हाल ही में बीजिंग में संपन्न हुई विशेष प्रतिनिधि स्तर की वार्ता में भारतीय राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने चीनी विदेश मंत्री वांग यी से मुलाकात की। इस वार्ता ने इस बात को और भी अधिक पुष्ट कर दिया कि दोनों देशों के बीच शीघ्र सीमा निर्धारण आपसी विश्वास बहाली के लिए कितना अधिक जरूरी है। साथ ही यह वार्ता भारतीय सुरक्षा विशेषज्ञों के समक्ष इस चुनौती को भी रेखांकित करती है कि चीन की विस्तारवादी नीति से किस प्रकार निपटा जाए।

चीन जिस प्रकार ‘सलामी स्लाइसिंग’ जैसी रणनीतियों के माध्यम से दो कदम आगे चलकर एक कदम पीछे हटने की नीति अपनाता है, वह किसी भी पड़ोसी देश के लिए एक चुनौती ही है। भारत ही नहीं, बल्कि अन्य पड़ोसी देश भी उसकी इस नीति से परिचित और परेशान हैं। इसके बावजूद अगर भारत अपने सीमा विवादों के समाधान के लिए आक्रामक साधनों के विपरीत शांतिपूर्ण साधनों को वरीयता देता है, तो वह संघर्षपूर्ण विश्व में एक जिम्मेदार अंतरराष्ट्रीय शक्ति का प्रतीक है।

शांतिपूर्ण वार्ता के माध्यम से विवादों का समाधान भारत की सांस्कृतिक विरासत के अनुरूप है, लेकिन इसके साथ ही चुनौती यह भी है कि क्षेत्रीय सुरक्षा और अखंडता को किस प्रकार सुनिश्चित रखा जाए।

इस विशेष प्रतिनिधि वार्ता में दोनों देशों के बीच आठ-बिंदु परिणाम दस्तावेज पर सहमति बनी, जिसमें दोनों पक्षों ने वास्तविक नियंत्रण रेखा की व्यापक समझ और सीमाई प्रबंधन पर जोर दिया है। इस वार्ता के बाद जो संयुक्त वक्तव्य जारी किया गया, उसमें जमीनी स्तर पर किसी भी मुद्दे से निपटने के लिए कूटनीतिक और सैन्य संचालनों को विकसित करने की बात कही गई है।

इसमें सलाह और सहयोग के लिए कार्यकारी प्रविधि पर जोर दिया गया है। इस आठ-बिंदु के दस्तावेज के ही एक बिंदु में भारत-चीन सीमा पर दो और सीमा कार्मिक बैठक स्थल निर्धारित करने की बात कही गई है। वर्तमान में पश्चिमी और पूर्वी सेक्टर में इस तरह के पांच ऐसे मिलाप स्थल हैं, जिनमें लद्दाख में दो- दौलत बेग ओल्दी और चुशुल, सिक्किम में एक- नाथुला और अरुणाचल प्रदेश में दो- किबिथू और बूम ला में हैं।

वास्तविक नियंत्रण रेखा पर शांति और स्थिरता बनाए रखने में इन मिलाप स्थलों का बहुत महत्त्वपूर्ण योगदान है, जिसमें दोनों देशों की सेनाओं के प्रमुख अफसर आपस में स्थानीय और समय-समय पर उभरे मुद्दों पर बात करते हैं, जिससे गलतफहमियों का दायरा कम हो जाता है और सीमा रक्षक सेनाओं में आत्मविश्वास का संचार होता है।

भारत ने 1996 से ही, जब से दोनों देशों के बीच विश्वास बहाली के उपाय किए गए, वास्तविक नियंत्रण रेखा के बेहतर निर्धारण पर जोर दिया है। विश्वास बहाली किसी भी अप्रिय घटना के बाद बहुत जरूरी होती है। सीमा पर कोई एक भी अवांछनीय घटना सामान्य रिश्तों को पटरी से उतार देती है और उन्हें दशकों पीछे ले जाती है। आपसी रिश्तों में कड़वाहट को दूर करने के लिए विश्वास बहाली बहुत जरूरी हो जाती है।

यह बात भारत-चीन संबंधों के लिए बहुत अधिक प्रासंगिक है। सीमा पर चीन की संदेहास्पद गतिविधियां, चाहे वह डोकलाम हो या गलवान, इसके प्रति संदेह को और भी अधिक मजबूती दे देती हैं। पिछले साल तियानजिन में शंघाई सहयोग संगठन की बैठक में हिस्सा लेते समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने गलवान के बाद उत्पन्न गतिरोध को दूर करने के लिए संकल्प व्यक्त किया था। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के साथ चीनी विदेश मंत्री की यह बैठक इसी क्रम में एक और प्रयास था, इस आशा के साथ कि इससे फिर संस्थागत स्तर पर सीमा विवाद संबंधी वार्ता को गति दी जा सकेगी।

