Drugs Addiction: उस व्यक्ति की त्रासदी का बस अंदाजा ही लगाया जा सकता है, जिसका बेटा नशे का आदी हो चुका है। इसी वजह से उसकी पढ़ाई छूट चुकी है और अब वह दिन भर कंप्यूटर गेम खेलता रहता है या दिन भर ट्रक के अड्डे पर जुआ खेलता रहता है।
पिता इसलिए परेशान हैं कि वह अब उसके मादक पदार्थों पर भी हाथ साफ करने लगा है और उसे अपने बेटे के भविष्य का अनुमान है और अब वह इसी को लेकर फिक्रमंद है। हालांकि खुद पचास का पिता भी नशे के जाल में इस कदर फंसा हुआ है, उसके हाथ कांपने लगे हैं और वह ठीक से खड़ा भी नहीं हो पाता है।
बीते कुछ महीने के भीतर ऐसे मामले अब तेजी से बढ़ने लगे हैं। जिनका नशे की लत की वजह से सब कुछ बर्बाद हो चुका है, वैसे लोग अब परामर्श और आपात हस्तक्षेप तक के लिए मनोचिकित्सकों या काउंसलरों के पास पहुंचने लगे हैं। संकट की भयावहता के चलते केंद्र सरकार अब नशा मुक्त भारत अभियान की बात कर रही है और राज्यों के मुख्यमंत्री भी नशाखोरी के विरुद्ध बड़ी-बड़ी रैलियां कर रहे हैं।
युवाओं को शपथ दिलवाया जा रहा है, स्कूल-कालेजों को नशे के विरुद्ध माहौल बनाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। वहीं नशे के खिलाफ लड़ाई के लिए पुलिस प्रशासन को चुस्त-दुरुस्त किया जा रहा है तथा बड़े पैमाने पर मादक पदार्थों के तस्करों के खिलाफ कार्रवाई की जा रही है। मगर इसी बीच यह खबर भी आती है कि पंजाब में एक ग्रामीण ने जब मादक पदार्थों की धड़ल्ले से आपूर्ति पर सवाल उठाया, तो उसे प्रताड़ित किया गया और आखिर उसने आत्महत्या कर ली।
सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय द्वारा एम्स के ‘नेशनल ड्रग डिपेंडेंस ट्रीटमेंट सेंटर’ के सहयोग से जारी की गई आधिकारिक रिपोर्ट ‘मैग्नीट्यूड आफ सब्सटेंस यूज इन इंडिया’ के आंकड़े यह स्पष्ट करते हैं कि मादक पदार्थों की खरीद-बिक्री और नशे की समस्या अब केवल कुछ महानगरों या सीमावर्ती क्षेत्रों तक सीमित नहीं रही। यह एक सर्वव्यापी राष्ट्रीय स्वास्थ्य आपातकाल और सामाजिक संकट का रूप ले चुकी है।
रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 10 से 75 वर्ष की आयु वर्ग के बीच लगभग 16 करोड़ लोग शराब का सेवन करते हैं, जिनमें से 5.7 करोड़ से अधिक लोगों को तत्काल चिकित्सीय उपचार की आवश्यकता है। वहीं, लगभग 3.1 करोड़ लोग भांग, गांजा या चरस जैसे कैनबिस उत्पादों का इस्तेमाल कर रहे हैं। सबसे चिंताजनक स्थिति ओपियोइड्स (अफीम, हेरोइन और सिंथेटिक ड्रग्स) के मामले में है।
भारत में ओपियोइड का उपयोग वैश्विक औसत से लगभग तीन गुना अधिक है। देश में करीब 2.26 करोड़ ओपियोइड उपयोगकर्ता हैं, जिनमें से साठ लाख से अधिक लोग इस लत के गंभीर दुश्चक्र में फंस चुके हैं। इससे भी अधिक विचलित करने वाला तथ्य यह है कि देश के लगभग 1.7 फीसद बच्चे और किशोर (यानी करीब अठारह लाख बच्चे) ‘इन्हेलेंट्स’ यानी सूंघने वाले नशे जैसे थिनर, फ्लूइड, सरेष आदि के जाल में फंस चुके हैं।
हाल के वर्षों में एमडीएमए, मेथमफेटामाइन और अवैध दवाओं (सिंथेटिक ओपियोइड्स) की मांग और जब्ती में आया भारी उछाल यह साबित करता है कि नशे का बाजार अब पारंपरिक से बदलकर अत्यधिक घातक रासायनिक स्वरूप अख्तियार कर चुका है। मादक पदार्थों की यह विभीषिका पूरे देश में फैली है, लेकिन भौगोलिक और सामरिक कारणों से कुछ राज्य इसके गढ़ बन गए हैं।
मिजोरम, नगालैंड, अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम और मणिपुर जैसे उत्तर-पूर्वी राज्य ओपियोइड और नशीली दवाओं से सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। दूसरी ओर, पंजाब, हरियाणा और दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र सिंथेटिक मादक पदार्थों और हेरोइन का एक बड़ा केंद्र बन चुका है। दरअसल, भारत दुनिया के दो सबसे बड़े अवैध अफीम उत्पादक क्षेत्रों के बीच फंसा हुआ है। इसके पश्चिम में ‘गोल्डन क्रिसेंट’ (पाकिस्तान, अफगानिस्तान और ईरान) है और पूर्व में ‘गोल्डन ट्रायंगल’ (म्यांमार, लाओस और थाईलैंड) है।
