जापान विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। करीब सवा बारह करोड़ की आबादी वाला यह देश तेजी से बूढ़ा हो रहा है और वर्तमान में यह दुनिया का सबसे बूढ़ा देश है। यहां जन्म दर लगातार गिर रही है और बूढ़ी आबादी तेजी से बढ़ रही है। आज जापान की लगभग तीस फीसद आबादी पैंसठ वर्ष से ज्यादा उम्र की है, यानी हर दस में से एक जापानी बूढ़ा है।

विश्व की विकसित अर्थव्यवस्थाओं में शुमार और उन्नत स्वास्थ्य चिकित्सा सेवाओं के ढांचे पर खड़े इस देश के पांव बुढ़ापे के कारण लड़खड़ा रहे हैं। जन्म दर लगातार घटने की वजह से कामकाजी युवा आबादी कम हो रही है, परिणामस्वरूप विभिन्न क्षेत्रों में काम करने वाले लोगों की कमी का संकट पैदा होने लगा है। इस समस्या से निपटने के लिए जापानी सरकार ‘ऑटोमेशन’ और ‘रोबोटिक्स’ तकनीक को तेजी से विकसित कर रही है। मगर सामाजिक कल्याण एवं चिकित्सा खर्चों के बढ़ते बोझ और सिमटती आय की वजह से जापान पर कर्ज का भार लगातार बढ़ रहा है।

वहीं, तकरीबन 140 करोड़ की आबादी वाले भारत में इस समय विश्व की सबसे ज्यादा युवा आबादी है, जो कुल जनसंख्या का लगभग पैंसठ फीसद है। नवीनतम आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण के मुताबिक, भारत में 15 से 16 फीसद कमाऊ एवं युवा आबादी के पास रोजगार नहीं है। यानी इस समय देश की 36.7 करोड़ युवा आबादी अर्थव्यवस्था में सक्रिय योगदान देने के लिए तैयार है, लेकिन विडंबना यह है कि यहां सबके लिए काम ही नहीं है। इस समय देश में डेढ़ से ढाई करोड़ युवा बेरोजगार हैं और इनमें भी पढ़े-लिखे युवाओं की आबादी ज्यादा है।

सीधे तौर पर कहा जाए, तो वर्तमान में युवा आबादी भी अर्थव्यवस्था में या तो लागत या फिर औसत गुजारे का ही योगदान दे पा रही है। ऐसे में यह सवाल चिंता पैदा करता है कि पच्चीस से तीस साल बाद की तस्वीर क्या होगी? क्योंकि संयुक्त राष्ट्र की ‘इंडिया एजिंग रिपोर्ट-2023’ के मुताबिक, वर्ष 2022 में साठ वर्ष से अधिक आयु के लोगों की संख्या 14.9 करोड़ थी, जो 2050 तक बढ़कर 34.7 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है। यानी पच्चीस साल बाद पांच में से हर एक भारतीय बूढ़ा होगा। साफ है कि विकसित अर्थव्यवस्था के पायदान पर पहुंचने से पहले ही भारत की गिनती बूढ़े देशों में होने लगेगी।

बच्चे और बूढ़े अर्थव्यवस्था पर निर्भर एक ऐसी आबादी है, जिसका बोझ उठाना सरकार और परिवार दोनों की मजबूरी है। बच्चे भविष्य का निवेश हैं, जिनके आने वाले समय में आय में तब्दील होने की उम्मीद है, जबकि बुजुर्ग आबादी केवल बचत का खर्च है। मगर ऐसा सोचकर बुढ़ापे की निर्भरता को भाग्य के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। भविष्य की तैयारी करके इस चुनौती को गंभीर समस्या बनने से रोका जा सकता है।

केंद्र सरकार बजट का लगभग अठारह फीसद हिस्सा स्वास्थ्य, शिक्षा और समाज कल्याण पर खर्च करती है। इसमें से बुजुर्गों से जुड़ी योजनाओं के हिस्से केवल 0.15-0.20 फीसद रकम ही आती है। सरकारी खजाने से 6,645 करोड़ रुपए वृद्धावस्था पेंशन पर खर्च होते हैं, जो गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों को दिए जाते हैं। यह राशि दिखने में भले ही बड़ी लगती है, लेकिन केंद्र की तरफ से प्रति व्यक्ति बुजुर्ग पेंशन के जरिए 200 से 500 रुपए की मामूली सहायता ही मिल पाती है, जिसमें राज्य अपने बजट का बड़ा हिस्सा जोड़कर इसे दो हजार से तीन हजार रुपए तक तय करते हैं। मगर मौजूदा हालात में इतनी कम राशि की मासिक पेंशन के भरोसे क्या गुजारा संभव है?