गौरतलब है कि बीजिंग में हुई यह ‘विशेष प्रतिनिधि’ स्तर की वार्ता अपने क्रम में पच्चीसवीं वार्ता थी। इस वार्ता में राजनीतिक प्रतिनिधियों के साथ-साथ सैन्य अफसर भी भाग लेते हैं, जिसमें यह प्रयास किया जाता है कि सीमा विवाद की जटिलता को देखते हुए तकनीकी और कठोर दृष्टिकोण के बजाय राजनीतिक स्तर पर क्या कुछ नम्य और रचनात्मक समाधान खोजे जा सकते हैं। इन्हीं वार्ताओं के क्रम में दोनों देश 2005 में राजनीतिक मानक एवं दिशानिर्देशी सिद्धांत पर सहमत हुए, जो सीमा विवाद के समाधान के लिए आधार प्रदान करेंगे।

प्रश्न यह है कि चीन के तमाम भारत विरोधी प्रयासों को देखते हुए क्या भारतीय जनता में विश्वास बहाली संभव हो पाएगी। क्या भारतीय जनता चीन के नापाक इरादों को दरकिनार कर फिर सामान्य संबंधों के लिए तैयार हो पाएगी? चीन जिस तरह पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर समर्थन देता है, वह किसी से छिपा नहीं है। कश्मीर का प्रश्न हो या आतंकवाद पर रोक लगाने की बात, परमाणु तकनीक का मुद्दा हो या गिलगित-बाल्टिस्तान से गुजरता सीपैक गलियारा, चीन ने सदैव भारत के राष्ट्रीय हितों के विपरीत पाकिस्तान को समर्थन दिया है।

गौरतलब है कि चीन की विदेश नीति जिस सैन्य दर्शन से प्रेरित होती है, उसमें ‘डिसीविंग द हैवन्स टू क्रॉस द ओशन’ एवं ‘मेकिंग अ साउंड इन द ईस्ट देन स्ट्राइक वेस्ट’ जैसी रणनीतियां बहुत आम हैं और चीन के पड़ोसी देशों के साथ सीमा विवादों में देखी भी जा सकती हैं। गौरतलब है कि चीन इसी तरह अपनी समुद्री सीमा में भी विस्तार करता रहा है। चाहे वह कृत्रिम रूप से द्वीप बनाना हो या समुद्र में सैनिक चौकी स्थापित करना हो, दक्षिण और पूर्वी चीन सागर में उसकी विस्तारवादी गतिविधियां किसी से छिपी नहीं हैं।

दक्षिण चीन सागर में वह अपने ऐतिहासिक दावे के अंतर्गत जिस नव-बिंदु रेखा के माध्यम से अपने पड़ोसी देशों के काफी बड़े समुद्री हिस्से पर कब्जा करना चाहता है, उसे संयुक्त राष्ट्र का समुद्री सीमा न्यायिक आयोग 2016 में पूरी तरह से खारिज कर चुका है। इस परिदृश्य में विश्वास का संकट भारत-चीन आपसी संबंधों के सामान्यीकरण के किसी भी प्रयास को निष्फल सिद्ध कर देता है।

यह इस समस्या को भी रेखांकित करता है कि सीमा को बहुत अधिक समय तक असुलझा नहीं रहने दिया जा सकता। अतीत में राजीव गांधी सरकार ने समय की मांग को देखते हुए सीमा विवाद को परे रखकर दोनों देशों के बीच व्यापार संबंधों को बढ़ावा दिया था। उस समय यह कल्पना की गई थी कि व्यापार संबंधों में आई मजबूती सीमा विवाद को सुलझाने में मदद प्रदान कर सकती है। वास्तव में देखा जाए, तो भारत-चीन संबंधों में सीमा को असुलझा रहने देने से जटिलता और अधिक बढ़ी ही है।

संदेहास्पद संबंधों के परिदृश्य में व्यापार संबंध बढ़ाने से परिणाम यह हुआ है कि व्यापार घाटा बढ़ता ही जा रहा है। यहां यह उल्लेखनीय है कि आर्थिक निवेश इस तरह के व्यापार घाटे को कम करने का एक महत्त्वपूर्ण जरिया होता है, जिसमें दोनों देश मिलकर संयुक्त रूप से उत्पादन करते हैं, लेकिन भारतीय नीति निर्माता चीन के सशंकित व्यवहार के कारण भारत में चीनी निवेश को अनुमति नहीं दे पाते हैं।

अब देखना यह है कि ‘विशेष प्रतिनिधि’ स्तर की वार्ता दोनों देशों के आपसी संबंधों को कितना बल प्रदान कर पाती है। जिस प्रकार पूरी दुनिया दो युद्धों की विभीषिकाओं से जूझ रही है, ऐसे समय में अगर ये दो हिमालयी शक्तियां वार्ता के माध्यम से अपने विवाद निपटा पाती हैं, तो यह वैश्विक शांति के लिए एक अमूल्य योगदान होगा।