इससे भारत न केवल मादक पदार्थों की तस्करी के लिए एक प्रमुख ‘ट्रांजिट रूट’ बना, बल्कि धीरे-धीरे एक विशाल उपभोक्ता बाजार में भी तब्दील हो गया। वर्तमान में डार्कवेब, क्रिप्टोकरेंसी और ड्रोन तकनीक के माध्यम से होने वाली उच्च-तकनीक तस्करी के संजाल ने इस चुनौती को कई गुना बढ़ा दिया है। नशे की लत से पीड़ित व्यक्ति को केवल एक ‘अपराधी’ या ‘चरित्रहीन’ के चश्मे से देखना हमारी भूल होगी। चिकित्सा विज्ञान के अनुसार मादक पदार्थों या ड्रग की लत एक मानसिक बीमारी है।
शुरुआत में युवा वर्ग गलाकाट प्रतिस्पर्धा, करिअर की अनिश्चितता, बेरोजगारी जनित अवसाद या सहकर्मियों के दबाव के कारण अनजाने में इस दलदल में कदम रखता है, लेकिन धीरे-धीरे रासायनिक निर्भरता के कारण व्यक्ति का अपने मस्तिष्क पर नियंत्रण नहीं रहता। जब कोई व्यक्ति इस लत से बाहर निकलना चाहता है, तो सबसे बड़ी बाधा ‘विड्राल सिम्प्टम्स’ यानी तड़प और शारीरिक कष्ट तथा समाज में व्याप्त ‘सामाजिक लांछन’ बनते हैं। सामाजिक बहिष्कार के डर से पीड़ित या उसका परिवार समय पर मदद मांगने या नशामुक्ति केंद्र जाने से कतराता है।
परिणामत: यह समस्या बंद कमरों के भीतर ही सुलगती रहती है और आखिरकार आत्महत्या या गंभीर अपराधों के रूप में सामने आती है। महंगी लत को पूरा करने के लिए युवा वर्ग चोरी, झपटमारी और यहां तक कि जघन्य अपराधों की राह पकड़ लेता है। इस महामारी से निपटने के लिए वर्तमान में आपूर्ति, मांग और नुकसान में कमी की त्रिआयामी रणनीति पर काम किया जा रहा है।
एक ओर कड़े एनडीपीएस अधिनियम के तहत तस्करों की गिरफ्तारियां कर संपत्तियां कुर्क की जा रही हैं, तो दूसरी ओर देश में सरकारी ओर मान्यता प्राप्त नशामुक्ति केंद्रों की संख्या बढ़ा कर 780 से अधिक की गई है, जिनके माध्यम से 8.20 लाख से अधिक लोगों को इलाज और पुनर्वास का लाभ मिल चुका है। मगर कड़े कानूनों और पुलिसिया कार्रवाइयों की अपनी एक सीमा है। वे केवल आपूर्ति को बाधित कर सकते हैं।
जब तक समाज के भीतर से नशीले पदार्थों की मांग समाप्त नहीं होगी, यह जंग अधूरी रहेगी। हमें ‘जेल नहीं, इलाज’ और ‘सहानुभूति, न कि तिरस्कार’ के सिद्धांत को अपनाना होगा। उत्तराखंड के देहरादून में एक गांव की महिलाओं ने जिस तरह मोर्चा थामा है, वह काबिले-तारीफ है। प्राथमिक स्तर पर ही स्कूलों और कालेजों में नियमित जांच और पेशेवर काउंसलरों की नियुक्ति अनिवार्य होनी चाहिए।
खेलकूद, कला और रचनात्मक गतिविधियों को बढ़ावा देकर युवाओं की ऊर्जा को सकारात्मक दिशा देना आवश्यक है। सबसे महत्त्वपूर्ण भूमिका परिवार की है। माता-पिता को अपने बच्चों के साथ भावनात्मक संवाद स्थापित करना होगा, ताकि बच्चे तनाव के क्षणों में मादक पदार्थ के बजाय परिवार का सहारा लें।
सरकार, नागरिक समाज, मीडिया और परिवारों को एकजुट होकर ‘नशे के विरुद्ध और जिंदगी को हां’ का नारा बुलंद करना होगा। एक नशामुक्त, स्वस्थ और मानसिक रूप से सुदृढ़ युवा पीढ़ी ही सशक्त और आत्मनिर्भर भारत की वास्तविक नींव बन सकती है।
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हमने पढ़ना तो सीख लिया है, लेकिन सावधानी और चेतावनी के संकेतों को समझना एवं उन्हें गंभीरता से लेना अभी भी नहीं सीख पाए हैं। तंबाकू उत्पादों पर डरावनी तस्वीरों के साथ चेतावनी लिखी होती है, मगर उन पर शायद ही कोई ध्यान देता है। अगर नजर पड़ भी जाए, तो उसे अनदेखा कर दिया जाता है। यह कहना उचित नहीं है कि तंबाकू उत्पादों की लत सिर्फ व्यक्तिगत समस्या है, बल्कि इससे समाज भी प्रभावित होता है। पढ़िए पूरी खबर…