हालांकि सरकारी बजट पर बुजुर्गों की देखरेख एवं कल्याण के लिए स्वास्थ्य सेवाओं, बीमा और बचत योजनाओं का भी दबाव है। भोजन, आश्रय और चिकित्सा की संयुक्त योजनाओं के अलावा शारीरिक सहायता एवं बुजुर्गों के लिए जीवनयापन में सहायक जरूरी सामान भी सरकार वृद्धों को मुफ्त मुहैया कराती है। अलग-अलग योजनाओं पर सालाना हजारों करोड़ रुपए सरकारी खजाने से खर्च होते हैं।

हालांकि अर्थशास्त्री और नीति-विशेषज्ञ इसे खर्च नहीं, बल्कि सामाजिक सुरक्षा का निवेश मानते हैं, जिसमें पैसा घूमकर खर्च या निवेश के रूप में वापस अर्थव्यवस्था में लौट आता है। मगर यह भी सच है कि सरकारी नीतियों के कागजों से जमीन पर उतरने में कई तरह के रोड़े हैं और योजनाओं की इस चमचमाती तस्वीर से अक्सर अपने घरों की दहलीज पर भूखे, अकेले और बीमार बैठे बुजुर्ग गायब रहते हैं। सरकारी मदद की या तो उन्हें जानकारी ही नहीं होती या फिर इस तक पहुंचना उनके लिए संभव नहीं हो पाता।

एक और दिलचस्प बात यह है कि देश का मध्यम वर्ग अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, जो सबसे ज्यादा कर का बोझ उठाता है। वेतनभोगी और व्यापारिक मध्य वर्ग अपनी कुल आय का लगभग बीस से 45 फीसद विभिन्न तरह के कर के रूप में चुकाता है। इसके बावजूद इस वर्ग को सीधे तौर पर सरकार की तरफ से सामाजिक सुरक्षा या निश्चित बुढ़ापा पेंशन नहीं मिलती। चूंकि यह वर्ग सरकारी मानदंडों में मजबूर, गरीब और निचले तबके में नहीं आता, तो इसे सरकार की कल्याणकारी योजनाओं का भी सहारा नहीं मिलता। यानी इसे अपने वर्तमान और भविष्य की चिंता खुद ही करनी होती है।

अब सवाल यह है कि इस असुरक्षा का दबाव क्या आने वाले वर्षों में अर्थव्यवस्था पर नहीं पड़ेगा? यह भी एक बड़ी समस्या है कि देश में प्रजनन दर बहुत तेजी से गिर रही है, क्योंकि कामकाजी होती युवा पीढ़ी में बच्चे पैदा न करने या सिर्फ एक बच्चे तक ही सीमित रहने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, इस समय देश में कुल प्रजनन दर 1.9 फीसद है, जोकि जनसंख्या के स्थिर संतुलन के आंकड़े 2.1 फीसद से काफी कम है।

प्रजनन दर में गिरावट की शुरुआत वर्ष 1970 के मध्य से ही शुरू हो गई थी, इसमें सबसे ज्यादा तेजी 1990 से 2000 के बीच दर्ज की गई। जो प्रजनन दर वर्ष 1991 में 3.6 फीसद थी, वह 2001 आते-आते 3.1 फीसद रह गई। वर्ष 2001 से लेकर अब तक प्रजनन दर में तेज गिरावट दर्ज की गई है। इस समय देश में प्रजनन दर इतिहास के सबसे न्यूनतम स्तर पर है। यानी वर्ष 1970 में औसतन एक महिला के पांच से अधिक बच्चे होते थे, मगर वर्तमान में यह औसत दो बच्चों से भी कम रह गई है। जबकि आजादी के समय प्रजनन दर अपने उच्चतम स्तर 6.18 फीसद पर थी।

दिल्ली, केरल, तमिलनाडु जैसे राज्यों में जन्म दर विकसित देशों जितनी कम हो चुकी है। इससे आने वाले समय में मानव कार्यबल में भारी कमी और क्षेत्रीय असमानता का खतरा पैदा होगा। देश में सरकारी योजनाओं का आधार बनने वाली नई जनगणना कई मायनों में खास होगी, जो भविष्य की रूपरेखा तैयार करेगी। इस बीच बचपन और बुढ़ापे का बिगड़ता आंकड़ा चर्चा नहीं, बल्कि संतुलन की जरूरत बता रहा है। अगर इस चुनौती पर अभी से काम शुरू नहीं किया गया, तो भविष्य के युवा कंधे इसका बोझ नहीं उठा पाएंगे।