रामीण क्षेत्रों और गरीब वर्गों के विद्यार्थियों को उचित संसाधन, बेहतर प्रशिक्षित शिक्षक और आधुनिक सुविधाएं नहीं मिल पातीं। इसके अलावा उद्योगों की जरूरत और शिक्षा प्रणाली के बीच तालमेल की कमी भी एक बड़ी समस्या है। इससे बेरोजगारी और कौशल की कमी दोनों बढ़ती हैं। अगर देश को समावेशी विकास के पथ पर आगे बढ़ाना है, तो शिक्षा और कौशल में निवेश को प्राथमिकता देनी होगी।
यहां महिलाओं की आर्थिक भागीदारी अभी भी बहुत सीमित है। सामाजिक मान्यताएं, सुरक्षा की चिंताएं और कार्यस्थल पर सुविधाओं की कमी महिलाओं के लिए बाधा बनती हैं। इसके अलावा, शिक्षा और वित्तीय संसाधनों तक पहुंच में भी लैंगिक असमानता है। यदि महिलाओं को समान अवसर दिए जाएं, तो वे न केवल अपनी स्थिति सुधार सकती हैं, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था में भी अहम योगदान दे सकती हैं।
असमानता को कम करने में सरकार की नीतियों की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। प्रगतिशील कर प्रणाली के साथ ही स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा पर खर्च बढ़ाना जरूरी है, ताकि कमजोर वर्गों को सहारा मिल सके। इन नीतियों का क्रियान्वयन पारदर्शी और प्रभावी होना चाहिए, ताकि उनका वास्तविक लाभ जरूरतमंदों तक पहुंचे।
देश में बुनियादी ढांचे के विकास पर जोर दिया जा रहा है, जो आर्थिक वृद्धि के लिए जरूरी भी है। सड़कें, रेल, हवाई अड्डे और डिजिटल नेटवर्क देश की प्रगति को गति देते हैं, लेकिन इसके साथ ही सामाजिक क्षेत्रों जैसे स्वास्थ्य, शिक्षा और पोषण में निवेश भी उतना ही जरूरी है। अगर केवल भौतिक विकास पर ध्यान दिया जाए और मानव विकास की उपेक्षा की जाए, तो प्रगति अधूरी ही रह जाएगी।
भारत को समावेशी विकास के लिए व्यापक नीति सुधारों की जरूरत है। इसमें श्रम कानूनों को मजबूत करना, छोटे व्यवसायों को ऋण सुविधा और सामाजिक सुरक्षा को विस्तार देना भी शामिल है। इसके साथ ही पिछड़े क्षेत्रों के विकास पर ध्यान देना और उद्यमिता को प्रोत्साहित करना जरूरी है।
देश की विकास यात्रा भले ही देखने में चमकदार है, लेकिन इसका असली मूल्य तभी समझा जाएगा, जब यह सभी के लिए समान अवसर और समृद्धि लेकर आए। असमानता को कम करने के लिए आर्थिक, सामाजिक और संस्थागत स्तर पर निरंतर प्रयास जरूरी हैं। भारत की आर्थिक प्रगति उसकी क्षमता और दृढ़ता का प्रमाण है, लेकिन असमानता को नजरअंदाज किया गया, तो यह प्रगति टिकाऊ नहीं रह पाएगी। विकास और समानता के बीच संतुलन बनाना केवल एक नैतिक दायित्व नहीं, बल्कि आर्थिक जरूरत भी है। यही संतुलन देश के उज्ज्वल और समावेशी भविष्य की कुंजी बन सकता है।
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विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित में महिलाओं की असीम क्षमता को देखते हुए, उनके योगदान को सम्मानित करने तथा उनके सामने आने वाली बाधाओं को दूर करने के लिए विश्व स्तर पर पहल हो रही है। इसका उद्देश्य अधिक समावेशी और विविध वैज्ञानिक समुदाय का निर्माण करना है। यह प्रयास इन महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों में सभी प्रतिभाओं का लाभ उठाने की प्रतिबद्धता को रेखांकित करता है। इससे अन्वेषण का मार्ग निकल रहा है। फिर भी महिलाओं को कई जटिल चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, जो उनकी प्रगति में बाधाएं उत्पन्न कर रहा है। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक
